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अद्यतन सामयिक घटनाओं को नियमित रूप से पढ़ें (Read updated Current affairs regularly)

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Relevant & Updated Current Affairs (अद्यतन सामयिकी)

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शहरीकरण एक ख़ास समय में ग्रामीण बस्तियों से शहरी बस्तियों में बसने की प्रक्रिया है जहां 70 प्रतिशत लोग दोयम अथवा तीसरे दर्ज (सेवाएं) की श्रेणी वाले क्षेत्रों में निवास करते हैं. शहरों को समावेशी आर्थिक विकास का इंजन’ माना जाता है. शहरी क्षेत्रों में सांविधिक क्षेत्र’ (नगर निगमनगरपालिकाछावनी बोर्ड या अधिसूचित क्षेत्र समिति)और न्यूनतम 5000 की जनसंख्या तथा ग़ैर कृषि गतिविधियों में संलग्न 75 प्रतिशत मुख्य पुरुष कामगारों तथा प्रति कि.मी. न्यूनतम 400 व्यक्तियों की जनसंख्या घनत्व के मानदंड के साथ जनगणना कस्बे’ दोनों सम्मिलित होते हैं. भारत की जनगणना 2011 के अनुसारहमारी शहरी जनसंख्या 37.7 करोड़ (31.16 %) है. इस तरह 1901-2011 के दौरानभारत की शहरी जनसंख्या में 20 प्रतिशत बिंदुओं से अधिक की वृद्धि हुई है.

ऐतिहासिक रूप से, 1901 के बाद जब भारत की शहरी जनसंख्या कुल जनसंख्या का मात्र 10.8 प्रतिशत थीइसमें लगभग तीन गुणा बढ़ोतरी हुई है.

यद्यपिविश्व बैंक और जनसंख्या डाटा के अनुसार शहरी जनसंख्या का यह अनुपात कई विकासशील और विकसित देशों की अपेक्षा बहुत ही कम है.

उदाहणार्थ-जापान(91.16%)ब्राजील(84.6%)ब्रिटेन(81.6%)जर्मनी(74.5%)रूस(73.77%) और चीन(50.6%). भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में मुंबईदिल्लीकोलकाताचेन्नैबंगलुरूहैदराबादअहमदाबादपुणेसूरत और जयपुर दस बड़े शहर हैं. 2001-2011 में दिल्ली में 35 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (आगरा और विशाखापत्तनम को एक साथ जोडक़रइनके बराबर)बंगुलरू में 28 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (कानपुर के बराबर)चेन्नै में 20 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (पटना के बराबर)मुंबई में 20 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (कोझीकोड के बराबर)हैदराबाद में 19 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (त्रिशूर के बराबर)सूरत में 18 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (वडोदरा के बराबर)अहमदाबाद में 14 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (वाराणसी के बराबर)पुणे में 13 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (श्रीनगर के बराबर)कोलकाता में 8 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (वारंगल के बराबर)और जयपुर में 7 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (देहरादून के बराबर). 2030 तक भारत की शहरी आबादी 40.7% हो जायेगी.

शहरों में जनसंख्या में वृद्धि तीन कारणों से है: पहलाअसीमित संख्या में उच्चतर जन्म दरदूसरा मृत्यु दर में कमी और तीसरा गांवों से (ग्रामीण से शहरी विस्थापन) अथवा छोटे कस्बों (कस्बों से शहरों में) से शहरों की तरफ विस्थापन. वास्तव मेंकिसी शहर विशेष में एक अवधि के लिये जनसंख्या में स्थिरता के पीछेमहिलाओं की अधिक और बेहतर शिक्षाछोटे परिवार के आदर्श का प्रसारपरिवारों के बीच अधिक मनोरंजन सुविधाओं का होनाबड़े आकार के परिवारों को संभालने में आर्थिकविशेष और सामाजिक कठिनाइयांबार-बार गर्भधारण करने से उत्पन्न होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरों के बारे में जागरूकता के कारण अपेक्षाकृत कुल प्रजनन दर में कमी के कारण प्रति वर्ष जन्म दर में गिरावट आई है. यद्यपि एक शहर में होने वाले कुल जन्मों का विकास पर प्रभाव होता हैलेकिन शहरों के आकार में वृद्धि के पीछे सामान्यत: उच्च जन्म दर ही नहीं है.

इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाएंविशेषकर प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से बेहतर रूप में उपलब्ध हैंअत: प्रति हजार जन्मों पर पांच बच्चों की मृत्यु दर और प्रति लाख जन्मों पर मातृत्व मृत्यु दर ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में कम है. तदनुसार जनसंख्या में मामूली वृद्धि है परंतु यह भी कम जन्म दर के द्वारा संतुलित है. लेकिन विस्थापन (ग्रामीण और अन्य शहरी क्षेत्रोंदोनों से) शहरों में जनसंख्या वृद्धि में बहुत बड़ा योगदान करता है. विस्थापन सामान्यत: खिंचाव’ एवं दबाव’ दोनों कारणों से होता है. शहरों के खिंचाव कारकों में मुख्यत: संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में अधिक नये और बेहतर आजीविका अवसर (सार्वजनिक और निजी) होनाबच्चों की स्कूली और उच्चतर शिक्षा दोनों के लिये अधिक और बेहतर अवसर होनाअधिक और बेहतर आवासीय सुविधाएंबेहतर सांस्कृतिक और मनोरंजन सुविधाएं (सिनेमाक्लबथिएटर)अधिक सरकारी कार्यालय और सार्वजनिक उपयोगिताएंनिजी क्षेत्र का विकासविभिन्न प्रकार से भिन्न-2 स्तरों पर राजनीतिक भागीदारी के लिये अधिक अवसर प्रदान करने के लिये राजनीतिक मामलों का हबस्वास्थ्य और साफ-सफाई के लिये अधिक और बेहतर सुविधाएंअभिव्यक्ति और भागीदारी के लिये अवसर प्रदान करने हेतु अधिक जनसंचार स्रोतयुवाओं को अधिक आज़ादीअधिक और बेहतर परिवहन और संचार सुविधाएं आदि शामिल होती हैं.

यही कारण है कि दस लाख से अधिक जनसंख्या वाले मेट्रो शहरों की संख्या 1901 में 1 (कलकत्ता) से बढक़र 2011 के दौरान 52 हो गई-1951 में यह संख्या 5, 1961 में 7, 1971 में 9, 1981 में 12, 1991 में 24, 2001 में 39 और 2011 में 52 हो गई. अब महाराष्ट्र में 6 शहरकेरल और उत्तर प्रदेश में प्रत्येक में 7, मध्य प्रदेशगुजरात और तमिलनाडु में प्रत्येक में 4, झारखंडराजस्थान और आंध्र प्रदेश में प्रत्येक में 3, पश्चिम बंगालछत्तीसगढ़ और पंजाब में प्रत्येक में 2, और दिल्लीजम्मू एवं कश्मीरहरियाणाबिहार और कर्नाटक में प्रत्येक में 1 में दस लाख से अधिक जनसंख्या (2011) है. भारत में सबसे तेज़ी से विकसित हो रहे दस शहर हैं - गाजिय़ाबाद (23.8 लाख जनसंख्या)दुर्ग-भिलाईनगर (10.6), वसाई-विरार (12.2), फरीदाबाद (14.1), मलापुरम (17), कन्नूर (16.4), सूरत (45.9), भोपाल (18.9), औरंगाबाद (महाराष्ट्र 11.9) और धनबाद (12) - वार्षिक वृद्धि दर 4.8 प्रतिशत (धनबाद) से 6.9 प्रतिशत (गाजिय़ाबाद) है.

दूसरी तरफ मुख्यत: गांवों में दबाव’ के कारक हैं: आजीविका के अवसरों का अभाव (कृषि में रोजग़ार के अवसरों की कमी अथवा प्रच्छन्न बेरोजगारी’ (जैसा कि गुन्नार मिरडल ने इसे संज्ञा दी)शैक्षणिक और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभावपरिवहन और संचार सुविधाओं का अभावअनावश्यक बंधन और रूढि़वादी रीति रिवाजविशेषकर महिलाओंनिचले तबकों और समुदायों के मामले में. पिछले पांच-छह दशकों में यह प्रवृत्ति भी रही है कि गांवों में उग्रवाद और नक्सलवाद की समस्या के कारण बहुत से परिवार उसी राज्य में अथवा अन्य विकसित राज्य/अथवा राष्ट्रीय राजधानी में सामूहिक रूप से शहरी केंद्रों में विस्थापित हो गये.

शहरीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

शहरीकरण को भारतीय अर्थव्यवस्था के उचित संदर्भ में भी देखा जाना चाहिये. भारत चीन (138 करोड़ जनसंख्या) के बाद जनसंख्या के हिसाब से दुनिया में जनसंख्या की दृष्टि से (विश्व जनसंख्या में 17.5 प्रतिशत हिस्सेदारी) दूसरा सबसे बड़ा देश है (2011 की जनगणना के अनुसार 121 करोड़ लोगअब 2016 में करीब 130 करोड़ होने का अनुमान). विश्व अर्थव्यवस्था में चीन (विश्व अर्थव्यवस्था में 17.4 प्रतिशत की हिस्सेदारी) और अमरीका (विश्व अर्थव्यवस्था में 15.4 प्रतिशत की हिस्सेदारी) के बाद भारत (विश्व अर्थव्यवस्था में 7.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी) तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.

प्रति व्यक्ति जीडीपी की दृष्टि सेअमरीका के 57.2 हजार डॉलरआस्ट्रेलिया के 48.2 हजार डॉलरजर्मनी के 47.5 डॉलरकनाडा के 46.2 हजार डॉलरब्रिटेन के 42 हजार डॉलरफ्रांस के 41.9 हजार डॉलरसऊदी अरब के 53.7 हजार डॉलरजापान के 38.7 हजार डॉलरदक्षिण कोरिया के 37.7 हजार डॉलरइटली के 36.2 हजार डॉलररूस के 25.2 हजार डॉलरमैक्सिको के 17.9 हजार डॉलरब्राजील के 15.2 हजार डॉलरचीन के 15.1 हजार डॉलरदक्षिण अफ्रीका के 13.2 हजार डॉलरइंडोनेशिया के 11.6 हजार डॉलर के मुकाबले भारत के केवल 6.6 हजार डॉलर (पीपीपी) हैं.

इस प्रकार मानव विकास सूचकांक एचडीआई रैंकिंग (2014) में भारत 130वें स्थान पर है-न केवल जी-20 देशों और ब्रिक्स में सबसे निचले स्थान पर बल्कि दुनिया के किसी भी विकासशील देश से नीचे है. भारतीय अर्थव्यवस्था प्रति वर्ष 7 प्रतिशत की दर से तेज़ी से बढ़ रही है परंतु लेबर ब्यूरो डाटा (2016) के अनुसार गैर कृषि अर्थव्यवस्था के 8 प्रमुख क्षेत्रों के आधार पर रोजग़ार में वृद्धि मात्र 1.1 प्रतिशत वार्षिक की है. इस तरह बेरोजग़ारी दर में 2011 में 3.8 प्रतिशत से वृद्धि होकर 2015 में प्रतिशत हो गई. 2016 में कुल सृजित रोजग़ार शिक्षा में 50 लाख (कम मज़दूरी)व्यापार में 14.5 लाखस्वास्थ्य में 12.1 लाख (कम मज़दूरी)आईटी/बीपीओ में 10.4लाखआवास/रेस्तरां में 7.7 लाखपरिवहन में 5.8 लाख और निर्माण क्षेत्र में 3.7 लाख था. परंतु आईटी में तेज़ी को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हैविशेषकर वैश्विक मंदीवीजा प्रतिबंध और घरेलू आईटी सेक्टर में कटौतियों के कारण ऐसा हो रहा है. इसने शहरी मध्यमवर्गीय घरों को कई तरीकों से प्रभावित किया है.

शहरीकरण की समस्याएं:

यदि हम परिवहन और इसके प्रभावों की स्थिति पर नजऱ डालेंहम पाते हैं कि दिल्ली में सर्वाधिक संख्या में पंजीकृत वाहन हैं (25 मई, 2017 को 1.05 करोड़ से अधिक)जिनमें से 66.49 लाख मोटर साइकिल/स्कूटर, 31.73 लाख कारें और 7.46 लाख अन्य वाहन हैं. (2.25 लाख माल ढुलाई वाहनों सहित). ऐसे वाहनों के कारण बड़े उच्च स्तर का ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण होता है. दिल्ली को विश्व श्रव्य सूचकांक ने केवल ध्वनि प्रदूषण के आधार पर दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा ध्वनि प्रदूषण वाले शहर का स्थान दिया है परंतु इसे सर्वाधिक शोर और अधिकतम श्रव्य हानि की दृष्टि से विश्व में दूसरे स्थान पर रखा गया है-गौंगझोऊ (चीन) पहले स्थान पर है. दिल्ली को दुनिया में उन 50 शहरों में पहले स्थान पर रखा गया हैजहां पर श्रव्य सर्वाधिक निम्नीकृत है (सभी कारणों सेध्वनि प्रदूषण सहित). दिल्ली मेंकिसी व्यक्ति में श्रव्य क्षमता कम से कम बीस वर्ष आयु के किसी व्यक्ति के समान है-अर्थात उस आयु में 20 प्रतिशत कम की क्षमता होती है. शहरी ध्वनि प्रदूषण और श्रव्य हानि के बीच निकट का सकारात्मक संबंध है-(64 प्रतिशत). अधिक स्पष्ट रूप में भारत में दिल्ली जैसे बड़े शहरी क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत सडक़ यातायातविमानट्रेनेंनिर्माण गतिविधियां और उद्योग हैं.

यदि हम वायु प्रदूषण पर नजऱ डालेंकई भारतीय शहरों में स्थिति फिर गंभीर है. वैश्विक वायु 2017 रिपोर्ट की स्थिति के अनुसारसंपूर्ण दुनिया में महीन कणों (पीएम 2.5) का दीर्घावधि प्रभाव 2015 में 42 लाख समयपूर्व मृत्यु का कारण बना जिसमें से भारत और चीन को एक साथ जोडक़र इसमें 52 प्रतिशत की हिस्सेदारी थीयानी चीन में ऐसी मौतें 11.08 लाखभारत में 10.90 लाखयूरोपीय संघ में 2.57 लाखरूस में 1.37 लाखपाकिस्तान में 1.35 लाखबंगलादेश में 1.22 लाख और अमरीका में 88400 लाख मौतें हुईं. 1990 से लेकर पीएम 2.5 से संबंधित समय पूर्व मौतों में चीन में 17.22 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि में भारत में यह वृद्धि 48 प्रतिशत हुई.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट (अगस्त, 2016) के अनुसार, 2015 में 10 लाख से अधिक की आबादी वाले 41 भारतीय मेट्रो शहरों को कुल निगरानी दिवसों के 60 प्रतिशत में खराब वायु गुणवत्ता का सामना करना पड़ा. 24 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में 168 शहरों में ग्रीन पीस रिपोर्ट एअरपोकैलीप्स’’ अध्ययन से पता चला है कि दक्षिण भारत में कुछ शहरों को छोडक़रज्यादातर भारतीय शहर विश्व स्वास्थ्य संगठन अथवा राष्ट्रीय व्यापक वायु गुणवत्ता मानदंडों का पालन नहीं करते हैं. 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (पीएम10) की मानक सीमा के बदले भारत में 20 सबसे बड़े शहरों में 268 और 168 (2015) के बीच बहुत अधिक पीएम 10स्तर रखते हैं - दिल्ली का स्थान पहला है (268 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर)तदुपरांत गाजियाबाद (258), इलाहाबाद (250), बरेली (240), फरीदाबाद (240), झरिया (228), अलवर (227), रांची (216), कुसुंडाझारखंड (214), बस्ताकोलाझारखंड (216), कानपुर (205) और पटना (200) का स्थान आता है. वायु प्रदूषण विशेष तौर पर युवा और बुजुर्गों में श्वासहृदय और रक्तचाप जैसी समस्याओं का मुख्य कारण बनता है.

ज्यादातर भारतीय शहरों में वाहनों से निकलने वाला धुआंखुली निर्माण सामग्रियोंकचड़े को जलानेपराली (फसल के अवशेष)विशेषकर पंजाबहरियाणा और पश्चिमी उ.प्र. में जलाने के कारण होने वाले धुएंईंट भट्ठों से निकलने वाली राखपुराने भवनों को गिराये जानेथर्मल संयंत्रों से होने वाले उच्च उत्सर्जनकोयला जलनेकुछेक क्षेत्रों में ईंधन लकड़ी के इस्तेमाल आदि के कारण वायु प्रदूषण होता है. दिल्ली में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन का वायु प्रदूषण में 40 प्रतिशत से अधिक योगदान है. 2000-2016 के दौरान दिल्ली में वाहनों में स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल बढऩे और थर्मल संयंत्रों के बंद होने से सल्फर डाईऑक्साइड (एसओ2) 15 माइक्रोग्राम से कम होकर 7 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गया परंतु दूसरी तरफ इसी अवधि के दौरान नाइट्रोजन डाईआक्साइड (एनओ2) का स्तर 36 माइक्रोग्राम से 65 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गया. डीजल वाहनों की संख्या में वृद्धि के कारण-दिल्ली में बिकने वाली कारों 2000 में डीजल इंजन वाली कारों की संख्या 10 प्रतिशत से कम थी परंतु अब 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है-एनओ2 में वृद्धि हुई है. अत: डीजल से पेट्रोल और सीएनजी में तबदीली की आवश्यकता है. इसके अलावा एनओ2 को कम करने के लिये कचड़े और जैविक ईंधन के जलाये जाने को बंद करना होगा

वायु में एनओ2 का स्तर बढऩे के कारण ओजोन प्रदूषण बुरी तरह होता है. बीएस- ढ्ढढ्ढ में सल्फर की मात्रा 500 पीपीएम थी जबकि बीएस-ढ्ढढ्ढढ्ढ में यह 100पीपीएम और बीएस-ढ्ढङ्क में यह मात्र 50 पीपीएम है.

हम हर साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस वास्तविक कार्य सूची से अधिक बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं. क्षेत्रोंराष्ट्रों और उप राष्ट्रों के बीच पानी का विषम वितरण है. उदाहरण के लिये एशिया में दुनिया की 60 प्रतिशत जनसंख्या है परंतु इसमें केवल वैश्विक प्रवाह 36 प्रतिशत है जबकि दक्षिण अमरीका में विश्व की मात्र 6 प्रतिशत जनसंख्या है परंतु वहां 26 प्रतिशत वैश्विक प्रवाह है. इसी तरह भारत में विश्व जनसंख्या का 17.5 प्रतिशत है परंतु केवल 4 प्रतिशत विश्व का ताज़ा जल इसे प्राप्त होता है. सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों में से एक 2015 तक सुरक्षित पेयजल की पहुंच से वंचित लोगों में आधी संख्या को कम करना था परंतु हम इस प्रमुख लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए.

शहरी भारत मेंहम विभिन्न शहरों में भिन्न भिन्न प्रकार से और समानुपात में पानी की कमी का सामना करते हैंउदाहरण के लिये राजस्थान में दस कस्बों में तीन दिनों में से केवल एक दिन पानी की आपूर्ति की जाती है. इसके अलावा भारत में 35 शहरों में करीब एक करोड़ लोगों को पूर्व की सामान्य आपूर्ति की अपेक्षा 38प्रतिशत कम पानी की आपूर्ति की जाती है. 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समयदिल्ली में करीब 800 तालाब/झीलें थीं परंतु इनमें से ज्यादातर का अतिक्रमण कर लिया गया है और भवनों के निर्माणसमतल क्षेत्रोंसडक़ों और अन्य सार्वजनिक उपयोगिताओं के लिये उनकी प्रकृति को बदल दिया गया. इसके अलावा चार मेट्रो शहरों (कोलकातादिल्लीचेन्नै और मुंबई) में रोज़ाना 90 करोड़ लीटर गंदा पानी नदियों में बहा दिया जाता है परंतु केवल 30 प्रतिशत को शोधन किया जाता है. देश के अन्य शहरोंविशेषकर कानपुरइलाहाबादवाराणसीलखनऊपटनाभागलपुर आदि के मामले में भी ऐसा ही है.

भारत के पास 433 अरब क्यूबिक मीटर भूजल है और भारत में ग्रामीण तथा शहरी घरेलू जल की 80 प्रतिशतता से अधिक जरूरत भूजल से पूरी होती है. परंतु भारत की प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में तेज़ी से गिरावट हुई है-1947 में 6042 क्यूबिक मीटर से 2011 में 1545 मीटर क्यूबिक-और इसमें आगे गिरावट होकर 2015 में 1340 क्यूबिक मीटर और 2050 में 1140 क्यूबिक मीटर हो जाने की आशा है. दूसरी तरफ भारत केवल कुल वर्षा जल का केवल 20 प्रतिशत संरक्षित करता है जबकि इस्राइल वैज्ञानिक रूप से इसके कुल वर्षा जल का 80 प्रतिशत संरक्षित करता है. पानी की कमी अक्सर झुग्गियों और अविकसित कालोनियों में आम लोगों के बीच झगड़ों/दंगों का कारण बनती है जहां जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक होता है और पानी के नल/टैंकर/हैंड पंप बहुत कम उपलब्ध होते हैं.

सुधारात्मक उपाय: भारत में स्मार्ट शहर विकसित किये जा रहे हैं परंतु इनकी संख्या सीमित है और पहले से मौजूद शहरों को स्मार्ट शहरों में परिवर्तित किया जा रहा है. अत: सभी शहरी केंद्रों को विकसित किये जाने की आवश्यकता है.

अत: उपर्युक्त गंभीर स्थिति की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित कदम गंभीरता के साथ उठाये जाने चाहियें:-

क) राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशानुसार 15 वर्ष या अधिक पुराने सभी डीजल वाहनों को शहरों में चलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये क्योंकि ये अधिक प्रदूषित हवा छोड़ते हैंनये डीजल वाहनों के उत्पादन को हतोत्साहित किया जाना चाहिये और इनके लिये बहुत अधिक पंजीकरण और पार्किंग शुल्क होने चाहियेअब केवल भारत ङ्कढ्ढ (यूरो ङ्कढ्ढ की पद्धति पर) अनुपालन वाहनों का उत्पादन और पंजीकरण किया जाना चाहिये और वाहनों में केवल स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल की अनुमति होनी चाहिये.

ख) एक तरफ पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराया जाना चाहिये और दूसरी तरफ जनता को भी सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल और निजी वाहनों का मित्रोंपड़ोसियों और साथियों के साथ मिलकर इस्तेमाल करने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिये.

ग) पर्याप्त तैयारी के साथ वाहनों का ओड-ईवन फार्मूला लागू किया जाना चाहिये.

घ) शादियोंजन्मत्योहारों (दीवाली) और अन्य समारोहों का शहरों में पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध/इनके उत्पादनबिक्री और खरीद को सीमित करते हुए रोक लगाई जानी चाहिये.

ड़) प्रदूषण फैलाने वाली सभी फैक्ट्रियोंथर्मल संयंत्रोंईंट भट्ठों आदि को तत्काल शहरों और आसपास के क्षेत्रों से अन्य क्षेत्रों में तबदील किया जाना चाहियेइसके अलावा इन्हें नई प्रौद्योगिकियों के साथ पर्यावरण अनुकूल बनाया जाना चाहिये.

च) सब्सिडी देकर वर्षा जल संरक्षण को लोकप्रिय बनाया जाना चाहिये और सभी पुराने तालाबों/टैंकों का पुनर्विकास किया जाना चाहिये.

छ) शहरों में हर साल सुनियोजित वृक्षारोपण अभियान चलाये जाने चाहियें और छात्रोंशिक्षकोंसरकारी कर्मचारियोंआंगनबाड़ी कार्यकर्ताआशास्वैच्छिक संगठनोंनगर निकायों आदि को सही प्रकार से संलग्न किया जाना चाहिये.

ज) ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये उच्च शक्ति की लाउड स्पीकरोंडी. जे. आदि के आवासीय और सांस्थानिक क्षेत्रों में इस्तेमाल पर प्रतिबंध होना चाहिये.

झ) चालकों को अनावश्यक हार्न न दिये जाने के प्रति प्रशिक्षित किया जाना चाहिये (जैसा कि पश्चिमी देशों में व्यवहार में है)

ट) निर्माण कार्यों के लिये सुनियोजित नियम होने चाहियें जिसमें शोर और वायु प्रदूषण रोकने तथा निर्माण सामग्रियों के लिये सडक़/लेन को बाधित नहीं किये जाने के नियम शामिल हों.

ठ) साइकिलों और बैटरी रिक्शा (सुरक्षा उपकरणों के साथ) के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये और यूरोपीय देशों की तरह साइकिल चलाने वालों के लिये साइकिल ट्रैकों का निर्माण किया जाना चाहिये.

ड) स्वच्छता कार्य योजना में जलवायु और मिट्टी प्रदूषण की रोकथाम के लिये उपकरणों और यंत्रों को शामिल किया जाना चाहियेमुख्य सडक़ों की यंत्रीकृत सफाई शीघ्रातिशीघ्र की जानी चाहिये क्योंकि जमा धूल जानलेवा होती जा रही है.

ण) प्रत्येक नागरिक शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों दोनों में खाद्य के अधिकार के भाग के तौर पर पर्याप्त सुरक्षित पेयजल प्राप्त करने का हकदार होना चाहिये-क्योंकि यह समस्या शहरी झुग्गी झोपडिय़ों में अधिक गंभीर है.

त) झोपडिय़ोंभीड़भाड़ वाले कस्बों और तथाकथित ग़ैर कानूनी कालोनियों का अच्छी तरह विकास करना जिनमें स्वच्छ पेयजलसडक़स्वास्थ्यशिक्षासीवर और अन्य सुविधाएं प्राथमिकता के आधार पर होनी चाहियेकेवल तभी स्मार्ट शहरों’ की अवधारणा को हक़ीकत बनाया जा सकता है.