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उत्तर प्रदेश के स्थापना दिवस पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आईएएस, आईपीएस, पीसीएस, एनडीएस, सीडीएस, नीट और जे ई ई जैसी प्रतियोगिताओं की परीक्षा की तैयारी करने के लिए मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना आरंभ की गई है। इस योजना के अंतर्गत ऐसे सभी छात्रों को निशुल्क कोचिंग प्रदान की जाएगी जो इन परीक्षाओं की तैयारी करना चाहते हैं लेकिन अपनी आर्थिक स्थिति के कारण नहीं कर पाते हैं। इस योजना के अंतर्गत मंडल स्तर पर छात्रों को सिलेबस एवं क्वेश्चन बैंक भी उपलब्ध करवाया जाएगा। UP Mukhyamantri Abhyudaya Yojana 2021 का कार्यान्वयन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निगरानी में किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत कक्षाएं बसंत पंचमी के दिन से आरंभ होंगी। इस योजना के अंतर्गत छात्रों को ऑनलाइन स्टडी मटेरियल के साथ ऑफलाइन कक्षाएं भी प्रदान की जाएगी।

UP Mukhyamantri Abhyudaya Yojana 2021 के अंतर्गत केवल कोचिंग ही नहीं बल्कि आईएएस, आईपीएस और पीसीएस की तैयारी करने वाले छात्रों को मार्गदर्शन भी प्रदान किया जाएगा। ऑफलाइन कक्षाओं में विभिन्न अवसर छात्रों का मार्गदर्शन करेंगे। आईएएस, पीसीएस परीक्षा के छात्रों के लिए प्रशिक्षु आईएएस, आईपीएस, आईएफएस (वन सेवा), पीसीएस अधिकारी और एनडीए और सीडीएस के छात्रों के लिए सैनिक स्कूल के प्राचार्य मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के अंतर्गत विषय के विशेषज्ञों को गेस्ट फैकल्टी के तौर पर भी बुलाया जाएगा। मंडल स्तर पर इस योजना के अंतर्गत परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को सिलेबस तथा परीक्षा पैटर्न की जानकारी भी निशुल्क प्रदान की जाएगी। आधिकारिक वेबसाइट पर क्वेश्चन बैंक की डिटेल भी छात्र प्राप्त कर सकेंगे। इसके अलावा मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के अंतर्गत उच्च स्तरीय कोचिंग संस्थाओं के स्टडी मैटेरियल भी छात्रों को प्रदान किए जाएंगे।

IAS, IPS और PCS की फ्री पढ़ाई के लिए 50 हजार से अधिक छात्रों का सेलेक्शन

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर शुरू मुख्यमंत्री अभ्युदय कोचिंग छात्रों की पहली पसंद बन गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सरकार की अभ्‍युदय कोचिंग में महज चार दिन में 4 लाख 84 हजार से अधिक छात्रों ने अपना रजिस्‍ट्रेशन कराया है। वहीं, प्रथम चरण में परीक्षा के माध्‍यम से अभ्‍युदय कोचिंग के लिए  विभिन्‍न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए 50 हजार से अधिक छात्रों का चयन किया गया। मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ सोमवार को अभ्‍युदय कोचिंग का शुभारंभ करेंगे और चयनित अभ्‍यर्थियों से संवाद कर उनको उज्‍जवल भविष्‍य की शुभकामनाएं भी देंगे। 

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयार के लिए प्रदेश की ओर से शुरू की जा रही अभ्‍युदय कोचिंग में परीक्षा की तैयारी के लिए चार दिन में 4,84,852 छात्रों ने पंजीकरण कराया। वहीं, अभ्‍युदय कोचिंग के पोर्टल पर अब तक 36 लाख से अधिक हिट आ चुके हैं।  जिन प्रतियोगी छात्रों ने ऑफलाइन क्लास के लिए पंजीकरण कराया था। शनिवार को उनकी ऑफलाइन परीक्षा का आयोजन किया गया।  इसमें एनडीए एवं सीडीएस की परीक्षा दोपहर 12 से 1 बजे तक, यूपीएससी/यूपीपीएससी की परीक्षा 1.30 से 2.30 बजे तक जबकि जेईई की तैयारी के लिए  3 से 4 और एनईईटी के लिए 4.30 से 5.30 तक परीक्षा का आयोजन किया गया। परीक्षा के माध्‍यम से पहले चरण में 4,84,852 छात्रों में से 50192 छात्रों का चयन ऑफलाइन क्लास के लिए किया गया। मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ चयनित छात्रों से सोमवार को संवाद भी करेंगे। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह चुके हैं कि 'मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना' प्रतियोगी छात्रों को निःशुल्क स्तरीय कोचिंग पाने का सुअवसर है। शुरुआती दौर में हर मंडल मुख्यालय में इसकी कक्षायें चलेंगी। बाद में जिला स्तर पर  इसका विस्तार होगा। पूरी तरह निःशुल्क इन कक्षाओं में ऑफलाइन और ऑनलाइन प्रशिक्षण तथा विभिन्न परीक्षाओं के पाठ्यक्रम व परीक्षा पैटर्न आदि के संबंध में अभ्यर्थियों को पूरी जानकारी दी जाएगी। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन एवं प्रबन्धन अकादमी (उपाम) द्वारा क्वेश्चन बैंक, प्रश्नोत्तरी आदि भी तैयार कर वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाएगा।

गणतंत्र दिवस (Republic Day 2021) की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने इस साल के पद्म पुरस्कारों (Padma Award 2021) की घोषणा कर दी है. इस बार जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे (Shinzo Abe) समेत 7 लोगों को पद्म विभूषण पुरस्कार प्रदान किया जाएगा. 

72वें गणतंत्र की पूर्व संध्या पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान - पद्म पुरस्कारों का ऐलान कर दिया गया है. किसी खास क्षेत्र में विशेष योगदान देने के लिए पद्म पुरस्कारों को तीन श्रेणियों- पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री के रूप में दी जाती है. इस साल केंद्र सरकार ने जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे, गायक एस पी बालासुब्रमण्यम (मरणोपरांत) समेत 7 लोगों को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है. इसके अलावा पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा समेत कुल 10 हस्तियों को पद्म भूषण दिया गया है. वहीं इस साल सरकार ने 102 हस्तियों को पद्म श्री से सम्मानित करने का फैसला लिया है. बता दें, इन पुरस्कारों भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक आयोजित समारोह में दिया जाता है जो कि राष्ट्रपति भवन में आमतौर पर हर साल मार्च या अप्रैल के बीच आयोजित किया जाता है.

पद्म विभूषण

1. शिंजो आबे- पब्लिक अफेयर्स, जापान
2. एसपी बालासुब्रमण्यम (मरणोपरांत)-कला, तमिलनाडु
3. डॉक्टर बेले मोनप्पा हेगड़े- मेडिसिन, कर्नाटक
4. श्री नरिंदर सिंह कपनी (मरणोपरांत) साइंस एंड इंजीनियरिंग, USA
5. मौलाना वहीदुद्दीन खान - अध्यात्मवाद, दिल्ली
6. बीबी लाल- पुरातत्व, दिल्ली
7. सुदर्शन साहू- कला, ओडिशा

पद्म भूषण

1. कृष्णन नायर शांतकुमारी- कला, केरल
2. तरुण गोगोई (मरणोपरांत)- पब्लिक अफेयर्स, असम
3. चंद्रशेखर कंबरा- साहित्य एंव शिक्षा, कर्नाटक
4. सुमित्रा महाजन- पब्लिक अफेयर्स, मध्य प्रदेश
5. नृपेंद्र मिश्र, सिविल सर्विस, उत्तर प्रदेश
6. राम विलास पासवान (मरणोपरांत)- पब्लिक अफेयर्स, बिहार
7. केशुभाई पटेल (मरणोपरांत)- पब्लिक अफेयर्स, गुजरात
8. कल्बे सादिक (मरणोपरांत)- अध्यात्मवाद, उत्तर प्रदेश
9. रजनीकांत देवीदास, उद्योग, महाराष्ट्र
10. तरलोचन सिंह, पब्लिक अफेयर्स, हरियाणा

पद्म श्री

1. गुलफाम अहमद- कला, उत्तर प्रदेश
2. पी अनीता- खेल, तमिलनाडु
3. रामास्वामी अन्ना वरापू- कला, आंध्र प्रदेश
4. सुब्बू अरूमुगम- कला, तमिलनाडु
5. प्रकाशराव आशावादी- साहित्य और शिक्षा, आंध्र प्रदेश
6. भूरी बाई- कला, मध्य प्रदेश
7. राधेश्याम बरले- कला, छत्तीसगढ़
8. धर्म नारायण बर्मा- साहित्य और शिक्षा, पश्चिम बंगाल
9. लक्ष्मी बरुआ- समाज सेवा, असम
10. बीरेंद्र कुमार बसक- कला, पश्चिम बंगाल
11. रजनी बेक्टर- व्यापार उद्योग, पंजाब
12. पीटर ब्रूक- कला, यूनाइटेड किंग्डम
13. संगखुमी बुकालच्वाक- समाज सेवा, मिजोरम
14. गोपीराम बरगायन बुराभकत- कला, असम
15. बिजोय चक्रवर्ती- जनसेवा, असम
16. सुजीत चट्टोपाध्याय- साहित्य और शिक्षा, पश्चिम बंगाल
17. जगदीश चौधरी (मरणोपरांत)- समाज सेवा, उत्तर प्रदेश
18. सुल्ट्रीम चोनजोर- समाज सेवा, लद्दाख
19. माउमा दास- खेल, पश्चिम बंगाल
20. श्रीकांत दतर- साहित्य और शिक्षा, यूएसए
21. नारायण देबनाथ- कला, पश्चिम बंगाल
22. चुटनी देवी- समाज सेवा, झारखंड
23. दुलारी देवी- कला, बिहार
24. राधे देवी- कला, मणिपुर
25. शांति देवी- समाज सेवा, ओडिशा
26. वयन डिबिया- कला, इंडोनेशिया
27. दादूदन गढ़वी- साहित्य और शिक्षा, गुजरात
28. परशुराम आत्मराम गंगावने- कला, महाराष्ट्र
29. जय भगवान गोयल- साहित्य और शिक्षा, हरियाणा
30. जगदीश चंद्र हलदर- साहित्य और शिक्षा, पश्चिम बंगाल
31. मंगल सिंह- साहित्य और शिक्षा, असम
32. अंशु जम्सेनपा- खेल, अरुणाचल प्रदेश
33. पुर्णमासी जानी-कला, ओडिशा
34. माथा बी मंजम्मा जोगाती-कला, कर्नाटक
35. दामोदरन कैथा प्राम- कला, केरल
36. नामदेओ सी कांब्ले- साहित्य और शिक्षा, महाराष्ट्र
37. महेश भाई और नरेश भाई कनोडिया (मरणोपरांत)- कला, गुजरात
38. रजत कुमार- साहित्य और शिक्षा, ओडिशा
39. रंगास्वामी लक्ष्मीनारायण कश्यप- साहित्य और शिक्षा, कर्नाटक
40. प्रकाश कौर- समाज सेवा, पंजाब
41. निकोलस कजानस- साहित्य और शिक्षा, ग्रीस
42. के केशव सामी- कला, पुडुचेरी
43. गुलाम रसूल खान- कला, जम्मू कश्मीर
44. लाखा खान- कला, राजस्थान
45. संजीदा खातून- कला, बांग्लादेश
46. विनायक विष्णु खेडेकर- कला, गोवा
47. नीरु कुमार- समाज सेवा, दिल्ली
48. लाजवंती- कला, पंजाब
49. रतन लाल- विज्ञान और अभियांत्रिकी, अमेरिका
50. अली मानिकफन- नवोन्मेष, लक्षद्वीप
51. रामचंद्र मांझी- कला, बिहार
52. दुलाल मंकी- कला, असम
53. नानाद्रो बी मारक- कृषि, मेघालय
54. रेवबेन माशांग्वा- कला, मणिपुर
55. चंद्रकांत मेहता- साहित्य और शिक्षा, गुजरात
56. रतनलाल मित्तल- चिकित्सा, पंजाब
57. माधवन नामबियार- खेल, केरल
58. श्याम सुंदर पालीवाल- समाज सेवा, राजस्थान
59. चंद्रकांत शांभाजी पांडव- चिकित्सा, दिल्ली
60. सोलोमान पप्पाया- साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता, तमिलनाडु
61. पप्पामल- कृषि, तमिलनाडु
62. कृष्ण मोहन पाथी- चिकित्सा, ओडिशा
63. जसवंती बेन जमुनादास पोपट- व्यापार उद्योग, महाराष्ट्र
64. गिरीश प्रभोने- समाज सेवा, महाराष्ट्र
65. नंदा प्रस्टी- साहित्य और शिक्षा, ओडिशा
66. केके रामचंद्र पुलावर- कला, केरल
67. बालन पुथेरी- साहित्य और शिक्षा, केरल
68. बिरुबाला राभा- समाज सेवा, असम
69. कनक राजू- कला, तेलंगाना
70. बॉम्बेजयश्री रामनाथ- कला, तमिलनाडु
71. सत्याराम रियांग- कला, त्रिपुरा
72. धनंजय दिवाकर सचदेव- चिकित्सा, केरल
73. अशोक कुमार साहू- चिकित्सा, उत्तर प्रदेश
74. भूपेंद्र कुमार सिंह संजय- चिकित्सा, उत्तराखंड
75. सिंधु ताई सपकाल- समाज सेवा, महाराष्ट्र
76. चमनलाल सप्रू (मरणोपरांत)- साहित्य और शिक्षा, जम्मू
77. रोमन शर्मा- साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता, असम
78. इमरान शाह- साहित्य और शिक्षा, असम
79. प्रेमचंद्र शर्मा- कृषि, उत्तराखंड
80. अर्जुन सिंह शेखावत- साहित्य और शिक्षा, राजस्थान
81. रामयत्न शुक्ला- साहित्य और शिक्षा, उत्तर प्रदेश
82. जितेंद्र सिंह शंटी- समाज सेवा, दिल्ली
83. करतार पारस राम सिंह- कला, हिमाचल प्रदेश
84. करतार सिंह- कला, पंजाब
85. दिलीप कुमार सिंह- चिकित्सा, बिहार
86. चंद्रशेखर सिंह- कृषि, उत्तर प्रदेश
87. सुधा हरिनारायण सिंह- खेल, उत्तर प्रदेश
88. बीरेंद्र सिंह- खेल, हरियाणा
89. मृदुला सिन्हा (मरणोपरांत)- साहित्य और शिक्षा, बिहार
90. केसी शिवशंकर (मरणोपरांत)- कला, तमिलनाडु
91. गुरुमां कमलीसोरेन- समाज सेवा, पश्चिम बंगाल
92. माराची शुब्बूरमन- समाज सेवा, तमिलनाडु
93. पी सुब्रमण्यन (मरणोपरांत)- व्यापार उद्योग, तमिलनाडु
94. नीदूमोलू सुमती- कला, आंध्र प्रदेश
95. कपिल तिवारी- साहित्य और शिक्षा, मध्य प्रदेश
96. फॉदर वॉल्स (मरणोपरांत)- साहित्य और शिक्षा, स्पेन
97. थिरूवेंगदम वीरा राघवन- चिकित्सा, तमिलनाडु
98. श्रीधर वेंबू- व्यापार उद्योग, तमिलनाडु
99. के वाई वेंकटेश- खेल, कर्नाटक
100. उषा यादव- साहित्य और शिक्षा, उत्तर प्रदेश
101. कर्नल काजी सज्जाद अली जाहिर- जनसेवा, बांग्लादेश
102. डॉ. जे एन पांडे- चिकित्सा, दिल्ली

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को संसद में आर्थिक समीक्षा पेश की। एक अप्रैल 2021 को पेश किये जाने वाले बजट से पहले संसद के पटल पर रखी गयी समीक्षा में अर्थव्यवस्था की स्थिति की विस्तार से जानकारी दी गयी है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति वेंकट सुब्रमणियम की अगुवाई वाली टीम ने 2020-21 की आर्थिक समीक्षा तैयार की है। इसमें अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में जानकारी दिये जाने के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिये आगे किये जाने वाले सुधारों के बारे में सुझाव दिये गये हैं।

कोरोना वायरस महामारी और उसकी रोकथाम के लिये लगाये गये 'लॉकडाउन से प्रभावित अर्थव्यवस्था में वित्त वर्ष 2021-22 में तेजी से पुनरूद्धार की उम्मीद है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर में 23.9 प्रतिशत जबकि दूसरी तिमाही में 7.5 प्रतिशत की गिरावट आयी है।

पूरे वित्त वर्ष में 7.7 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है। अगले वित्त वर्ष 2021-22 में जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि दर 11 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

कृषि विकास दर 3.4% रहेगी, इंडस्ट्री और सर्विसेज में निगेटिव ग्रोथ

इस साल इकोनॉमी के लिए सबसे बड़ा सहारा खेती ही है। इसकी विकास दर 3.4% रहने की उम्मीद है। GDP में इसकी हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। 2019-20 में यह 17.8% थी, इस साल 19.9% हो जाएगी। कृषि के अलावा इकोनॉमी के दो सेक्टर हैं इंडस्ट्री और सर्विसेज। इंडस्ट्री में मौजूदा वित्त वर्ष में 9.6% गिरावट रहने का अंदेशा है। सर्विस सेक्टर की ग्रोथ भी -8.8% रहेगी।

देश में 85% छोटे किसान, नए कृषि कानूनों से उन्हें फायदा

नए कृषि कानूनों के विरोध में भले ही किसान दो महीने से आंदोलन कर रहे हों, सर्वे में इन कानूनों की तारीफ की गई है। इसके मुताबिक नए कानूनों से छोटे किसानों को फायदा होगा। प्रोसेसर, होल सेलर और बड़े रिटेलर्स के साथ सौदा करते वक्त किसानों के पास ज्यादा अधिकार होंगे। देश के कुल किसानों में 85% छोटे किसान ही हैं।

खेती में अनिश्चितता को देखते हुए अभी रिस्क किसानों के लिए रहता है। नए कानूनों से रिस्क उनके लिए होगा जो किसानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट खेती की डील करेंगे। किसान अपनी फसल की कीमत तय कर सकेंगे। उन्हें इसकी पेमेंट भी तीन दिन में मिल जाएगी। कॉन्ट्रैक्ट खेती से खेती में नई टेक्नोलॉजी भी आएगी।

हेल्थकेयर पर सरकारी खर्च बढ़ाने की जरूरत

सर्वे में हेल्थकेयर पर सरकारी खर्च जीडीपी का 2.5 से 3% तक ले जाने की बात कही गई है। 2017 की नेशनल हेल्थ पॉलिसी में भी यह लक्ष्य रखा गया था। इसके बावजूद अभी यह 1% के आसपास ही है। इंटरनेट कनेक्टिविटी और हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर में खर्च बढ़ाना चाहिए। टेलीमेडिसिन को भी बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है।

तीसरी बड़ी इकोनॉमी बनने के लिए इनोवेशन जरूरी

सर्वे में आर्थिक वृद्धि दर तेज करने के लिए अपनाए जा सकने वाले उपायों का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि अभी भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकोनॉमी है। अगर इसे तीसरे स्थान पर पहुंचना है तो इनोवेशन पर ध्यान देना पड़ेगा।

कोरोना की वजह से ग्लोबल इकोनॉमी में भी इस साल 4.4% गिरावट रहेगी। यह एक सदी में सबसे बड़ी गिरावट होगी। सर्वे के अनुसार विकसित देशों की इकोनॉमी को कोरोना के कारण ज्यादा नुकसान हुआ है।

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने पीसीएस-2018 में चयनित अभ्यर्थियों का पदवार एवं श्रेणीवार कटऑफ मंगलवार को जारी कर दिया। 988 पदों के लिए 11 सितंबर 2020 को अंतिम परिणाम घोषित हुआ था। 1600 अंकों की परीक्षा में 1014 नंबर पाने वाले अभ्यर्थी ने टॉप किया था। पहले 1700 अंकों की परीक्षा होती थी लेकिन पीसीएस-2018 से साक्षात्कार 200 की बजाय 100 नंबर का होने के कारण पूर्णांक 1600 रह गया है।

प्रारंभिक परीक्षा 28 अक्टूबर 2018 को हुई थी। प्री का परिणाम 30 मार्च 2019 को आया, जिसमें मुख्य परीक्षा के लिए 19,096 अभ्यर्थी सफल घोषित हुए थे। उसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर 160 महिला अभ्यर्थियों को 5 अक्टूबर 2019 को मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया गया। 18 से 22 अक्टूबर 2019 तक मुख्य परीक्षा हुई जिसका परिणाम 23 जून 2020 को जारी हुआ। 15 जुलाई से 25 अगस्त 2020 तक इंटरव्यू हुआ था।

कुल 988 पदों के लिए 2669 अभ्यर्थी साक्षात्कार में शामिल हुए थे। परीक्षा नियंत्रक अरविंद मिश्र की ओर से जारी सूचना के मुताबिक कटऑफ अंक 25 जनवरी तक वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा। अभ्यर्थी पीसीएस परीक्षा से जुड़ी किसी भी सूचना के लिए आयोग की वेबसाइट uppsc.up.nic.in को भी देख सकते हैं।

विभिन्न पदों के लिए कटऑफ

पद का नाम---------------अनारक्षित---------------ओबीसी-----------एससी एसटी

अधिकतम--न्यूनतम--अधिकतम-- न्यूनतम--अधिकतम--- न्यूनतम--अधिकतम न्यूनतम
डिप्टी कलेक्टर 1014--- 954---971--924--952--892-- 834--827

डिप्टी एसपी ---------------955 927 921 903 ---------------884 867--------------- 819 818
असिस्टेंट कमिश्नर

वाणिज्य कर    ---------------945 921 919 913 891 869                        
सहायक संभागीय

परिवहन अधिकारी ---------------953 950 921 921 891 889                        
खंड विकास अधिकारी 923 917 913 907 868 860                        

जिला कमांडेंट होमगार्ड्स 916 916 909 909 ---------------865 865                        
अधीक्षक कारागार ---------------919 913 903 903--------------- 878 878                        

अधिशासी अधिकारी
श्रेणी 1 केवल लिखित परीक्षा 890 890                                                                                                

लेखाधिकारी
केवल लिखित परीक्षा 874 874 862 854                                                

वाणिज्य कर
अधिकारी 920 895 896 877---------------856 825---------------809 809

कटऑफ में स्केल्ड अंक न होने पर छात्रों ने उठाए सवाल

पीसीएस 2018 के कटऑफ में स्केल्ड और नॉन स्केल्ड अंकों का जिक्र न होने पर अभ्यर्थियों ने लोक सेवा आयोग की मंशा पर सवाल उठाए हैं। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति का दावा है कि अंतिम परिणाम में स्केलिंग नहीं हुई है क्योंकि विषय का नंबर दशमलव में नहीं आया है। क्षैतिज आरक्षण की भी अलग से मेरिट जारी नहीं की गई है।

समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय ने परिणाम की सीबीआई जांच की मांग की है। उनका कहना है कि मार्कशीट देखने से पूरी तरह स्पष्ट है कि आयोग ने विषयों में स्केलिंग नहीं की है। पीसीएस 2017 में अनारक्षित वर्ग का कटऑफ 877.27 व ओबीसी का 855.36 था। पीसीएस 2016 में अनारक्षित वर्ग का कटऑफ 897.04 व ओबीसी का 893.04 था।

इस बार कटऑफ में दशमलव नहीं है। आयोग का यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना है। स्केलिंग न करने का ही परिणाम है कि हिन्दी पट्टी के प्रतियोगी छात्रों का चयन सूची से सफाया हो गया है। पहली बार महिला वर्ग का अलग से कटऑफ अंक घोषित नहीं किया गया है। सभी महिला अभ्यर्थी अपनी-अपनी श्रेणी की श्रेष्ठता में समायोजित लिखा है।

समिति के मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय का दावा है कि आयोग का यह रवैया मनमानापूर्ण है और समिति हर स्तर पर इसका विरोध करेगी। समिति को पहले से आशंका थी इसीलिए आयोग को ज्ञापन देकर रिजल्ट जारी करने की मांग करता रहा। इसीलिए आरटीआई से भी सूचना मांगी लेकिन जवाब नहीं दिया। पीसीएस 2018 में जीएस व हिंदी निबंध में जिन अभ्यर्थियों को अच्छा नंबर मिला था उन्हें विषय में कम नंबर दिया गया।

एक दशक से भी अधिक समय बाद शेयर बाजार में लिस्ट कंपनियों की कुल वैल्यू देश की GDP से अधिक हो गई है। इससे पहले 2007 में ऐसा देखने को मिला था, जब मार्केट कैप देश की GDP के 100% से अधिक हो गया था।

देश की GDP, लिस्टेड कंपनियों के कुल मार्केट कैप की तुलना में 99% हुआ

नेशनल स्टैटेस्टिक ऑफिस (NSO) के मुताबिक देश का सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP वित्त वर्ष 2020-21 में 195 लाख करोड़ रु. रहने का अनुमान है। यह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर लिस्ट कंपनियों के टोटल मार्केट कैप से कम है। मार्केट कैप 14 जनवरी को 197 लाख करोड़ रुपए रहा था। यानी देश की GDP कुल मार्केट कैप की तुलना में 99% है।

दिसंबर 2007 में जीडीपी का डेढ़ गुना था मार्केट कैप

13 साल पहले, दिसंबर 2007 में बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का पूरा मार्केट कैप GDP का 149% हो गया था। यह अब तक का रिकॉर्ड है। दिसंबर 2019 में भारत की GDP की तुलना में मार्केट कैप 78% और मार्च 2020 में 56% के आसपास था।

अमेरिका, जापान, ब्रिटेन जैसे देशों में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप GDP से 100% अधिक

हालांकि, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में मार्केट कैप GDP से अधिक है, जबकि जर्मनी, चीन, ब्राजील और रूस में यह कम है। खास बात यह है कि भारतीय शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप मार्च 2020 में आई भारी गिरावट के बाद 75% बढ़ा है। इसको विदेशी निवेश का बड़ा हाथ रहा है।

मार्केट कैप GDP से अधिक होना अच्छी बात नहीं

बाजार के जानकार मानते हैं कि लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप GDP से अधिक होना अच्छी बात नहीं है। इसलिए इक्विटी निवेशकों को निवेश करते समय सतर्कता बरतनी चाहिए। इसी कारण रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी निवेशकों को सोच समझकर निवेश करने की सलाह दी है।

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) ने 2021 के लिए परीक्षा कैलेंडर जारी कर दिया है। यूपीपीएससी ने 2021 में आयोजित होने वाली कुल 16 भर्ती परीक्षाओं की सूची व कार्यक्रम जारी किया है। 

यूपीपीएससी की ओर से 2021 में आयोजित होने वाली मुख्य परीक्षाओं में यूपीपीएससी पीसीएस प्री व पीसीएस मुख्य परीक्षाएं हैं जिनका आयोजन क्रमश: 13-06-2021  और 03-10-2021 को किया जाएगा। वहीं समीक्षा आधिकारी /सहायक समीक्षा अधिकारी (RO/ARO) की प्रारंभिक परीक्षा 01-08-2021 को आयोजित की जाएंगी। 

आयोग की ओर से परीक्षाओं की शुरुआत 21 जनवरी से 25 जनवरी तक पीसीएस-2020 की मुख्य परीक्षा के साथ होगी। इसके साथ ही पीसीएस और सहायक वन संरक्षक-क्षेत्रीय वन अधिकारी 2021 की प्रारंभिक परीक्षा 13 जून 2021 को आयोजित की जाएगी। समीक्षा अधिकारी-सहायक समीक्षा अधिकारी की प्रारंभिक परीक्षा 1 अगस्त 2021 और मुख्य परीक्षा 18 दिसम्बर 2021 को होगी। 3 अक्तूबर से पीसीएस 2021 की मुख्य परीक्षा होगी। आयोग की ओर से विशेष परिस्थितियों में परीक्षा तिथियों में बदलाव की भी बात कही है।

लोक सेवा आयोग परीक्षा कैलेण्डर 2021

परीक्षा का नाम   ----------------------------------परीक्षा तिथि
-पीसीएस-2020 मुख्य परीक्षा-----------------------------21 से 25 जनवरी 2021

सहायक बन संरक्षक-क्षेत्रीय वन अधिकारी मुख्य परीक्षा 2020--------- 13 फरवरी 2021 से
विधिक्षण अधिकारी (स्क्रीनिंग) परीक्षा-2020-----------------------------21 मार्च 2021

प्रवक्ता राजकीय डिग्री कॉलेज (स्क्रीनिंग) परीक्षा-2020-------------- 17 अप्रैल 2021
प्रधानाचार्य श्रेणी-2/ उप प्रधानाचार्य / सहायक निदेशक (स्क्रीनिंग) परीक्षा-2019 --- 23 मई 2021

सम्मिलित राज्य कृषि सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2020 ----------------------------- 30 मई 2021
पीसीएस 2021 (प्रारंभिक) तथा सहायक वन संरक्षक/ क्षेत्रीय वन अधिकारी( प्रारंभिक) परीक्षा 2021---- 13 जून2021

प्रवक्ता (पुरुष-महिला) राजकीय इंटर कॉलेज (प्रारंभिक) परीक्षा-2020- 20 जून 2021
सम्भागीय निरीक्षक (प्राविधिक) परीक्षा-2020---------------------10 जुलाई 2021 से

यूनानी चिकित्सा अधिकारी (स्क्रीनिंग) परीक्षा-2018----------------- 25 जुलाई 2021
समीक्षा अधिकारी/ सहायक समीक्षा अधिकारी (सामान्य चयन-विशेष चयन आदि) प्रारंभिक परीक्षा-2021- 1 अगस्त 2021

पीसीएस 2021 (मुख्य) परीक्षा------------------ 3 अक्टूबर 2021
सहायक वन संरक्षक अधिकारी/ क्षेत्रीय वन अधिकारी (मुख्य) परीक्षा 2020------------------ 22 अक्तूबर 2021 से

सम्मिलित राज्य कृषि सेवा (मुख्य) परीक्षा-2020- -----------------13 नवम्बर 2021 से
प्रवक्ता, (पुरुष- महिला) राजकीय इंटर कॉलेज (मुख्य) परीक्षा 2020------------------ 4 नवम्बर 2021

समीक्षा अधिकारी अधिकारी / सहायक समीक्षा अधिकारी (सामान्य चयन-विशेष चयन) मुख्य परीक्षा-2021- 18 दिसंबर 2021

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक कंपोजिट डिजिटल पेमेंट इंडेक्स (DPI) का निर्माण किया है। इस इंडेक्स से यह पता चलेगा कि देशभर में पेमेंट्स का किस स्तर तक डिजिटाइजेशन हुआ है। इस इंडेक्स में 5 मुख्य पैरामीटर्स होंगे।

ये 5 पैरामीटर्स अलग-अलग समयावधि में देश में डिजिटल पेमेंट्स के पेनीट्रेशन का आकलन करने में मदद करेंगे। RBI के बयान के मुताबिक ये पैरामीटर्स हैं- पेमेंट इनेबलर्स, पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-डिमांड साइड फैक्टर्स, पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-सप्लाई साइड फैक्टर्स, पेमेंट परफॉर्मेंस और कंज्यूमर सेंट्रिसिटी। इनमें से हर एक पैरामीटर के अंदर कुछ सब-पैरामीटर्स होंगे और हर एक सब-पैरामीटर के अंदर कई मापने लायक इंडिकेटर्स होंगे।

इन 5 पैरामीटर्स से तय होगा इंडेक्स का परफॉर्मेंस

  1. पेमेंट इनेबलर्स (वेटेज 25%)
  2. पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-डिमांड साइड फैक्टर्स (वेटेज 10%)
  3. पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर-सप्लाई साइड फैक्टर्स (वेटेज 15%)
  4. पेमेंट परफॉर्मेंस (वेटेज 45%)
  5. कंज्यूमर सेंट्रिसिटी (वेटेज 5%)
RBI-DPI को मार्च 2018 की अवधि के आधार पर किया गया है। इसका मतलब है कि मार्च 2018 के लिए DPI स्कोर 100 पर सेट किया गया है। RBI ने DPI की गणना क्रमशः मार्च 2019 और मार्च 2020 के लिए 153.47 और 207.84 पर की है, जो प्रशंसनीय वृद्धि का संकेत देता है। RBI-DPI को मार्च 2021 से 4 महीने के अंतराल के बाद अर्ध-वार्षिक आधार पर प्रकाशित किया जाएगा।

भारत ने नए संसद भवन की पहली तस्वीर सामने आ गई है. संसद भवन की नई इमारत का डिजाइन त्रिभुज (Triangle) के आकार का होगा और पुराने परिसर के पास इसका निर्माण होगा. नए भवन का निर्माण टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड करेगी. बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) नए संसद (Parliament) भवन के निर्माण के लिए भूमि पूजन 10 दिसंबर को करेंगे.

कुछ इस तरह की होगी संसद भवन की नई बिल्डिंग, 10 दिसंबर को पीएम मोदी करेंगे भूमि पूजन

नई बिल्डिंग में एक बड़ा कॉस्टीट्यूशन हॉल होगा, जिसमें भारत की लोकतांत्रिक विरासत की झलक दिखाई देगी. इसके अलावा, संसद सदस्यों के लॉन्ज, कई कमेटियों के लिए कमरे, डाइनिंग एरिया और पर्याप्त पार्किंग स्पेस होगा. 

संसद भवन की नई बिल्डिंग के भूमि पूजन का निमंत्रण पीएम मोदी को देने के लिए आज दोपहर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) प्रधानमंत्री आवास पहुंचे. बिरला ने प्रस्तावित भवन के बारे में विवरण पेश करते हुए कहा, ‘‘लोकतंत्र का वर्तमान मंदिर अपने 100 साल पूरे कर रहा है. यह देशवासियों के लिये गर्व का विषय होगा कि नए भवन का निर्माण हमारे अपने लोगों द्वारा किया जाएगा, जो आत्मनिर्भर भारत का एक प्रमुख उदाहरण होगा.''

उन्होंने कहा, ‘‘नए भवन के माध्यम से देश की सांस्कृतिक विविधता प्रदर्शित होगी. आशा है कि आजादी के 75 साल पूरे होने पर संसद का सत्र नए भवन में आयोजित होगा.'' लोकसभा अध्यक्ष के अनुसार, संसद की नयी इमारत भूकंप रोधी क्षमता वाली होगी और इसके निर्माण में 2000 लोग सीधे तौर पर शामिल होंगे तथा 9000 लोगों की परोक्ष भागीदारी होगी. उन्होंने बताया कि नए संसद भवन में 1224 सांसद एकसाथ बैठ सकेंगे और मौजूदा श्रम शक्ति भवन (संसद भवन के निकट) के स्थान पर दोनों सदनों के सांसदों के लिए कार्यालय परिसर का निर्माण कराया जाएगा.

बिरला ने कहा कि संसद के वर्तमान भवन को देश की पुरातात्त्विक संपत्ति के तौर पर संरक्षित रखा जाएगा. उन्होंने कहा कि नए भवन के निर्माण की आधारशिला संबंधी कार्यक्रम के लिए सभी राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया जाएगा. कुछ लोग मौके पर मौजूद होंगे तथा अन्य लोग डिजिटल माध्यम शामिल होंगे. इस कार्यक्रम में कोरोना वायरस से संबंधित सभी दिशा निर्देशों का पालन होगा.

बिरला ने शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी को इस कार्यक्रम का औपचारिक निमंत्रण दिया. नियमों के मुताबिक, लोकसभा का अध्यक्ष संसद भवन का संरक्षक भी होता है. नए भवन के निर्माण के दौरान वायु एवं ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त उपाय किए गए हैं.

बिरला का कहना है कि नए संसद भवन में सभी सांसदों के लिए अलग कार्यालय होंगे जो आधुनिक डिजिटल सुविधाओं से युक्त होंगे तथा यह ‘कागज रहित कार्यालय' बनाने की दिशा में कदम होगा. नए संसद भवन में एक विशाल संविधान कक्ष होगा, जिसमें भारत की लोकतांत्रिक धरोहर को प्रदर्शित किया जाएगा. इसके साथ ही सांसदों के लिए एक लॉन्ज होगा. उनके लिए पुस्तकालय, विभिन्न समितियों के कक्ष, भोजन कक्ष और पार्किंग क्षेत्र होगा.

इस भवन के लोकसभा कक्ष में 888 सदस्यों के बैठने की क्षमता होगी, जबकि राज्यसभा कक्ष में 384 सदस्य बैठ सकेंगे. यह भविष्य में दोनों सदनों के सदस्यों की संख्या में बढ़ोतरी किए जाने की संभावना को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है. मौजूदा में समय में लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 245 सदस्य हैं. यह नया भवन सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत है और इसे वर्तमान संसद भवन के नजदीक बनाया जाएगा.

अधिकारियों ने सितंबर में बताया था कि इसके लिए कंपनी ने 861.90 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी. संसद के नए परिसर को बनाने में तकरीबन एक साल लगने की उम्मीद है. एलएंडटी ने इस परियोजना के लिए 865 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी. केंद्रीय लोक निर्माण विभाग ने नए संसद भवन की अनुमानित लागत 940 करोड़ रुपये रखी थी. 

भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति के सामने 28.10.2020 को ट्विटर के प्रतिनिधि पेश हुए। उन्होंने सोशल मीडिया साइट पर लद्दाख को चीन का हिस्सा दिखाने वाली पोस्ट पर जवाब दिया। हालांकि, समिति इस जवाब से संतुष्ट नहीं है। समिति ने कहा कि ट्विटर का जवाब नाकाफी है और यह ऐसा अपराध है, जिसमें 7 साल तक की सजा हो सकती है।

मीनाक्षी लेखी ने कहा कि ट्विटर के रिप्रेजेंटेटिव डाटा प्रोटेक्शन बिल की संयुक्त समिति के सामने पेश हुए। इनमें ट्विटर इंडिया की सीनियर मैनेजर पब्लिक पॉलिसी शगुफ्ता कामरान, कानूनी सलाहकार आयुषी कपूर, पॉलिसी कम्युनिकेशन पल्लवी वालिया और कॉरपोरेट सिक्युरिटी के मनविंदर बाली शामिल थे।

ट्विटर के रिप्रेजेंटेटिव से कमेटी के सदस्यों ने लद्दाख को चीन का हिस्सा दिखाए जाने पर सवाल किया। ट्विटर ने समिति को बताया कि हम भारतीयों की भावनाओं का सम्मान करते हैं। लेखी ने कहा कि यह केवल संवेदनशीलता का मामला नहीं है। यह भारत की संप्रभुता और अखंडता का मसला है। समिति के सामने मिनिस्ट्री ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड जस्टिस के अधिकारी भी पेश हुए।

ट्विटर ने अपने प्लेटफॉर्म की जियो टैग लोकेशन में लद्दाख की राजधानी लेह और जम्मू-कश्मीर को चीन का हिस्सा दिखाया था। इस पर भारत सरकार ने कड़ी आपत्ति जाहिर की थी। केंद्र ने ट्विटर के CEO जैक डोरसी को एक चिट्ठी लिखकर कहा था कि इस तरह की हरकतों से ट्विटर की पारदर्शिता पर सवाल उठता है। इसके बाद ट्विटर ने माफी भी मांगी थी।

28 जनवरी 2020 को मेडागास्कर में चक्रवात आने की वजह से नौसेना ने ऑपरेशन 'वनीला' की शुरूआत की हैं जिसमें चक्रवात से प्रभावित लोगों की मदद की जाएगी और इसके लिए भारतीय नौसेना के ऐरावत को काम में लिया जा रहा हैं। वनीला ऑपरेशन को चक्रवात डायने द्वारा मचाई गई तबाही के बाद मेडागास्कर के प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान करने हेतु शुरू किया गया है।

भारतीय नौसेना के अनुसार "INS ऐरावत, को इस मिशन के लिए तैनात किया गया हैं, तथा जिसे उसी तरफ डायवर्ट कर दिया गया है"। भारतीय नौसेना जहाज चिकित्सा शिविर स्थापित करने और भोजन, पानी और अन्य आवश्यक राहत सामग्री प्रदान करने के लिए तैयार है।

मेडागास्कर को सहायता भारतीय नौसेना की विदेश सहयोग की पहल के तहत प्रदान की जा रही हैं, जो प्रधानमंत्री की 'Security and Growth for all in the Region (SAGAR)' 'सुरक्षा और क्षेत्र में सभी के लिए विकास' (SAGAR) के दृष्टिकोण के अनुरूप है। भारतीय नौसेना हिंद महासागर में मानवीय और आपदा राहत (HADR) के लिए सहायता देने वाला पहला संगठन है।

G-7 या द ग्रुप ऑफ़ सेवन (G7) एक अंतरराष्ट्रीय अंतर सरकारी आर्थिक संगठन है जिसमें दुनिया की सात सबसे बड़ी IMF द्वारा बतायी गयीं विकसित अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं. G-7 की स्थापना सन 1975 में 6 विकसित देशों (फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) ने की थी.अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इसका विस्तार करके G-10 या G-11 बनाना चाहते हैं जिसमें भारत भी शामिल होगा.

G–7 की 45 वीं बैठक फ़्रांस के बिआरिट्ज शहर में 24 से 26 अगस्त के बीच हुई जिसमें भारत की ओर से प्रधानमन्त्री मोदी ने भाग लिया था.

G–7 के सदस्य देश (Members of G-7)

विश्व के 7 सबसे विकसित राष्ट्र (फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंग्डम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा) विश्व की समस्याओं पर सभी का ध्यान दिलाने के लिए हर साल किसी देश में विचार विमर्श के लिए इकट्ठे होते हैं.

G–7, विश्व के सर्वोच्च सम्पन्न औद्योगिक देशों– फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंग्डम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा  का एक संघ है। यह समूह आर्थिक विकास एवं संकट प्रबंधन, वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा एवं आतंकवाद जैसे वैश्विक मुद्दों पर आमसहमति को बढ़ावा देने के लिए सालाना बैठक का आयोजन करता हैं।

G– 6 फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूके और अमेरिका से बना था। इसके बाद 1976 में इस समूह में कनाडा के शामिल होने के बाद यह G– 7 और 1998 में रूस के शामिल होने पर G– 8 बन गया. विभिन्न समयों पर G-7 का नाम G-8 भी हो जाता है और अब इसमें भारत,ऑस्ट्रेलिया, रूस और दक्षिण कोरिया को शामिल होने के बाद इसके G-11 होने आसार हैं. 

ये देश दुनिया के सबसे अधिक औद्योगिक गतिविधियों वाले देश हैं । G–7 का पहला शिखर सम्मेलन नवंबर 1975 में पेरिस के नजदीक रैमबोनीलेट (Rambonilet) में आयोजित किया गया था। वर्ष 2018 में G– 7 समूह के सदस्य देशों का वैश्विक निर्यात में 49%, विश्व की जीडीपी का 46% और दुनिया के कुल धन के 58% का मालिक है. औद्योगिक आउटपुट में 51% और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के परिसंपत्तियों में 49% हिस्सेदारी है।

G–20 (ग्रुप-20):-
सितंबर 1999 में G–7 देशों के वित्त मंत्रियों ने G–20 का गठन एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच के तौर पर किया था जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के साथ ब्रेटन वुड्स संस्थागत प्रणाली की रूपरेखा के भीतर आने वाले व्यवस्थित महत्वपूर्ण देशों के बीच अनौपचारिक बातचीत एवं सहयोग को बढ़ावा देता।

बीस का समूह (G–20) अपने सदस्यों के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और कुछ मुद्दों पर निर्णय करने के लिए प्रमुख मंच है। इसमें 19 देश और यूरोपीय संघ शामिल है। 

G–20 के नेता वर्ष में एक बार बैठक करते हैं; इसके अलावा, वर्ष के दौरान, देशों के वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंक के गवर्नर वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार लाने, वित्तीय नियमन में सुधार लाने और प्रत्येक सदस्य देश में जरुरी प्रमुख आर्थिक सुधारों पर चर्चा करने के लिए नियमित रूप से बैठक करते रहते हैं। इन बैठकों के अलावा वरिष्ठ अधिकारियों और विशेष मुद्दों पर नीतिगत समन्वय पर काम करने वाले कार्य समूहों के बीच वर्ष भर चलने वाली बैठकें भी होती हैं।

G–20 की शुरुआत, 1999 में एशिया में आए वित्तीय संकट के बाद वित्त मंत्रियों और सेंट्रल बैंक के गवर्नरों की बैठक के तौर पर हुई थी। वर्ष 2008 में G–20 के नेताओं का पहला शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था और समूह ने वैश्विक वित्तीय संकट का जवाब देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसकी निर्णायक और समन्वित कार्रवाई ने उपभोक्ता और व्यापार में भरोसा रखने वालों को शक्ति दी और आर्थिक सुधार के पहले चरण का समर्थन किया। वर्ष 2008 के बाद से G–20 के नेता आठ बार बैठक कर चुके हैं।

G–20 शिखर सम्मेलन में रोजगार के सृजन और मुक्त व्यापार पर अधिक जोर देने के साथ वैश्विक आर्थिव विकास को समर्थन देने के उपायों पर फोकस जारी है। प्रत्येक G–20 अध्यक्ष हर वर्ष कई अतिथि देशों को आमंत्रित करता है।
G–20– वित्तीय स्थिरता बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के साथ मिलकर काम करता है। कई अन्य संगठनों को भी G–20 की प्रमुख बैठकों में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

G–20 के सदस्य: (Members of G-20)-
G–20 के सदस्य वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का करीब 85%, वैश्विक व्यापार के 75% और विश्व की आबादी के दो– तिहाई से अधिक का प्रतिनिधित्व करते हैं।

G–20 के सदस्य हैं– अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, मैक्सिको, रूस, सउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ।

जी 20 शिखर सम्मेलन
             तिथि                          स्‍थान
1.     14-15, नवंबर, 2008        वाशिंगटन, अमेरिका
2.     2 अप्रैल, 2009                लंदन, यूनाईटेड किंगडम
3.     24-25, सितंबर, 2009       पीट्सबर्ग, अमेरिका
4.     26-27, जून, 2010          टोरंटो, कनाडा
5.     11-12, नवंबर, 2010        सियोल, दक्षिण कोरिया
6.     3-4, नवंबर, 2011           कान्स, फ्रांस
7.     18-19 जून, 2012           लॉस कॉबोस, मेक्सिको
8.     5-6, सितंबर, 2013          सेंट पीटर्सबर्ग, रूस
9.     15-16 नवंबर, 2014         बि्रसबेन, ऑस्‍ट्रेलिया
10.   15-16 नवंबर, 2015         अंतालिया तुर्की

11. 4-5 सितंबर 2016              हांगझोऊ, चीन

12. 7-8 जुलाई 2017              हैम्बर्ग, जर्मनी

13.  30 नवंबर - 1 दिसंबर 2018 ब्यूनस आयर्स, अर्जेंटीना

14. 28-29 जून, 2019            ओसाका, जापान

जिस तरह से हर व्यक्ति को पोषक तत्वों की जरूरत होती है, उसी तरह से पौधों को भी अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इन पोषक तत्वों के न मिल पाने से पौधों की वृद्धि रूक जाती है यदि ये पोषक तत्व एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधा सूख जाता है। वैज्ञानिक परीक्षणो के आधार पर 17 तत्वों को पौधो के लिए जरूरी बताया गया है, जिनके बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं। इनमें से मुख्य तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश है। नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश को पौधे अधिक मात्रा में लेते हैं, इन्हें खाद-उर्वरक के रूप में देना जरूरी है। इसके अलावा कैल्सियम, मैग्नीशियम और सल्फर की आवश्यकता कम होती है अतः इन्हें गौण पोषक तत्व के रूप मे जाना जाता है इसके अलावा लोहा, तांबा, जस्ता, मैंग्नीज, बोरान, मालिब्डेनम, क्लोरीन व निकिल की पौधो को कम मात्रा में जरूरत होती है।

1- नत्रजन के प्रमुख कार्य

  • नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है तथा पर्ण हरित के निर्माण में भी भाग लेती है। नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि एवं विकास में योगदान इस तरह से है-
  • यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है।
  • वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
  • अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है।
  • यह दानो के बनने में मदद करता है।

नत्रजन-कमी के लक्षण

  • पौधों मे प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना। निचली पत्तियाँ झड़ने लगती है, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं।
  • पौधे की बढ़वार का रूकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना।
  • फल वाले वृक्षों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना।

2- फॉस्फोरस के कार्य

  • फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन जल्द होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स व फाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
  • यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकान्ड्रिया का मुख्य अवयव है।
  • फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटरोधकता बढ़ती है।
  • फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा मजबूत होती हैं। पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है।
  • इससे फल जल्दी आते हैं, फल जल्दीबनते है व दाने जल्दी पकते हैं।
  • यह नत्रजन के उपयोग में सहायक है तथा फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है।

फॉस्फोरस-कमी के लक्षण

  • पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्का बैगनी या भूरा हो जाता है। फास्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी (निचली) पत्तियों पर दिखते हैं। दाल वाली फसलों में पत्तियां नीले हरे रंग की हो जाती हैं।
  • पौधो की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होता है कभी-कभी जड़े सूख भी जाती हैं।
  • अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना, फल व बीज का निर्माण सही न होना।
  • इसकी कमी से आलू की पत्तियां प्याले के आकार की, दलहनी फसलों की पत्तियाँ नीले रंग की तथा चौड़ी पत्ती वाले पौधे में पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है।

3- पोटैशियम के कार्य

  • जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है।
  • स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है।
  • अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है। सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है। मृदा में नत्रजन के कुप्रभाव को दूर करता है।

पोटैशियम-कमी के लक्षण

  • पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले गिर जाती हैं।
  • पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़ते हैं।
  • इसी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले तथा किनारोंपर दाने कम पड़ते हैं। आलू में कन्द छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है
  • पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया कम तथा श्वसन की क्रिया अधिक होती है।

4- कैल्सियम के कार्य

  • यह गुणसूत्र का संरचनात्मक अवयव है। दलहनी फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक है।
  • यह तत्व तम्बाकू, आलू व मूँगफली के लिए अधिक लाभकारी है।
  • यह पौधों में कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।

कैल्सियम-कमी के लक्षण

  • नई पत्तियों के किनारों का मुड़ व सिकुड़ जाना। अग्रिम कलिका का सूख जाना।
  • जड़ों का विकास कम तथा जड़ों पर ग्रन्थियों की संख्या में काफी कमी होना।
  • फल व कलियों का अपरिपक्व दशा में मुरझाना।

5- मैग्नीशियम के कार्य

  • क्रोमोसोम, पोलीराइबोसोम तथा क्लोरोफिल का अनिवार्य अंग है।
  • पौधों के अन्दर कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।
  • पौधों में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के निर्माण मे सहायक है।
  • चारे की फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।

मैग्नीशियम-कमी के लक्षण

  • पत्तियां आकार में छोटी तथा ऊपर की ओर मुड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं।
  • दलहनी फसलों में पत्तियो की मुख्य नसों के बीच की जगह का पीला पड़ना।

6 गन्धक (सल्फर) के कार्य

  • यह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है।
  • विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम 3ए22 के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है।
  • यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये जरूरी है। तम्बाकू की पैदावार 15-30 प्रतिशत तक बढ़ती है।

गन्धक-कमी के लक्षण

  • नई पत्तियों का पीला पड़ना व बाद में सफेद होना तने छोटे एवं पीले पड़ना।
  • मक्का, कपास, तोरिया, टमाटर व रिजका में तनों का लाल हो जाना।
  • ब्रेसिका जाति (सरसों) की पत्तियों का प्यालेनुमा हो जाना।

7- लोहा (आयरन) के कार्य

  • लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है।
  • क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है।
  • यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है। श्वसन क्रिया में आक्सीजन का वाहक है।

लोहा-कमी के लक्षण

  • पत्तियों के किनारों व नसों का अधिक समय तक हरा बना रहना।
  • नई कलिकाओं की मृत्यु को जाना तथा तनों का छोटा रह जाना।
  • धान में कमी से क्लोरोफिल रहित पौधा होना, पैधे की वृद्धि का रूकना।

8- जस्ता (जिंक) के कार्य

  • कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है।
  • हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है।
  • यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, लेसीथिनेज, इनोलेज, डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है। क्लोरोफिल निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है।

जस्ता-कमी के लक्षण

  • पत्तियों का आकार छोटा, मुड़ी हुई, नसों मे निक्रोसिस व नसों के बीच पीली धारियों का दिखाई पड़ना।
  • गेहूं में ऊपरी 3-4 पत्तियों का पीला पड़ना।
  • फलों का आकार छोटा व बीज की पैदावार का कम होना।
  • मक्का एवं ज्वार के पौधों में बिलकुल ऊपरी पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं।
  • धान में जिंक की कमी से खैरा रोग हो जाता है। लाल, भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं।

9- ताँबा (कॉपर ) के कार्य

  • यह इंडोल एसीटिक अम्ल वृद्धिकारक हार्मोन के संश्लेषण में सहायक है।
  • ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है।
  • अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है।

ताँबा-कमी के लक्षण

  • फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।
  • अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों में रिक्लेमेशन नामक बीमारी होना।

10- बोरान के कार्य

  • पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है।
  • दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है।
  • यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है।
  • यह डीएनए, आरएनए, एटीपी पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है

बोरान-कमी के लक्षण

  • पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना।
  • पौधों मे बौनापन होना। जड़ का विकास रूकना।
  • बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप-सिकनेस नामक बीमारी का लगना।

11- मैंगनीज के कार्य

  • क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वागीकरण में सहायक है।
  • पौधों में ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
  • प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।

मैंगनीज-कमी के लक्षण

  • पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं।
  • अनाज की फसलों में पत्तियाँ भूरे रंग की व पारदर्शी होती है तथा बाद मे उसमे ऊतक गलन रोग पैदा होता है। जई में भूरी चित्ती रोग, गन्ने का अगमारी रोग तथा मटर का पैंक चित्ती रोग उत्पन्न होते हैं।

12- क्लोरीन के कार्य

  • यह पर्णहरिम के निर्माण में सहायक है। पोधो में रसाकर्षण दाब को बढ़ाता है।
  • पौधों की पंक्तियों में पानी रोकने की क्षमता को बढ़ाता है।

क्लोरीन-कमी के लक्षण

  • गमलों में क्लोरीन की कमी से पत्तियों में विल्ट के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
  • कुछ पौधों की पत्तियों में ब्रोन्जिंग तथा नेक्रोसिस रचनायें पाई जाती हैं।
  • पत्ता गोभी के पत्ते मुड़ जाते हैं तथा बरसीम की पत्तियाँ मोटी व छोटी दिखाई पड़ती हैं।

13- मालिब्डेनम के कार्य

  • यह पौधों में एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवंनाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है।
  • यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है।
  • पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है।

मालिब्डेनम-कमी के लक्षण

  • सरसों जाति के पौधो व दलहनी फसलों में मालिब्डेनम की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं।
  • पत्तियों का रंग पीला हरा या पीला हो जाता है तथा इसपर नारंगी रंग का चितकबरापन दिखाई पड़ता है।
  • टमाटर की निचली पत्तियों के किनारे मुड़ जाते हैं तथा बाद में मोल्टिंग व नेक्रोसिस रचनायें बन जाती हैं।
  • इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं।
  • नीबू जाति के पौधो में मॉलिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग लगता है।
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि को इसका मेरुदंड कहा जाता है. देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में उत्तर प्रदेश का स्थान प्रथम है. प्रदेश में कुल रोजगार का 59% कृषि क्षेत्र से मिलता है. वित्त वर्ष 2016 वर्तमान मूल्य पर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 54,658 रुपये थी. इस लेख में उत्तर प्रदेश के कृषि विकास से सम्बंधित मुख्य तथ्यों को बताया गया है. ये सभी तथ्य आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत जरूरी हैं.

उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि को इसका मेरुदंड (spinal cord) कहा जाता है. देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में उत्तर प्रदेश का स्थान प्रथम है.  इस प्रदेश में पूरे वर्ष में 3 प्रकार की फसलें (रबी, खरीफ और जायद) पैदा की जातीं हैं. आइये इस लेख में आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कृषि पर आधारित कुछ जरूरी तथ्यों पर नजर डालते हैं;

1. प्रदेश में कुल रोजगार का 59% कृषि क्षेत्र से मिलता है. वित्त वर्ष 2016 वर्तमान मूल्य पर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 54,658 रुपये थी.

2. वित्त वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक क्षेत्र का योगदान क्रमशः 24%, 27% और 49% था.

3. उत्तर प्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक दूध का उत्पादन करने वाला प्रदेश है. देश के कुल दुग्ध उत्पादन में इस प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 16.83 प्रतिशत है. वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान, राज्य का दूध उत्पादन लगभग 27.77 मिलियन टन था.  

उत्तर प्रदेश के प्रमुख उद्योगों की अवस्थिति

4. प्रदेश में कृषि जोत का औसत आकार 0.76 हेक्टेयर है जो कि राष्ट्रीय औसत 1.15 हेक्टेयर से कम है.

5. वर्ष 2017-18 में, राज्य भारत में सब्जियों का सबसे बड़ा उत्पादक (28,226 हजार टन) था.

6. वित्त वर्ष 2016-17 में प्रदेश में खाद्य अनाज उत्पादन 49,144.6 हजार टन था. राज्य में उत्पादित प्रमुख खाद्य अनाज उत्पादन में चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा, चना, मटर और मसूर शामिल हैं. वर्ष 2017-18 में राज्य में दाल उत्पादन 1,985. हजार टन था.

7. उत्तर प्रदेश; भारत में अनाज का सबसे बड़ा उत्पादक है और 2016-17 में देश के कुल अनाज उत्पादन में लगभग 17.83 प्रतिशत हिस्सेदारी थी.

8. उत्तर प्रदेश निम्न खाद्यान्नों के उत्पदान में प्रदेश में प्रथम स्थान पर है; गेहूं, जौ, गन्ना, आलू और मसूर.

9. प्रदेश में आम के उत्पदान में निम्न तीन जिले प्रमुख हैं; लखनऊ, सहारनपुर और बुलंदशहर

10. प्रदेश में आंवला सबसे अधिक प्रतापगढ़ और इलाहाबाद में पैदा होता है.

11. अमरुद का सबसे अधिक उत्पादन क्रमशः शाहजहांपुर, और फर्रुखाबाद जिलों में होता है.

12. अफीम उत्पादन में बाराबंकी सबसे आगे है.

13. गाजीपुर में राज्य की एक मात्र अफीम फैक्ट्री है

14. प्रदेश में सबसे अधिक लीची उत्पादन सहारनपुर और मेरठ में होती है.

15. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में सर्वाधिक संतरे का उत्पादन किया जाता है.

16. प्रदेश में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नकदी फसल गन्ना है जो सर्वाधिक सिंचित भी है. मेरठ जिले का गन्ना सबसे उत्तम कोटि का माना जाता है.

17. प्रदेश के इन जिलों में गेहूं प्रमुख रूप से पैदा किया जाता है; मेरठ,बुलंदशहर,सहारनपुर, आगरा अलीगढ़, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, इटावा कानपुर, फर्रुख्बाद और फतेहपुर. ध्यान रहे कि उत्तर प्रदेश के दक्षिणी पठारी क्षेत्र में कृषि नहीं की जाती है.

18. प्रदेश के प्रमुख चावल उत्पादक जिले इस प्रकार हैं; पीलीभीत, सहारनपुर, महाराजगंज, देवरिया ,गोंडा, बहराइच बस्ती, रायबरेली, बलिया, लखनऊ, वाराणसी और गोरखपुर हैं.

देश की श‍िक्षा नीति में 34 साल बाद नये बदलाव किए गए हैं. 29.07.2020 को इस नई श‍िक्षानीति को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी. नई शिक्षा नीति (New Education Policy) के तहत बोर्ड परीक्षा (Board Exams) को सरल बनाने, पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के साथ ही बचपन की देखभाल और शिक्षा पर जोर देते हुए स्कूल पाठ्यक्रम के 10+2 ढांचे में बदलाव किया गया है.

नई श‍िक्षा नीति में स्कूल के बस्ते, प्री प्राइमरी क्लासेस से लेकर बोर्ड परीक्षाओं, रिपोर्ट कार्ड, यूजी एडमिशन के तरीके, एमफिल तक बहुत कुछ बदला है. यहां जानें आख‍िर न्यू एजुकेशन पॉलिसी में इतने सालों बाद क्या बदला है.

इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा के साथ कृषि शिक्षा, कानूनी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसी व्यावसायिक शिक्षाओं को इसके दायरे में लाया गया है. इसका मुख्य उद्देश्य है कि छात्रों को पढ़ाई के साथ साथ किसी लाइफ स्‍क‍िल से सीधा जोड़ना.

अभी तक आप आर्ट, म्यूजिक, क्राफ्ट, स्पोर्ट्स, योग आदि को सहायक पाठ्यक्रम (co curricular) या अतिरिक्त पाठ्यक्रम (extra curricular) एक्ट‍िविटी के तौर पर पढ़ते आए हैं. अब ये मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे, इन्हें एक्स्ट्रा करिकुलर एक्ट‍िविटी भर नहीं कहा जाएगा.

अभी तक शादी होने या किसी के बीमार होने पर किसी की पढ़ाई बीच में छूट जाती थी. अब ये व्यवस्था है कि अगर किसी कारण से पढ़ाई बीच सेमेस्टर में छूट जाती है तो इसे मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम के तहत आपको लाभ मिलेगा. मतलब अगर आपने एक साल पढ़ाई की है तो सर्टिफिकेट, दो साल की है तो डिप्लोमा मिलेगा. तीन या चार साल के बाद डिग्री दी जाएगी.

सरकार ने तय किया है कि अब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का कुल 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च होगा. फिलहाल भारत की जीडीपी का 4.43% हिस्सा शिक्षा पर खर्च होता है. वहीं मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर अब शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है. ये भी बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव है.

आयोग ने शिक्षकों के प्रशिक्षण पर खास जोर दिया है. जाहिर है कि एक अच्छा टीचर ही एक बेहतर स्टूडेंट तैयार करता है. इसलिए व्यापक सुधार के लिए शिक्षक प्रशिक्षण और सभी शिक्षा कार्यक्रमों को विश्वविद्यालयों या कॉलेजों के स्तर पर शामिल करने की सिफारिश की गई है.

सरकार अब न्यू नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क तैयार करेगी. इसमें ईसीई, स्कूल, टीचर्स और एडल्ट एजुकेशन को जोड़ा जाएगा. बोर्ड एग्जाम को भाग में बांटा जाएगा. अब दो बोर्ड परीक्षाओं को तनाव को कम करने के लिए बोर्ड तीन बार भी परीक्षा करा सकता है.

इसके अलावा अब बच्चों के रिपोर्ट कार्ड में लाइफ स्किल्स को जोड़ा जाएगा.जैसे कि आपने अगर स्कूल में कुछ रोजगारपरक सीखा है तो इसे आपके रिपोर्ट कार्ड में जगह मिलेगी. जिससे बच्चों में लाइफ स्किल्स का भी विकास हो सकेगा. अभी तक रिपोर्ट कार्ड में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था.

सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक हर बच्चे के लिए शिक्षा सुनिश्चित की जाए. इसके लिए एनरोलमेंट को 100 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है. इसके अलावा स्कूली शिक्षा के निकलने के बाद हर बच्चे के पास लाइफ स्किल भी होगी. जिससे वो जिस क्षेत्र में काम शुरू करना चाहे, तो वो आसानी से कर सकता है.

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए कॉमन एंट्रेंस एग्जाम का ऑफर दिया जाएगा. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुसार, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (National Education Policy, NEP) को अब देश भर के विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के लिए एडिशनल चार्ज दिया जाएगा. जिसमें वह हायर एजुकेशन के लिए आम यानी कॉमन एंट्रेंस परीक्षा का आयोजन कर सकता है.

NTA पहले से ही ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम JEE Main, मेडिकल प्रवेश परीक्षा - NEET, UGC NET, दिल्ली विश्वविद्यालय (DUET), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNUEE) जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है.

पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान पद्धतियों को शामिल करने, 'राष्ट्रीय शिक्षा आयोग' का गठन करने और प्राइवेट स्कूलों को मनमाने तरीके से फीस बढ़ाने से रोकने की सिफारिश की गई है. ये राष्ट्रीय श‍िक्षा आयोग भारत की प्राचीन ज्ञान पद्धतियों को समग्रता के साथ श‍िक्षा से जोड़ने का काम करेगा.

रिसर्च में जाने वालों के लिए भी नई व्यवस्था की गई है. उनके लिए 4 साल के डिग्री प्रोग्राम का विकल्प दिया जाएगा. यानी तीन साल डिग्री के साथ एक साल एमए करके एम फिल की जरूरत नहीं होगी. इसके बाद सीधे पीएचडी में जा सकते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि सरकार ने नई श‍िक्षा नीति में अब एमफिल को पूरी तरह खत्म करने की बात कही है.

मल्टीपल डिसिप्लनरी एजुकेशन में अब आप किसी एक स्ट्रीम के अलावा दूसरा सब्जेक्ट भी ले सकते हैं. यानी अगर आप इंजीनियरिंग कर रहे हैं और आपको म्यूजिक का भी शौक है तो आप उस विषय को भी साथ में पढ़ सकते हैं. अब स्ट्रीम के अनुसार सब्जेक्ट लेने पर जोर नहीं होगा. पहले जैसे स्ट्रीम के अनुसार सब्जेक्ट का चुनाव करना होता था, अब उसमें भी बदलाव आएगा.

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा में बहुभाषिकता को प्राथमिकता के साथ शामिल करने और ऐसे भाषा शिक्षकों की उपलब्धता को महत्व दिया दिया गया है जो बच्चों के घर की भाषा समझते हों. यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राज्यों में दिखाई देती है. इसलिए पहली से पांचवीं तक जहां तक संभव हो मातृभाषा का इस्तेमाल शिक्षण के माध्यम के रूप में किया जाए. जहां घर और स्कूल की भाषा अलग-अलग है, वहां दो भाषाओं के इस्तेमाल का सुझाव दिया गया है.

लड़कियों की शिक्षा जारी रहे इसके लिए उनको भावनात्मक रूप से सुरक्षित वातावरण देने का सुझाव दिया गया है. इसके लिए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का विस्तार 12वीं तक करने का सुझाव नई शिक्षा नीति-2019 में है.

U.S. की NSF (नेशनल साइंस फाउंडेशन) की तर्ज पर सरकार NRF (नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) ला रही है. इसमें न केवल साइंस बल्कि सोशल साइंस भी शामिल होगा. ये बड़े प्रोजेक्ट्स की फाइनेंसिंग करेगा. ये शिक्षा के साथ रिसर्च में युवाओं को आगे आने में मदद करेगा.

पहली व दूसरी कक्षा में भाषा व गणित पर काम करने पर जोर देने की बात नई शिक्षा नीति में शामिल है. इसके साथ ही चौथी व पांचवीं के बच्चों के साथ लेखन कौशल पर काम करने पर भी ध्यान देने की बात कही गई है. इसके  लिए भाषा सप्ताह, गणित सप्ताह व भाषा मेला या गणित मेला जैसे आयोजन होंगे.

इसमें पुस्तकालयों को जीवंत बनाने और अन्य एक्ट‍िविटी को कराने पर ध्यान देने की बात कही गई है. जैसे बच्चे स्टोरी टेलिंग, रंगमंच, ग्रुप स्टडी, पोस्टर और डिस्प्ले से भी सीखें. बच्चों को किताबों के अलावा दूसरे माध्यमों से सिखाने पर जोर है, ये बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के उद्देश्य से भी जरूरी माना गया है.

अर्ली चाइल्डहुड केयर एवं एजुकेशन के लिए करिकुलम एनसीईआरटी द्वारा तैयार होगा. इसे 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए डेव‍लप किया जाएगा. इसमें बुनियादी शिक्षा (6 से 9 वर्ष के लिए) के लिए फाउंडेशनल लिट्रेसी एवं न्यूमेरेसी पर नेशनल मिशन शुरू किया जाएगा.

इसके लिए राष्ट्रीय श‍िक्षा नीति में गिफ्टेड चिल्ड्रेन एवं गर्ल चाइल्ड के लिए विशेष प्रावधान किया गया है. इसके अलावा पॉलिसी में कक्षा 6 के बाद से ही वोकेशनल स्टडी को जोड़ा जाएगा.

शिक्षकों के सपोर्ट के लिए टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने की बात भी नई शिक्षा नीति में शामिल है. इसके लिए कंप्यूटर, लैपटॉप व फोन इत्यादि के जरिए विभिन्न ऐप का इस्तेमाल करके शिक्षण को रोचक बनाने की बात कही गई है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग की परिभाषा बदल दी गई है. इसमें निवेश की लिमिट में बदलाव किया गया है. 1 करोड़ निवेश या 10 करोड़ टर्नओवर पर सूक्ष्म उद्योग का दर्जा दिया जाएगा.

इसी तरह 10 करोड़ निवेश या 50 करोड़ टर्नओवर पर लघु उद्योग का दर्जा दिया जाएगा. वहीं 20 करोड़ निवेश या 100 करोड़ टर्नओवर पर मध्यम उद्योग का दर्जा होगा.निर्मला सीतारमण ने बताया कि मौजूदा दौर में ट्रेड फेयर संभव नहीं है.

200 करोड़ तक का टेंडर ग्‍लोबल नहीं होगा. यह एमएसएमई के लिए बड़ा कदम है. इसके अलावा एमएसएमई को ई-मार्केट से जोड़ा जाएगा. सरकार एमएसएमई के बाकी पेंमेंट 45 दिनों के अंदर करेगी.

वित्त मंत्री के मुताबिक 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में से 3 लाख करोड़ एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को जाएंगे. इनको बिना गारंटी लोन मिलेगा. इसकी समयसीमा 4 साल की होगी. इन्‍हें 12 महीने की छूट मिलेगी. ये ऑफर 31 अक्‍टूबर 2020 तक के लिए है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने  कोरोना वायरस को महामारी (pandemic) घोषित कर दिया गया है.

भारत में कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या 73 हो गई है. पीड़ित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. इस वायरस के चलते भारत सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए दुनिया के सभी देशों के लिए जारी वीजा को रद्द कर दिया है. ये वीजा अभी 15 अप्रैल तक के लिए रद्द कर दिया गया है. जिसका मतलब ये है कि दुनिया का कोई भी नागरिक कोरोना वायरस की वजह से भारत में नहीं आ पाएगा. सिर्फ डिप्लोमेट्स को इस फैसले में छूट है.

मेडिकल साइंस की भाषा में पैनडेमिक बीमारी के ऐसे हालात को कहा जाता है. जिसकी वजह से दुनियाभर में एक ही समय पर बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हो जाते हैं. साल 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने  स्वाइन फ्लू (swine flu H1N1) को महामारी घोषित कर दिया था.  जिसकी वजह से कई लोगों की जान गई थी.

केंद्र सरकार, असम सरकार और बोडो समूहों – जिसमें चरमपंथी गुट नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (NDFB) के सभी गुट शामिल हैं – ने शांति और विकास के लिए बोडोलैंड समझौते पर हस्ताक्षर किए। 

फिलहाल क्या समझौता हुआ है?

बोडोलैंड को अब तक आधिकारिक तौर पर बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) कहा जाता है। नए समझौते के लागू होने के बाद इसका नाम बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (बीटीआर) हो जाएगा। बीटीआर को अधिक अधिकार दिए जाएंगे। बीटीसी की मौजूजा 40 सीटों को बढ़ाकर 60 कर दिया जाएगा और इलाके में कई नए जिलों का गठन होगा। गृह विभाग को छोड़ अन्य विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार बीटीआर के पास रहेंगे।

समझौते में कहा गया है, “असम राज्य की क्षेत्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखते हुए उनकी मांगों के लिए एक व्यापक और अंतिम समाधान के लिए बोडो संगठनों के साथ बातचीत की गई।”

बीटीसी क्या थी ?यह संविधान की छठी अनुसूची के तहत एक स्वायत्त निकाय थी। पहले दो बोडो समझौते हुए हैं। दूसरे समझौते के बाद बीटीसी का गठन हुआ। 1987 से ABSU के नेतृत्व वाला जो आंदोलन शुरू हुआ था, वह 1993 में बोडो समझौते के बाद समाप्त हुआ। इस समझौते ने बोडोलैंड स्वायत्त परिषद (BAC) का मार्ग प्रशस्त किया, लेकिन ABSU ने अपना समझौता वापस ले लिया और एक अलग राज्य की अपनी मांग शुरू की। 2003 में दूसरे बोडो समझौते पर चरमपंथी समूह बोडो लिबरेशन टाइगर फोर्स (BLTF), केंद्र सरकार और राज्य ने हस्ताक्षर किए थे। इसके चलते बीटीसी हुई थी।

बोडो मुद्दे का इतिहास

असम में अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों में बोडो एक बड़ा समुदाय है। असम की आबादी का 5 से 6 प्रतिशत हिस्सा बोडो का है। बोडो राज्य बनाने की पहली संगठित मांग 1967-68 में असम के राजनीतिक दल प्लेन्स ट्राइबल काउंसिल के बैनर तले की गई थी। 1985 में असम आंदोलन का समापन असम समझौते में हुआ। इस समझौते को बोडो समुदाय के कई लोगों ने असमिया भाषी समुदाय के हितों पर ध्यान केंद्रित करने के रूप में देखा।
1987 में उपेंद्र नाथ ब्रह्मा के नेतृत्व में ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (ABSU) ने बोडो राज्य की मांग को फिर से उठाया। अक्टूबर 1986 में रंजन दायमरी के नेतृत्व में सशस्त्र समूह बोडो सिक्योरिटी फोर्स का गठन हुआ। बाद में इसका नाम बदलकर एनडीएफबी कर दिया गया और बाद में यह कई गुटों में बंट गया।
27 जनवरी 2020 को केंद्र सरकार, असम सरकार और एनडीएफबी ने समझौते पर हस्ताक्षर किया। समझौते के ज्ञापन में कहा गया है, ” सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स के तहत सभी एनएफडीबी गुट हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे, अपने हथियार सरेंडर कर देंगे और इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने के भीतर अपने हथियारबंद संगठनों को समाप्त कर देंगे।”

मिशन इंद्रधनुष अभियान को भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी बच्चों को टीकाकरण के अंतर्गत लाने के लिये "'मिशन इंद्रधनुष'" को सुशासन दिवस के अवसर पर 25 दिसंबर 2014 प्रारंभ किया गया था ' इंद्रधनुष के सात रंगों को प्रदर्शित करने वाला मिशन इंद्रधनुष का उद्देश्य उन बच्चों का 2020 तक टीकाकरण करना है जिन्हें टीके नहीं लगे हैं या डिफ्थेरिया, बलगम, टिटनस ,पोलियो, तपेदिक, खसरा तथा हेपिटाइटिस-बी को रोकने जैसे सात टीके आंशिक रूप  से लगे हैं।

पहले चरण में देश में 221 जिलों की पहचान की है, जिसमें 50 प्रतिशत बच्चों को टीके नहीं लगे हैं या उन्हें आंशिक रूप से टीके लगाए गए हैं। इन जिलों को नियमित रूप से टीकाकरण की स्थिति सुधारने के लिए लक्ष्य बनाया जाएगा। मंत्रालय का कहना है कि 201 जिलों में से 82 जिले केवल चार राज्य-उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश तथा राजस्थान से हैं और चार राज्यों के 42 जिलों में 25 प्रतिशत बच्चों को टीके नहीं लगाए गए हैं या उन्हें आंशिक रूप से टीके लगाए गए हैं।

 

भारत में टीकों से वंचित या आंशिक टीकाकरण वाले करीब 25 प्रतिशत बच्चे इन चार राज्यों के 82 जिलों में हैं। देश में नियमित टीकाकरण कवरेज में सुधार के लिए इन जिलों में गहन प्रयास किए जाएंगे। इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य भारत में सभी बच्चों और गर्भवती महिलाओं को ऐसी बीमारियों से सुरक्षित करना है जिनसे बचाव संभव है।

विशेष ध्यान वाले क्षेत्र

मिशन इंद्रधनुष के तहत पहले चरण में 201 जिलों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का लक्ष्य तय किया है तथा 2015 में दूसरे चरण में 297 जिलों को लक्ष्य बनाया गया है। मिशन के पहले चरण का कार्यान्वयन 201 उच्च प्राथमिकता वाले जिलों में 7 अप्रैल,2015 पर विश्व स्वास्थ्य दिवस से प्रारंभ हुआ।

वाली बस्तियों पर ध्यान दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में भौगोलिक, जनांकिकीय, जातीय और संचालन संबंधी अन्य चुनौतियों के कारण कम टीके लगाए जा सके हैं। प्रमाणों से पता चलता है कि अधिकतर टीकाकरण से वंचित और आंशिक टीकाकृत बच्चे इन्हीं क्षेत्रों में हैं।

विशेष टीकाकरण अभियानों के जरिए निम्नलिखित क्षेत्रों को लक्ष्य बनाया जाएगा:

पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम के जरिए उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की गई। इन क्षेत्रों में ऐसी आबादी रहती है

  1. प्रवासियों की शहरी झुग्गी बस्तियां

  2. घुमंतू प्रजातियां

  3. भट्टा मजदूर

  4. निर्माण स्थल

  5. अन्य प्रवासी ( मछुआरों के गांव, दूसरी जगह रहने वाली आबादी के नदी तटीय क्षेत्र इत्यादि) तथा

  6. अल्प सेवा पहुंच वाले और दूर दराज के क्षेत्र ( वन क्षेत्र में रहने वाली और आदिवासी आबादी इत्यादि)

  7. निम्न नियमित टीकाकरण वाले क्षेत्र (खसरे वाले क्षेत्र / टीका निवारक रोग प्रकोप वाले क्षेत्र)

  8. खाली पड़े उप-केंद्र वाले क्षेत्र: तीन महीनों से अधिक समय से कोई एएनएम तैनात नहीं

  9. नियमित टीकाकरण से अछूते रह गए क्षेत्र: एएनएम लंबी छुट्टी पर या ऐसा ही कोई अन्य कारण

  10. छोटे गांव, बस्तियों, आरआई सत्रों के लिए अन्य गांव के साथ जोड़े गए धनिस या पुरबास

रोगों की पहचान

मिशन इंद्रधनुष के लिए सात बीमारियों डिप्थीरिया, काली खांसी, टेटनस, पोलियो, टीबी (क्षय रोग), खसरा और हेपेटाइटिस-बी रोगों की पहचान की गई है।

कार्यक्रम के लक्ष्य

मंत्रालय का कहना है कि प्रतिवर्ष पांच प्रतिशत और उससे अधिक बच्चों को टीकाकरण कवरेज में शामिल करने की प्रक्रिया तेज करने के लिए तथा 2020 तक संपूर्ण कवरेज के लक्ष्य को हासिल करने के लिए मिशन को अपनाया गया है। योजना के अनुसार प्रणालीबद्ध टीकाकरण अभियान पुराने अभियान के जरिए चलाया जाएगा, जिसका लक्ष्य उन बच्चों को कवर करना है जो टीकाकरण से वंचित रह गए हैं। ऐसा लक्षित है कि मिशन इंद्रधनुष के अंतर्गत जनवरी तथा जून 2015 के बीच चार विशेष टीकाकरण अभियान चलाए जाएंगे। इसकी व्यापक नीति होगी और अभियानों की निगरानी की जाएगी। मिशन की नीति बनाने और उसे लागू करने में पोलियो कार्यक्रम के कार्यान्वयन की सफलता से सीख ली जाएगी। पहले चरण में 201 जिले कवर किए जाएंगे और 2015 में दूसरे चरण में 297 जिलों को लक्ष्य बनाया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने विभिन्न महत्वपूर्ण संगठनों को भी इसमें भागीदारी दी है निर्धारित है कि  विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रोटरी इंटरनेशनल तथा अन्य दाता सहयोगी मंत्रालय को तकनीकी समर्थन देंगे। मास मीडिया, अंतर-वैयक्तिक संचार, निगरानी की मजबूत व्यवस्था, योजना मूल्यांकन मिशन इंद्रधनुष के महत्वपूर्ण घटक हैं।

धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के सभी घरों तक बिजली पहुंचाने के लिए 'सौभाग्य' योजना की शुरुआत की है. नरेंद्र मोदी ने जनसंघ नेता दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर इस महत्वपूर्ण योजना की घोषणा की है. सौभाग्य का मतलब 'सहज बिजली हर घर योजना' है. इसके तहत साल 2019 तक हर गांव, हर शहर के हर घर तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. मोदी की मंशा है कि 31 मार्च 2019 तक इसे पूरा किया जाय.

इस योजना के तहत साल 2011 के सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना में दर्ज गरीबों को बिजली का कनेक्शन फ्री दिया जाएगा. जिन लोगों का नाम इस जनगणना में नहीं है वह भी 500 रुपये का भुगतान कर बिजली का कनेक्शन हासिल कर सकेंगे. इस राशि को 10 बराबर किस्तों में बिजली के बिलों के रूप में वसूला जाएगा.

सौभाग्य योजना के तहत सुदूर व दुर्गम क्षेत्रों में बिजली से वंचित लोगों को मोदी सरकार बैटरी बैंक उपलब्ध कराएगी. इसके तहत 200 से 300 डब्ल्यूपी का सोलर पावर पैक दिया जायेगा, जिसमें पांच एलईडी लाइट, एक पंखा, एक पावर प्लग काम कर पायेगा. इस पैक के लिए 5 साल की मेंटेनेंस की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी. सौभाग्य योजना के तहत सबको बिजली उपलब्ध कराने की इस पहल में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान व पूर्वोत्तर राज्य शामिल हैं.

हर साल प्राकृतिक आपदा के चलते भारत में किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. बाढ़, आंधी, ओले और तेज बारिश से उनकी फसल खराब हो जाती है. उन्हें ऐसे संकट से राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) शुरू की है. इसे 13 जनवरी 2016 को शुरू किया गया था.

इसके तहत किसानों को खरीफ की फसल के लिये 2 फीसदी प्रीमियम और रबी की फसल के लिये 1.5% प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता है.

PMFBY में प्राकृतिक आपदाओं के कारण खराब हुई फसल के मामले में बीमा प्रीमियम को बहुत कम रखा गया है. इससे PMFBY तक हर किसान की पहुंच बनाने में मदद मिली है.

PMFBY योजना वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के लिए भी बीमा सुरक्षा प्रदान करती है. इसमें हालांकि किसानों को 5% प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता है.

भारतीय कृषि बीमा कंपनी (एआईसी या AIC) इस योजना को चलाती है.

योजना के उद्देश्य

  1. प्राकृतिक आपदा, कीड़े और रोग की वजह से सरकार द्वारा अधिसूचित फसल में से किसी नुकसान की स्थिति में किसानों को बीमा कवर और वित्तीय सहायता देना.

  2. किसानों की खेती में रुचि बनाये रखने के प्रयास एवं उन्हें स्थायी आमदनी उपलब्ध कराना.

  3. किसानों को कृषि में इन्नोवेशन एवं आधुनिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना.

  4. कृषि क्षेत्र में ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करना.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार, (1 फरवरी 2020) को प्रधानमंत्री कृषि ऊर्जा सुरक्षा उत्थान महाभियान (पीएम कुसुम) के विस्तार की घोषणा की। इस योजना के तहत 20 लाख किसानों को सोलर पंप लगाने में मदद की जाएगी।

वित्त मंत्री ने 2020-21 का बजट पेश करते हुए कहा कि 15 लाख किसानों को ग्रिड से जुड़े सोलर पंप लगाने के लिए धन मुहैया कराया जाएगा। किसान इन सोलर पंपों से बनने वाली अतिरिक्त बिजली की आपूर्ति ग्रिड को भी कर सकेंगे। मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में फरवरी 2019 में पीएम कुसुम योजना की शुरुआत की थी, जिसके लिए 34,422 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। 

सीतारमण ने लोकसभा में कहा कि इस योजना से किसानों की डीजल और केरोसिन तेल पर निर्भरता घटी है और वे सौर ऊर्जा से जुड़े हैं। इस योजना से किसान सौर ऊर्जा उत्पादन करने और उसे ग्रिड को बेचने में सक्षम हुए हैं। उन्होंने कहा कि किसान अपनी बंजर जमीन पर सौर ऊर्जा पैदा कर आमदनी भी कमा सकेंगे। 

पीएम कुसुम योजना के तीन घटक हैं- 10,000 मेगावाट क्षमता के ग्रिड से जुड़े विकेंद्रीकृत नवीकरणीय बिजली संयंत्र, 17.50 लाख ग्रिड से पृथक सौर बिजली कृषि पंप और ग्रिड से जुड़े हुए 10 लाख सौर बिजली कृषि पंपों का सोलराइजेशन।

योजना के तहत इन तीनों घटकों को मिलाकर 2022 तक कुल 25,750 मेगावाट सौर क्षमता तैयार करने की योजना है। 

लगभग 25 साल पुराने ब्रू-शरणार्थियों के संकट का अंत हुआ है. समझौते के तहत अब उनके लिए गरिमापूर्ण जीवन जीने का रास्ते खुल गए हैं. 2020 का नया दशक ब्रू-शरणार्थियों समुदाय के जीवन में एक नई आशा और उम्मीद की किरण लेकर आया है.

करीब 34,000 ब्रू-शरणार्थियों को त्रिपुरा में बसाया जाएगा.

71वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के जरिए देश को संबोधित किया. उन्होंने कहा 'आज गणतंत्र-दिवस के पावन अवसर पर मुझे 'गगनयान' के बारे में बताते हुए खुशी हो रही है. 2022 में हमारी आजादी के 75 साल पूरे होने वाले हैं और उस मौके पर हमें 'गगनयान मिशन' के साथ एक भारतवासी को अंतरिक्ष में ले जाने के अपने संकल्प को सिद्ध करना है.'

पीएम ने आगे कहा कि 'गगनयान  मिशन' 21वीं सदी में साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगा. नए भारत के लिए ये एक 'मील का पत्थर' साबित होगा. पीएम ने कहा कि इस मिशन में Astronaut यानी अंतरिक्ष यात्री के लिए 4 उम्मीदवारों का चयन कर लिया गया है. ये चारों भारतीय वायुसेना के पायलट हैं.

भारतीय अंतरिक्ष यान कार्यक्रम गगनयान के अंतर्गत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो ) अंतरिक्ष की स्थिति को बेहतर तरीके से समझने के लिए ह्यूमैनोयड मॉडल (मानव की तरह दिखने वाला ) भेजने की योजना बना रहा है. इस ह्यूमनॉयड को इसरो ने ‘व्योम मित्र’ नाम दिया है. बताया जा रहा है कि इसे 2022 में गगनयान मिशन से पहले रवाना किया जाएगा.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के. सिवन ने बुधवार को कहा कि दिसंबर 2021 में भारत के प्रथम मानवयुक्त अंतरिक्षयान ‘गगनयान’ के प्रक्षेपण के मद्देनजर इसरो दिसंबर 2020 और जून 2021 में दो मानवरहित मिशनों का प्रक्षेपण करेगा. व्योममित्र उसी का हिस्सा है.

इसरो के वैज्ञानिक सैम दयाल ने कहा, यह एक इंसान की तरह काम करेगा और हमें वहां की जानकारियां मुहैया कराएगा. फिलहाल इसरो एक प्रयोग के रूप में इस व्योम मित्र का उपयोग कर रहा है.’

‘मानव अंतरिक्षयान और खोज: वर्तमान चुनौतियां तथा भविष्य घटनाक्रम’ पर विचार गोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सिवन ने कहा कि ‘गगनयान’ मिशन का उद्देश्य न केवल अंतरिक्ष में भारत का पहला मानवयान भेजना है, बल्कि ‘निरंतर अंतरिक्ष मानव उपस्थिति’ के लिए नया अंतरिक्ष केंद्र स्थापित करना भी है.

उन्होंने कहा, ‘हम तीन चरणों में यह सब कर रहे हैं. दिसंबर 2020 और जून 2021 में दो मानवरहित मिशन और उसके बाद दिसंबर 2021 में मानवयुक्त अंतरिक्ष यान.’

नए अंतरिक्ष केंद्र के संबंध में इसरो ने भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेंगलुरु के पास अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया है.

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी, नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों तथा उद्यमों से बात कर रही है कि कैसे वह मानवयुक्त अंतरिक्षयान पर साथ मिलकर काम कर सकती है और कैसे उनके अनुभव से सीखा जा सकता है.

‘गगनयान’ इसरो के अंतर-ग्रहीय मिशन के दीर्घकालिक लक्ष्य में भी मदद करेगा. इसरो प्रमुख ने कहा, ‘अंतर-ग्रहीय मिशन दीर्घकालिक एजेंडे में शामिल है.’

‘गगनयान’ मिशन पर सिवन ने कहा कि अंतरिक्ष एजेंसी ने महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों जैसे कि निचली कक्षा के लिए 10 टन की पेलोड क्षमता वाला संचालनात्मक लॉंचर पहले ही विकसित कर लिया है और इसका प्रदर्शन किया है.

उन्होंने कहा, ‘केवल मानव जीवन विज्ञान और जीवन रक्षा प्रणाली जैसे तत्व की कमी है जिसे अब हम विकसित कर रहे हैं.’

सिवन ने कहा कि इसरो ने ‘गगनयान’ कार्यक्रम के लिए कई राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, अकादमिक संस्थानों, डीआरडीओ प्रयोगशालाओं, भारतीय वायुसेना, सीएसआईआर प्रयोगशालाओं को पक्षकार बनाया है.

सिवन ने कहा कि भारत में जल्द ही सामान्य रूप से अंतरिक्ष उड़ान प्रशिक्षण शुरू होगा. इसमें कई सिमुलेटर और अन्य उपकरणों के इस्तेमाल के साथ मिशन से जुड़ा विशिष्ट प्रशिक्षण दिया जाएगा.

भारत और ब्राजील के बीच शनिवार को 15 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। ब्राजील के राष्ट्रपति जे एम बोलसोनारो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बातचीत के बाद ये करार किए गए। दोनों देशों के बीच ऊर्जा और व्यापार एवं निवेश से लेकर साइबर सुरक्षा सहित कई क्षेत्रों में सहयोग को लेकर करार हुए हैं। भारत एवं ब्राजील ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती देने वाली एक कार्ययोजना का भी अनावरण किया। बोलसोनारो भारत के 71वें गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि हैं। वह शुक्रवार को नई दिल्ली पहुंचे। यह भारत की उनकी पहली यात्रा है।

भारत की आर्थिक वृद्धि की राह में ब्राजील को मूल्यवान साझीदार करार देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ''भारत की आपकी इस यात्रा से भारत और ब्राजील के बीच के द्विपक्षीय संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। भौगोलिक दूरियां होने के बावजूद कई वैश्विक मुद्दों पर दोनों देशों के विचार एक जैसे हैं।''

मोदी ने कहा, ''हम अपनी रक्षा औद्योगिक साझेदारी को मजबूत बनाने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।'' उन्होंने कहा कि ब्राजील से निवेश को बढ़ावा देने के लिए हमने जरूरी कानूनी ढांचे को मजबूत बनाया है। 

बोलसोनारो ने इस मौके पर कहा कि दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े 15 समझौतों पर हस्ताक्षर के साथ पहले से मजबूत रिश्तों को और मजबूती दी है। हाल के कुछ वर्षों में दक्षिण अमेरिका के सबसे बड़े देश ब्राजील के साथ भारत के संबंधों में काफी मजबूती आई है। ब्राजील की आबादी 21 करोड़ है और वहां की इकोनॉमी 1.8 ट्रिलियन डॉलर की है। 

2018 के आंकड़ों के मुताबिक ब्राजील में भारतीय निवेश तकरीबन छह अरब डॉलर का था जबकि भारत में ब्राजील का निवेश एक अरब डॉलर के आसपास बैठता है। ब्राजील ने भारत में मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल, आईटी, माइनिंग, एनर्जी और बॉयोफ्यूल में निवेश किया है। 

चीन में कोरोना वायरस (China coronavirus) के प्रकोप से मरने वालों की संख्या छह हो गई है। चीन के नेशनल हेल्थ कमीशन (एनएचसी) ने 21.01.20 तक 291 मामलों की पुष्टि की थी। हुबेई प्रांत की राजधानी हुवान के मेयर झोउ जियानवांग ने छह मौतों की पुष्टि करते हुए 258 लोगों को इससे संक्रमित बताया है। एनएचसी के मुताबिक सोमवार शाम तक दक्षिणी प्रांत गुआंगडोंग में पांच, राजधानी बीजिंग में पांच और शंघाई में दो मामलों की पुष्टि हुई है।

स्वास्थ्य अधिकारियों ने रहस्यमयी वायरस के लोगों के बीच तेजी से फैलने की आशंका जताते हुए कहा है कि अब तक 15 चिकित्सा कर्मचारी इससे संक्रमित हो चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अंतरराष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने पर विचार के लिए 22.01.20 को बैठक बुलाई है।

इसी तरह के एक वायरस से 2002 में सार्स (एसएआरएस) संबंधी बीमारी फैली थी। चीन के दक्षिणी इलाके से शुरू हुई इस बीमारी की चपेट में आकर दो दर्जन देशों के 800 लोगों की मौत हो गई थी।

21.01.20 को देश के अन्य भागों में भी इस वायरस के फैलने का पता चला।

पिछली बार SARS की वजह से 800 लोगों की मौत हुई थी. ऐसे में दुनिया भर में इसे लेकर चिंता है. भारत में इसे लेकर एडवायजरी जारी की गई है. कोरोना वायरस को लेकर जारी चिंता के बीच भारत समेत दुनियाभर के हवाईअड्डों पर चीन से आने वाले यात्रियों की जांच के लिए इंतजाम किए जा रहे हैं. भारत में भी सात हवाई अड्डों पर चीन से आने वाले यात्रियों की जांच के लिए व्यवस्था की गई है.

एक आधिकारिक बयान के मुताबिक दिल्ली, मुंबई और कोलकाता समेत सात हवाईअड्डों पर थर्मल स्क्रीनिंग के जरिये यात्रियों की जांच हो रही है.

दरअसल कोरोना वायरस (सीओवी) विषाणुओं के बृहत परिवार का सदस्य है, जिसकी वजह से सामान्य सर्दी से लेकर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम जैसी बीमारियां हो रही हैं, लेकिन अब तक चीन में छह लोगों की जान ले चुका यह विषाणु कुछ अलग तरह का है जिसे पहले नहीं देखा गया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा कि नए सीओवी की प्रजाति के लक्षण दिसंबर में वुहान में दिखने शुरू हुए थे और अबतक 300 से ज्यादा लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं. इससे ग्रस्त लोगों में सांस से जुड़ी समस्याएं, बुखार, खांसी आदि हैं. ज्यादा गंभीर मामलों में संक्रमण की वजह से निमोनिया, सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम, गुर्दे खराब होना और मौत तक हो सकती है.

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक सीओवी विषाणुओं के ज्यादा बड़ी प्रजाति है, जिसकी वजह से सामान्य सर्दी से लेकर मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (एमईआरएस-सीओवी) और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (एसएआरएस-सीओवी) जैसी गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं.

पूर्व जनरल बिपिन रावत को भारत का पहला चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) बनाया गया है. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ; प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के लिए महत्वपूर्ण रक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर भारत सरकार के सलाहकार के रूप में कार्य करेगा. CDS; परमाणु मुद्दों पर प्रधानमंत्री के सैन्य सलाहकार के रूप में भी काम करेगा. सीडीएस का पद 'फोर स्टार' जनरल के समकक्ष होगा और सभी सेनाओं के प्रमुखों में सबसे ऊपर होगा जबकि रिटायरमेंट की उम्र 65 वर्ष होगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान लालकिले की प्राचीर से जब थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच तालमेल सुनिश्चित करने और उन्हें प्रभावी नेतृत्व देने के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद का एलान किया था, तभी से सबकी निगाहें इस बात पर थीं कि इस पद पर पहला मौका किसे मिलेगा।

भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पीछे का इतिहास (History behind the CDS post)

भारत में यह पहली बार नहीं है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) का पद सृजित हो रहा है. वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के बाद भी भारत में एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद को बनाने की पहल K. सुब्रह्मण्यम समिति की सिफारिस के आधार पर की गयी थी. लेकिन राजनीतिक असहमति और आशंकाओं के कारण यह आगे नहीं बढ़ सकी थी.

नरेश चंद्र समिति ने 2012 में चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (COSC) के एक स्थायी चेयरमैन की नियुक्ति की सिफारिश की थी और वर्तमान में यही काम कर रही है.

कौन है चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ? (About Chief of Defence Staff)

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद का मतलब होगा कि प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के लिए महत्वपूर्ण रक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर सरकार के सलाहकार के रूप में केवल एक व्यक्ति कार्य करेगा. सीडीएस परमाणु मुद्दों पर प्रधानमंत्री के सैन्य सलाहकार के रूप में भी काम करेगा.

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का कार्य होगा कि वह सेना के तीनों अंगों के बीच दीर्घकालिक नियोजन, प्रशिक्षण, खरीद और परिवहन के कार्यों के लिए समन्वयक (Coordinator) का कार्य करेगा.

जैसा कि हम जानते हैं कि रक्षा क्षेत्र का बजट बढ़ता जा रहा इसलिए संसाधनों पर तनाव साल दर साल बढ़ता जा रहा है. अब सीमित संसाधनों के उपयोग को सुनिश्चित करके तीनों सेना के अंगों के बीच समन्वय को बढ़ाना समय की आवश्यकता है.

यहां उल्लेख करने योग्य बात यह है कि सभी प्रमुख देशों, विशेष रूप से परमाणु हथियार संपन्न देशों में एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जरूर है.

CDS के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं (Functions of CDS)

CDS के चयन से पहले, तीनों सेना प्रमुखों में सबसे सीनियर चीफ ही, चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष (COSC) के रूप में कार्य करता था. COSC की भूमिका अतिरिक्त होती है और कार्यकाल बहुत छोटा रहता है. CDS के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं.

1. वह तीनों सेनाओं के मामलों पर रक्षा मंत्री के प्रधान सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करेंगे.
2. परमाणु कमान प्राधिकरण के सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करेंगे.
3. सीडीएस, किसी भी सैन्य कमांड का प्रयोग नहीं करेगा,और इस मामले में नियम पूर्ववत ही रहेंगे.
4. सीडीएस, रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद के सदस्य होंगे.
5. वह चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के स्थायी अध्यक्ष होंगे.
6. सैन्य मामलों के विभाग के प्रमुख के रूप में भी कार्य करेंगे.

अतः भारत के पडोसी देशों की नीति को देखते भारतीय सेना के तीनों विंगों के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद की शीघ्र आवश्यकता थी. उम्मीद है कि अब सीमित रक्षा संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा  और किसी भी युद्ध जैसी स्थिति के दौरान देश की सुरक्षा की जा सकेगी.

किन-किन देशों में चीफ़ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ (CDS) का पद होता है?

1. चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ; इटली: (The Chief of the Defence Staff)
इटली का चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, इटैलियन आर्म्ड फोर्सेज के सर्वोच्च पद को बताता है. यह पद 4 मई 1925 को बनाया गया था और पिएत्रो बडोग्लियो इस पर बैठने वाले पहले व्यक्ति थे जबकि वर्तमान में इस पद पर एयर स्क्वाड्रन जनरल एंज़ो वेकेइरेल्ली हैं.

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2. दा चीफ ऑफ़ स्टाफ ऑफ़ दा अर्मीज (C.E.M.A.), फ्रांस (The Chief of Staff of the Armies)
C.E.M.A; फ्रेंच गणराज्य की सेनाओं के कर्मचारी मुख्यालय का प्रमुख होता है. C.E.M.A. फ्रांसीसी सशस्त्र बलों के उपयोग के लिए जिम्मेदार प्रमुख वरिष्ठ सैन्य अधिकारी है. यह पद 28 अप्रैल 1948 को बनाया गया था और अभी यह पद जनरल फ्रांकोइस लेकोइंट्रे संभाल रहे हैं. यह देश के रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करता है.

3. दा चीफ ऑफ़ दा जनरल स्टाफ; चीन (The Chief of the General Staff; China)
चीफ ऑफ जनरल स्टाफ ताइवान में रिपब्लिक ऑफ चाइना सशस्त्र बलों का प्रमुख है. यह पद 23 मई 1946 को बनाया गया था और वर्तमान में यह जनरल शेन यी-मिंग के पास है. इस पद पर बैठने वाला व्यक्ति सीधे रक्षा मंत्री; को रिपोर्ट करता है.

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4. दा चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ, स्पेन (The Chief of the Defence Staff)

यह स्पेनिश सशस्त्र बलों में सर्वोच्च रैंकिंग वाला सैन्य अधिकारी है. यह; रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय रक्षा परिषद और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख सैन्य सलाहकार के तौर पर काम करता हैं.

5. दा चीफ ऑफ़ दा डिफेन्स स्टाफ, यूनाइटेड किंगडम (The Chief of the Defence Staff)
जैसा कि हम जानते हैं कि भारत के ऊपर ब्रिटेन ने कई वर्षों तक शासन किया था और उनके शासन के चिन्ह आज भी भारत की कई संस्थाओं, मिलिट्री और पुलिस में मौजूद हैं.

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यूनाइटेड किंगडम में; दा चीफ ऑफ़ दा डिफेन्स स्टाफ, ब्रिटिश सशस्त्र बलों का पेशेवर प्रमुख होता है. चीफ ऑफ़ दा डिफेन्स स्टाफ; ब्रिटेन में रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री के लिए सबसे वरिष्ठ सैन्य सलाहकार भी होता है.

6. चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ, कनाडा (Chief of the Defence Staff)
चीफ ऑफ डिफेंस; स्टाफ कनाडाई सशस्त्र बलों का दूसरा सबसे वरिष्ठ सदस्य है. शीर्ष पद कमांडर-इन-चीफ के पास होता है.
सीडीएस का पद, कनाडाई सशस्त्र बलों की तीनों मुख्य शाखाओं में से एक वरिष्ठ सदस्य के पास होता है. वर्तमान में सीडीएस के पद पर जोनाथन वेंस (17 जुलाई 2015 से) हैं जो कि कमांडर-इन-चीफ को रिपोर्ट करते हैं.

7. चीफ ऑफ स्टाफ, ज्वाइंट स्टाफ; जापान  (Chief of Staff, Joint Staff)

चीफ ऑफ स्टाफ, ज्वाइंट स्टाफ; जापान में सर्वोच्च श्रेणी का सैन्य अधिकारी और जापान सेल्फ डिफेंस फोर्सेज (JSDF) के ऑपरेशनल अथॉरिटी (कमांड) का प्रमुख होता है.

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चीफ ऑफ स्टाफ; जापान सेल्फ डिफेंस फोर्सेस के सभी मामलों पर रक्षा मंत्री की सहायता करता है और प्रधानमंत्री के निर्देशों के साथ रक्षा मंत्री के आदेशों को क्रियान्वित करता है.

यह पद 1 जुलाई 1954 को बनाया गया था और जनरल काजी यामाजाकी वर्तमान चीफ ऑफ स्टाफ, ज्वाइंट स्टाफ हैं जो कि रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करते हैं.

तो यह थी दुनिया के विभिन्न देशों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की सूची. इस पद को अलग अलग देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. भारत में इस पद का सृजन यूनाइटेड किंगडम के पद से प्रेरित है. मुझे उम्मीद है कि भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद का सृजन भारतीय रक्षा बलों की क्षमताओं को और मजबूत करेगा.

कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने ई-प्रशासन पहल के अधीन कई कदम उठाए हैं। इसका एक मात्र उद्देश्‍य हित धारकों की डाटाबेस तक पहुंच को सुविधा जनक बनाना है, जो उनके लिए अपना कारोबार और बढ़ाने के लिए अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण होगा। यह डाटाबेस खास कर हित धारकों द्वारा कारपोरेट जगत को स्‍वीकृत और जारी अग्रिम राशि के प्रति शुल्‍क के सृजन से संबंधित है। 

एमसीए और एमसीए-21 पोर्टल का पुनर्निर्माण

  • पुनर्निर्मित पोर्टल एमसीए-21 पहली बार खोलने वाले उपयोगकर्ता के लिए अधिक हितैषी और व्‍याख्‍यात्‍मक है।

  • पोर्टल एमसीए-21 का अत्‍यधिक प्रयोग में आने वाली कार्यात्मकताओं से सम्‍बन्धित अनुभागों को परिभाषित किया है और उपयोगकर्ता की सहायता के लिए विस्‍तृत उपाय-वार प्रक्रिया परिभाषित की गई है।

  • एमसीए-21 पोर्टल की कार्यात्‍मकताओं से सुपरिचित उपयोगकर्ताओं को सभी अनुभागों के अंदर त्‍वरित संपर्क प्रदान किया गया है।

  • निवेशकों के हितों की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए 'निवेशक सेवा' नामक एक विशेष व्‍यवस्‍था भी की गई है।

  • इस व्‍यवस्‍था में निवेश शिक्षा संरक्षण कोष (आईईपीएफ) जैसी सभी सम्‍बद्ध वेबसाइटों के साथ संपर्क है, जो निवेशकों के हितों की सुरक्षा में सहायता करता है।

समूचे भारत के लिए इलेक्‍ट्रोनिक स्‍टैम्पिंग का अधिदेश

  • एमसीए-21 प्रणाली के जरिये ई-स्‍टैम्पिंग की व्‍यवस्‍था सभी राज्‍यों और संघ शासित प्रदेशों के लिए अधिदेश कर दी गई है।

प्रकिया द्वारा सीधे (एसटीपी) मोड के अधीन विशिष्‍ट ई-फॉर्मों को संसाधित करना। यह कंपनी रजिस्‍ट्रार के उपयोगिता द्वारा संसाधित नहीं किया जाएगा।

  • शेयरों के आबंटन की वापसी से संबंधित फॉर्म-2 और फॉर्म-3

  • किसी मौजूदा कंपनी द्वारा पंजीकृत कार्यालय में परिवर्तन के लिए फॉर्म-18

  • किसी मौजूदा कंपनी द्वारा निदेशक आदि में परिवर्तन संबंधी ब्‍योरे के लिए फॉर्म-32

  • शुल्‍क (देरी के लिए क्षमा को छोड़कर अन्‍य मामले) के संबंध में फॉर्म-8 और 17

  • किसी नयी कंपनी द्वारा नाम उपलब्‍ध कराने के लिए फॉर्म-1ए (इसमें नाम उपलब्‍ध कराने से सम्‍बन्धित दिशा-निर्देश भी शामिल हैं)

  • विशिष्‍ट कंपनियों को निष्क्रिय कंपनियां अंकित करना और उनके ई-फाइलिंग पर रोक  लगाना

  • जिन कंपनियों ने अपनी वार्षिक रिटर्न और बेलेंसशीट लगातार तीन वर्ष तक जमा नहीं कराई उन कंपनियों को एक अलग वर्ग-डोरमेंट (निष्क्रिय) कंपनियां अंकित किया गया है। इस प्रकार की कंपनियों को अपना ई-फाइलिंग जमा करने से रोक दिया जाता है, जब तक कि वे फाइलिंग में दोष को दूर नहीं कर लेतीं।

विशिष्‍ट कंपनियों को दोषी कंपनियां अंकित करना और उनके ई-फाइलिंग पर रोक लगाना

  • जिन कंपनियों ने अपनी वार्षिक रिटर्न और/या बेलेंस‍शीट एक वर्ष या अधिक अवधि के लिए जमा नहीं की उन्‍हें दोषी कंपनियां अंकित किया गया है। इस प्रकार की कंपनियों और उनके निदेशकों को ई-फाइलिंग से रोक दिया जाता है, जब तक कि वे रिटर्न फाइल करने में दोष को दूर नहीं कर लेते।

शिकायत पर नजर रखने की विस्‍तृत व्‍यवस्‍था का कार्यान्‍वयन

  • एमसीए-21 हित धारकों के लिए एमसीए-21 प्रणाली में शिकायत पर नजर रखने की एक विस्‍तृत प्रणाली लागू की गई है। उपयोगकर्ता उसी के जरिये शिकायतें, मामले, प्रश्‍न, सुझाव दे सकते हैं और उन्‍हें उसके लिए एक विशिष्‍ट संदर्भ टिकट दिया जाता है। वे संदर्भ टिकट का प्रयोग करके शिकायत की पूर्ति की स्थिति जान सकते हैं।

प्रणाली के अधीन प्रमाण पत्रों पर डिजिटल हस्‍ताक्षर

  • पहले की व्‍यवस्‍था के अनुसार कंपनी रजिस्‍ट्रार के अधिकारी विभिन्‍न प्रमाण पत्रों पर हस्‍ताक्षर करके उसे कंपनी को डाक द्वारा भेजते थे। अब एमसीए-21 प्रणाली के अधीन विभिन्‍न प्रमाण पत्रों पर डिजिटल हस्‍ताक्षर की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसमें अब हाथ से कोई काम नहीं किया जाता और फिर डिजिटल तरीके से हस्‍ताक्षरित प्रमाण पत्रों को ई-मेल के जरिये कंपनी को भेजा जाता है और पुष्टि के लिए एमसीए-21 एफओ पोर्टल को भी उपलब्‍ध कराया जाता है।

डायरेक्‍टर आइडेंटिफिकेशन नम्‍बर (डीआईएन) के आबंटन की प्रक्रिया को कागज-मुक्‍त और ऑन-लाइन बनाया गया, और डीआईएन-डीपीआईएन को जोड़ा गया

  • एमसीए द्वारा डीआईएन के आबंटन की प्रक्रिया को पूरी तरह कागज-मुक्‍त बना दिया गया है। यह स्‍थूल रूप में सबूत दाखिल करने की आवश्‍यकता को समाप्‍त करने के लिए किया गया है और इसके स्‍थान पर इसे स्‍वयं डीआईएन आवेदन को स्‍कैन किया जा सकता है। इसके अलावा सभी भारतीय निदेशकों के लिए आयकर पैन उपलब्‍ध करना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही कार्यरत व्यवसायी के प्रमाण पत्र पर आधारित व्‍यवस्‍था द्वारा डीआईएन आवेदन-पत्र को संसाधित किया जाता है।

  • कंपनी अधिनियम के अधीन डीआईएन के आबंटन और एलएलपी अधिनियम के तहत डीपीआईएन के आबंटन के लिए एमसीए के पास अलग- अलग व्‍यवस्‍थाएं हैं। अब एमसीए ने दोनों व्‍यवस्‍थाओं को जोड़ कर डीआईएन के रूप में एक-समान पहचान बना दी है।

अन्य सरकारी विभागों के साथ समन्वय-आयकर और ट्रेडमार्क
संयुक्त सेवाओं के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में विभिन्न विभागों के साथ समन्वय किया गया-

  • निदेशकों आदि के विवरणों का सत्यापन करने के लिए आयकर प्रणाली के साथ उनके अपने-अपने आयकर पैन ब्यौरे को जोड़ना।

  • आंतरिक (कंपनी रजिस्ट्रार के कार्यालय) और बाहरी हितधारकों (कंपनी, व्यावसायी) के टीएमआर डाटा बेस पर ढूंढने की सुविधा प्रदान करने के लिए ट्रेडमार्क प्रणाली के साथ जोड़ना।

कारपोरेट खाते खोलने के लिए बैंकों के साथ समन्वय

  • विभिन्न बैंकों के साथ समन्वय की प्रक्रिया में एमसीए ने कारपोरेटों के लिए एमसीए-21 प्रणाली के जरिये बैंक खाता खोलने के लिए एक सुविधा शुरू की है। कंपनी को एमसी प्रणाली पर इलैक्ट्रोनिक फार्म और कुछ ब्यौरे भरने होते हैं, कंपनी के बारे में दस्तावेज संबद्ध बैंक को एमसीए -21 प्रणाली के जरिये भेजें जाते हैं।

अदायगियां करने के लिए एनईएफटी विकल्प की शुरूआत

  • पहले एमसीए-21 अदायगियां क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग और स्थूल चालान के जरिये करने की अनुमति थी। इंटरनेट बैंकिंग केवल पांच बैंकों तक सीमित है। अदायगी प्रक्रिया में होने वाली देरी से उत्पन्न असुविधा को समाप्त करने के लिए एमसीए ने एमसीए फीस की अदायगी एनईएफटी अर्थात राष्ट्रीय इलैक्ट्रोनिक कोष हस्तांतरण मोड के जरिये शुरू किया है। इस विकल्प के जरिये हितधारक एससीए-21 फीस की अदायगी किसी भी बैंक के जरिये, जो एनईएफटी की अनुमति देता हो, कर सकते हैं।

स्थूल चालान मोड के जरिये अदायगी पर रोक

  • स्कूल विकल्प (बैंक की खिड़की पर चालान के जरिये अदायगी) के जरिये एमसीए-21 की विभिन्न सेवाओं के लिए अदायगी की सुविधा पर, पचास हजार रुपये के समकक्ष अथवा उससे अधिक राशि के मामले में रोक लगा दी गई है।

विशिष्ठ वर्ग की कंपनियों द्वारा वित्तीय विवरण दाखिल करने के लिए एक्सबीआरएल लागू-

  • विशिष्ठ वर्ग की कंपनियों द्वारा एक्सटेंसीबल बिजनेस रिपोर्टिंग लैंग्वेज (एक्सबीआरएल) द्वारा वित्तीय विवरण दाखिल करना एमसीए-21 प्रणाली में कार्यान्वित किया गया है। इस प्रणाली में वित्तीय विवरणों को एमसीए एक्सबीआरएल टेक्सोनोमी के साथ जोड़ना होता है। एमसीए-21 प्रणाली ने हितधारकों को एक्सबीआरएल दस्तावेज दाखिल करने से पहले सत्यापित करने के लिए एक सुविधा प्रदान की है। इसके अतिरिक्त एक्सबीआरएल दस्तावेजों को पढ़ने वाली मशीन एमसीए -21 प्रणाली के जरिये दस्तावेजों को मनुष्य द्वारा पढ़े जाने योग्य बना देती है।

त्वरित कार्यात्मकता का चिन्ह

  • पहले एमसीए प्रयोगकर्ता द्वारा किसी कार्य वस्तु को संसाधित करने में उस कार्य वस्तु को तात्कालिक चिन्हित करने की सुविधा थी और वह इसे एफआईएफओ प्रक्रिया द्वारा करता था। तथापि अधिक पारदर्शिता लाने के लिए यह कार्यात्मकता रोक दी गयी है। अब कार्य वस्तु उनके द्वारा भरे जाने के क्रम से संसाधित की जाए

वापसी प्रक्रिया की शुरूआत

  • किसी हितधारक द्वारा एमसीए-21 की विभिन्न सेवाओं का लाभ उठाने के लिए गलती से दी गई फीस की वापसी के लिए एमसीए-21 में पहले कोई व्यवस्था नहीं की। मंत्रालय ने अब विशिष्ट सेवाओं के लिए अदा की गई वैधानिक फीस को वापस करने का निर्णय लिया है। हितधारक द्वारा रिफंड के लिए नया ई-फार्म भरना होगा  और उनकी संसाधित होने पर रिफंड का अनुरोध स्वीकार या अस्वीकार किया जाएगा।

  • एमसीए -21 की फीस का रिफंड जिन मामलों में उपलब्ध है वे हैं : (क) बहुअदायगियां का फार्म एक और पांच (ख) गलत अदागियां और (ग) ज्यादा अदायगी।

  • रिफंड प्रक्रिया विशिष्ट सेवाओं/ई फार्म जैसे दस्तावेजों का सार्वजनिक निरीक्षण, सत्यापित प्रतियों का अनुरोध हस्तांतरण दस्तावेजों के लिए अदायगी, स्टाम्प ड्यूटी फीस (डी श्रंखला एसआरएन), आईईपीएफ अदायगी, एसटीपी फार्म, डीआईएन ई फार्म आदि पर लागू नहीं होती।

स्वीडन की रहने वाली 16 वर्षीय ग्रेटा टुनबर्ग के ‘फ्राइडे फॉर फ्यूचर’ अभियान के पक्ष में लाखों लोग आ चुके हैं। वह तब चर्चा में आई थीं जब अगस्त, 2018 में हर शुक्रवार स्वीडन की संसद के बाहर धरना देना शुरू कर दिया था। वह हाथों में एक तख्ती लेकर वहां रहती थीं, जिस पर लिखा होता था जलवायु की खातिर स्कूल की हड़ताल। 

ग्रेटा टुनबर्ग पूरी दुनिया के लिए पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की आइकॉन बन गई हैं. 16 साल की टुनबर्ग के नेतृत्व में 150 से अधिक देशों में हजारों लाखों बच्चों ने सड़क पर उतरकर जलवायु परिवर्तन की नजरअंदाजी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. स्वीडन की टुनबर्ग ने साल भर पहले जलवायु परिवर्तन की लड़ाई अकेले शुरू की थी. ‘फ्राइडे फॉर फ्यूचर’ नाम से शुरू मुहीम में उनके साथ लाखों पर्यावरण प्रेमी जुड़ चुके हैं.

जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा टुनबर्ग ने मंगलवार (29/10/2019) को एक पर्यावरण पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु अभियान में आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता में बैठे लोग पुरस्कार देने के बजाए विज्ञान का अनुसरण प्रारंभ करें।  अंतर संसदीय सहयोग के लिए क्षेत्रीय संस्था नॉर्डिक परिषद की ओर से स्टॉकहोम में आयोजित समारोह में ग्रेटा टुनबर्ग को इस सम्मान के लिए चुना गया। ग्रेटा टुनबर्ग के प्रयासों के लिए उन्हें स्वीडन और नॉर्वे दोनों की ओर से नामित किया गया था। उन्होंने संगठन का सालाना पर्यावरण पुरस्कार जीता था।

पुरस्कार की घोषणा के बाद थनबर्ग के एक प्रतिनिधि ने दर्शकों को बताया कि वह यह पुरस्कार और 52,000 डॉलर (36, 85,917 रुपये) की राशि स्वीकार नहीं करेंगी। उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपने इस फैसले को साझा किया।

ग्रेटा टुनबर्ग ने यह सम्मान देने के लिए नॉर्डिक परिषद का आभार व्यक्त किया, लेकिन जलवायु से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात पर कायम नहीं रहने के लिए नॉर्डिक देशों की आलोचना भी की। एक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि जलवायु अभियान को और पुरस्कारों की आवश्यकता नहीं है। जरूरत इस बात की है कि सत्ता में बैठे लोग वर्तमान में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ विज्ञान का अनुसरण करना शुरू कर दें।

राजा लेशेम्बा सनाजाओबा का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हुए मणिपुर के दो असंतुष्ट नेताओं ने मंगलवार (29/10/2019) को ब्रिटेन में निर्वासन में मणिपुर सरकार की शुरुआत की घोषणा कर सियासी खलबची मचा दी। हालांकि राजा लेशेम्बा ने इसकी कड़ी निंदा की है। लंदन में एक संवाददाता सम्मेलन में याम्बेन बिरेन ने मणिपुर स्टेट काउंसिल का मुख्यमंत्री और नरेंगबाम समरजीत ने मणिपुर स्टेट काउंसिल का रक्षा और विदेश मंत्री होने का दावा किया।

उन्होंने कहा कि वे मणिपुर के महाराजा की ओर से बोल रहे हैं और औपचारिक तौर पर निर्वासन में मणिपुर स्टेट काउंसिल की सरकार शुरू कर रहे हैं। बिरेन और समरजीत ने इस दौरान दस्तावेज भी पेश किए जिनमें यह दिखाया गया कि इस साल अगस्त में उन्हें राजनीतिक रूप से ब्रिटेन में शरण मिली है।

इस दावे पर मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह ने कहा कि सरकार ने इसे बेहद गंभीरता से लिया है और राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का मामला दर्ज किया गया है। ये मामला स्पेशल क्राइम ब्रांच को सौंपा गया है। जांच के बाद ये मामला एनआईए को सौंपा जाएगा क्योंकि वे विदेश से काम कर रहे हैं।

वहीं राजा लेशेम्बा ने कहा कि मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं। ये बहुत हैरान करने वाला है कि उन्होंने मेरा नाम इसमें घसीटा। इससे समाज में नकारात्मकता फैलेगी।

यूरोपीय संघ (EU) प्रतिनिधिमंडल के कश्मीर दौरे को लेकर यूरोप के एक गैर सरकारी संगठन (NGO) का  नाम सुर्खियों में है. कथित तौर पर वूमेन’स इकोनॉमिक एंड सोशल थिंक टैंक (WESTT) नाम के NGO ने इस अनौपचारिक दौरे के लिए इंतजाम किए. WESTT छह साल पुराना एनजीओ है जिसे 19 सितंबर 2013 को रजिस्टर्ड किया गया. ‘थिंक टैंक एंड रिसर्च इंस्टीट्यूशन्स’ की EU रजिस्ट्रेशन कैटेगरी की धारा 4 के तहत ये रजिस्ट्रेशन हुआ. सोशल मीडिया की अटकलों के विपरीत WESTT को किसी सरकारी संस्था (भारतीय या यूरोपीय) से फंडिंग के तौर पर मोटी रकम नहीं मिली. EU रिकॉर्ड्स के मुताबिक एनजीओ को बीते वित्त वर्ष में कुल 24,000 पौंड (करीब 18,83,376 रुपये) का कुल फंड मिला. WESTT को ये फंड सालाना डोनेशन के तौर पर मिला. EU रिकॉर्ड्स से ये भी संकेत मिला कि एनजीओ को पूरे साल में एक ही डोनर मिला.

WESTT एनजीओ दरअसल यूनाइटेड किंगडम स्थित माडी ग्रुप की कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ी गतिविधि है.

माडी ग्रुप के जरिए WESTT को यूनाइटेड किंगडम स्थित उद्यमी माडी शर्मा उर्फ मधु शर्मा संचालित करती हैं. एनजीओ के दावे के मुताबिक कम से कम 14 देशों में उसके सदस्य या प्रतिनिधि मौजूद हैं. ये देश हैं- बेल्जियम, क्रोएशिया, फ्रांस, लिथुआनिया, पोलैंड, यूनाइटेड किंगडम, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, चीन, भारत, नेपाल, नॉर्थ मेसेडोनिया, पाकिस्तान और तुर्की.

रिकॉर्ड्स के मुताबिक संगठन के पास कामकाज के लिए 5 लोगों की टीम है. इनमें से सिर्फ एक शख्स ही पूर्णकालिक है बाकी सभी सदस्य वॉलन्टियर आधार पर विश्व के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे हैं.

माडी ग्रुप की आधिकारिक वेबसाइट में इस ग्रुप में “I3I” नाम की बिजनेस ब्रोकरेज कंपनी को भी शामिल बताया गया है, जो ग्लोबल कॉरपोरेट कंपनियों के लिए बिजनेस टू बिजनेस या सरकार से संपर्क का दावा करती है. ये संपर्क परिचय, इंटेलीजेंस या इनोवेशन के जरिए कराया जाता है.

कॉरपोरेट फाइलिंग्स के मुताबिक यूनाइटेड किंगडम स्थित ‘I3I यूके लिमिटेड’ को एजाज अकबर नाम के भारतीय डायरेक्टर संचालित करते हैं. माडी ग्रुप की ‘माडी मैग्नीशियम’ के नाम से एक कंसल्टेंसी फर्म भी है. इसके अलावा ग्रुप की एक आयात/निर्यात कंपनी, एक टूर कंपनी और एक बैक ऑफिस रिसोर्स सॉल्यूशन कंपनी भी है. ग्रुप की ओर से ‘एक्स्ट्राऑर्डनरी एजुकेशन’ नाम से गैर मुनाफा आधार पर एक और संगठन चलाया जाता है जो शिक्षा के क्षेत्र में काम करता है.

यह जगह सीरिया में हैं। इसका नाम है बारिशा। यह एक गांव है जो तुर्की की सीमा से कोई दस किमी की दूरी पर था। वहीं सीरिया की राजधानी अलेप्‍पो से इसकी दूरी करीब 90 किमी थी। अलेप्‍पो से यदि सड़क से यह दूरी तय की जाए तो करीब दो घंटे का समय लगता है। वहीं सीरिया के ही इदलिब से यह 32 किमी की दूरी पर स्थित है। बगदादी की मौत के बाद यह पूरा इलाका सुर्खियों में आ गया है। 

बारिशा गांव (Barisha or Baricha Village) हरेम जिले में आता है जिस पर सीरिया के इदलिब प्रांत (Idlib Government) की हुकूमत चलती है। बारिशा अ'ला' पहाडि़यों (A'La' Mountain) के बीच बसा एक छोटा सा गांव है। आपको जानकर हैरत होगी कि यहां फैली खामोशी की बदौलत इस इलाके को मृत शहर या डेड सिटी (Dead Cities) भी कहा जाता है। सीरिया के सेंट्रल ब्‍यूरो ऑफ स्‍टेटिस्‍टक्‍स (Syria Central Bureau of Statistics) के आंकड़ों के मुताबिक 2004 में इसकी आबादी महज 1143 थी। आपको बता दें कि यह गांव सीरिया के उस प्राचीन इतिहास का हिस्‍सा है जिसका संबंध बीजांटिन पीरियड (Byzantine period) से है। यह रोमन साम्राज्‍य की याद दिलाता है। इस काल के यहां पर अब भी कई अवशेष मौजूद हैं।  

इस पूरे इलाके की खासियत है कि यहां पर छोटी-छोटी कई गुफाएं मौजूद हैं, जो बेहद प्राचीन हैं। यही वह है कि बगदादी अपने छिपने के लिए मुफीद जगह मानता था। इसके अलावा यहां पर कई सुरंग भी हैं जो आतंकियों ने अपने लिए तैयार की हुई हैं। यह इलाका आईएस का गढ़ होने के साथ आतंकियों को ट्रेनिंग वाला इलाका भी था। यहां से ही आईएस के आतंकी तैयार होकर दूसरी जगहों पर भेजे जाते थे और वो अपने खूनी खेल को अंजाम देते थे।  

ऑस्ट्रेलिया में एक अभूतपूर्व घटना में सोमवार सुबह देश के अखबारों का पहला पन्ना काला छापा गया। अखबारों ने देश में मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिशों का विरोध करने के लिए ये कदम उठाया है।

अखबारों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया सरकार का सख्त कानून उन्हें लोगों तक जानकारियां ला पाने से रोक रहा है।अखबारों ने पन्ने काले रखने का ये तरीका इस साल जून में ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े मीडिया समूह ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (एबीसी) के मुख्यालय और एक पत्रकार के घर पर छापे मारने की घटना को लेकर जारी विरोध के तहत उठाया।

ये छापे व्हिसलब्लोअर्स से लीक हुई जानकारियों के आधार पर प्रकाशित किए गए कुछ लेखों के बाद मारे गए थे। अखबारों के इस अभियान - राइट टू नो कोएलिशन - का कई टीवी, रेडियो और ऑनलाइन समूह भी समर्थन कर रहे हैं। ये अभियान चलाने वालों का कहना है कि पिछले दो दशकों में ऑस्ट्रेलिया में ऐसे सख्त सुरक्षा कानून लाए गए हैं जिससे खोजी पत्रकारिता को खतरा पहुंच रहा है।

पिछले साल नए कानूनों लाए गए जिसके बाद मीडिया संगठन पत्रकारों और व्हिसलब्लोअर्स को संवेदनशील मामलों की रिपोर्टिंग में छूट दिए जाने के लिए अभियान चला रहे हैं।

मुस्लिम महिलाओं से एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाले ऐतिहासिक विधेयक को बुधवार देर रात राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपनी मंजूरी दे दी। राष्‍ट्रपति के इस विधेयक पर हस्‍ताक्षर करने के साथ ही मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक अब कानून बन गया है। इस कानून को 19 सितंबर 2018 से लागू माना जाएगा। इससे पहले मंगलवार को राज्यसभा ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को अपनी स्‍वीकृति दी थी। 

संसद के उच्च सदन राज्‍यसभा में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक के पक्ष में 99 वोट पड़े, जबकि 84 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया था। बीएसपी, पीडीपी, टीआरएस, जेडीयू, एआईएडीएमके और टीडीपी जैसे कई दलों के वोटिंग में हिस्सा न लेने के चलते सरकार को यह बिल पास कराने में आसानी हुई। बिल की मंजूरी से विपक्ष की कमजोर रणनीति भी उजागर हुई। इस विधेयक का तीखा विरोध करने वाली कांग्रेस कई अहम दलों को अपने साथ बनाए रखने में असफल रही। 

राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद इस कानून ने अब तीन तलाक को लेकर 21 फरवरी को जारी किए गए मौजूदा अध्यादेश की जगह ले ली है। इससे पहले बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने का प्रस्ताव भी 100 के मुकाबले 84 वोटों से गिर गया था। इस बिल को मंजूरी के साथ ही सरकार ने साबित किया कि उसकी फील्डिंग उच्च सदन में खासी मजबूत थी। बिल का विरोध करने वाले जेडीयू, टीआरएस, बीएसपी और पीडीपी जैसे कई दलों ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया। राज्यसभा में यह बिल पास होना सरकार के लिए बड़ी कामयाबी माना जा रहा है क्योंकि उच्च सदन में अल्पमत में होने के चलते उसके लिए इस बिल को पास कराना मुश्किल था। 

कब दर्ज होगा 3 तलाक का केस 

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के मुताबिक यह अपराध संज्ञेय (इसमें पुलिस सीधे गिरफ्तार कर सकती है) तभी होगा, जब महिला खुद शिकायत करेगी। इसके साथ ही खून या शादी के रिश्ते वाले सदस्यों के पास भी केस दर्ज करने का अधिकार रहेगा। पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं कर सकता है। 

समझौते कि लिए क्या है शर्त 

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह बिल महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए है। कानून में समझौते के विकल्प को भी रखा गया है। पत्नी की पहल पर ही समझौता हो सकता है, लेकिन मैजिस्ट्रेट के द्वारा उचित शर्तों के साथ। 

जमानत के लिए क्या है शर्त 

कानून के तहत मैजिस्ट्रेट इसमें जमानत दे सकता है, लेकिन पत्नी का पक्ष सुनने के बाद। केंद्रीय मंत्री ने कहा, यह पति-पत्नी के बीच का निजी मामला है। पत्नी ने गुहार लगाई है, इसलिए उसका पक्ष सुना जाना जरूरी होगा। 

गुजारे के लिए क्या है प्रावधान 

तीन तलाक पर कानून में छोटे बच्चों की कस्टडी मां को दिए जाने का प्रावधान है। पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार मैजिस्ट्रेट तय करेंगे, जिसे पति को देना होगा। 

भारत के पी.एस.एल.वी.-सी45 ने एमिसैट तथा 28 अन्‍तर्राष्‍ट्रीय ग्राहक उपग्रहों को उनकी निर्दिष्‍ट कक्षाओं में सफलतापूर्वक अंत:क्षेपित किया।

सतीश धवन अं‍तरिक्ष केन्‍द्र शार, श्री‍हरिकोटा के द्वितीय प्रमोचन पैड से 1 अप्रैल 2019 को प्रात: 9:27 बजे (भारतीय मान‍क समयानुसार) पी.एस.एल.वी.-सी45 ने अपनी 47वीं उड़ान भरी। चार स्‍ट्रैपआन मोटरों के साथ पी.एस.एल.वी. के नये रूपांतर पी.एस.एल.वी.-क्‍यू.एल. का यह पहला मिशन था।

उड़ान भरने के करीब 17 मिनट 12 सेकेण्‍ड बाद एमिसैट 748 किमी. ऊँचाई की वांछित सूर्य तुल्‍यकाली ध्रुवीय कक्षा में सफलतापूर्वक स्‍थापित किया गया।

एमिसैट से अलग होने के बाद 504 किमी. ऊँची सूर्य तुल्‍यकाली कक्षा में 28 अंतर्राष्‍ट्रीय ग्राहक उपग्रहों को सटीक ढंग से स्‍थापित करने के लिए राकेट के चतुर्थ चरण के इंजनों को दो बार रीस्‍टार्ट किया गया। उड़ान के 1 घंटा 55 मिनट बाद अंतिम ग्राहक उपग्रह निर्दिष्‍ट कक्षा में स्‍थापित किया गया।

उड़ान के लगभग तीन घंटे बाद राकेट के चौथे चरण को उसके तीन नीतभारों के साथ प्रयोगों को संपन्‍न करने हेतु कक्षीय प्‍लेटफार्म के रूप में स्‍थापित करने के लिए दो रीस्‍टार्ट के बाद 485 किमी. ऊँची निम्‍न वृत्‍तीय कक्षा में स्‍थापित किया गया। पी.एस.4 नीतभार इस प्रकार है: इसरो की स्‍वचालित पहचान प्रणाली, ऐमसैट की स्‍वचालित पैकेट पुनरावृत्ति प्रणाली, आयनमंडलीय अध्‍ययन हेतु भारतीय अं‍तरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्‍थान का भारत एवं उन्‍नत मंदक विभव विश्‍लेषक।    

एमिसैट

एमिसैट उपग्रह, जो इसरो के लघु उपग्रह-2 बस के आधार पर निर्मित है जिसका वजन लगभग 436 कि.ग्रा. है। पी.एस.एल.वी.-सी45 द्वारा 01 अप्रैल, 2019 को यह उपग्रह 748 कि.मी. की ऊँचाई पर अपनी निर्धारित सूर्य-तुल्‍यकाली ध्रुवीय कक्षा में सफलतापूर्वक स्‍थापित किया गया। इस उपग्रह का उद्देश्‍य विद्युत चुम्‍बकीय स्‍पैक्‍ट्रम का मापन करना है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने लोगों से वादा किया है कि भीषण आग का शिकार हुए ऐतिहासिक नोट्रे डेम कैथेड्रल को 5 साल के अंदर और भी ज्यादा खूबसूरती के साथ दोबारा बनवाया जाएगा. 

मैक्रों ने देशवासियों को संबोधित करते हुए एलान किया कि इस आपदा ने देश को एकजुटता दिखाने का मौका दिया है. फ्रांस के गृह उपमंत्री लॉरेंट ननेज़ ने अग्निशमन कर्मचारियों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने इमारत के ढांचे को बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डाली.

ऐतिहासिक नोट्रे डेम कैथेड्रल का होगा पुनर्निर्माण: इमानुएल मैक्रौं

इस बीच नोट्रे डेम कैथेड्रल के पुनर्निमाण के लिए लोगों ने करोड़ों यूरो देने का वादा किया है. इस आग में 850 साल पुराने कैथेड्रल की छत को नुकसान हुआ है. आग के कारणों का अब तक पता नहीं चला है.

चक्रवात केनथ ने फ्रांस के द्वीप समूह मैयट में तबाही मचाई, तूफान के चलते भारी बारिश के साथ तेज़ हवाएं भी चल रही हैं। आज तूफान केनथ के मोज़ाम्बिक पहुंचने की संभावना है।

चक्रवात केनथ ने फ्रांस के द्वीप समूह मैयट में मचाई तबाही

हिन्द महासागर में फ्रांस के द्वीप समूह मैयट में कल चक्रवात केनथ ने भारी तबाही मचाई, जिसकी वजह से भारी बारिश हुई और तेज हवाएं चली। तेज चक्रवात के कारण लोगों को अपने घरों को छोड़कर स्थानीय स्कूलों में लगाए शिविरों में शरण लेनी पड़ी। चक्रवात केनथ के आज द्वीपसमूह के उत्तर से गुजरने की संभावना है, जिसकी वजह से बारिश हो सकती है और आंधी आने का अनुमान है।

इस उष्णकटिबंधीय तूफान के आज मोजाम्बिक के तट पर पहुंचने की उम्मीद है। मोजाम्बिक में एक महीने पहले भीषण तूफान आया था जिससे मोजाम्बिक समुद्र तटीय शहर बियरा काफी तबाह हो गया था और सैंकड़ो लोग मारे गए थे। मौसम विभाग ने कहा है कि चक्रवात कनेथ से भारी बारिश हो सकती है तेज हवाएं चल सकती है और समुद्र में कई मीटर उंची लहरें उठ सकती है। 

आयुष्मान भारत योजना (ABY) की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2018 में की थी। इसे पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर से देशभर में लागू कर दिया गया है. आयुष्मान भारत योजना (ABY) को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) भी कहा जाता है. यह वास्तव में देश के गरीब लोगों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम है. PMJAY के तहत देश के 10 करोड़ परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा मिल रहा है. सरकार ABY के माध्यम से गरीब, उपेक्षित परिवार और शहरी गरीब लोगों के परिवारों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना चाहती है. आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए परिवार के आकार और उम्र का कोई बंधन नहीं है.

आयुष्मान भारत योजना के तहत स्वास्थ्य बीमा का लाभ लेने वालों की संख्या 20 लाख के पार निकल गयी है। कुल मिलाकर अब तक 3.07 करोड़ लाभार्थियों को योजना के तहत ई-कार्ड जारी किये गये हैं। योजना की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2018 में की थी। इसमें 10.74 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर उपलब्ध कराया जाता है। योजना के तहत 15,400 अस्पताल को जोड़ा गया है। इसमें से 50 प्रतिशत निजी अस्पताल हैं।

सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) 2011 के हिसाब से ग्रामीण इलाके के 8.03 करोड़ परिवार और शहरी इलाके के 2.33 करोड़ परिवार आयुष्मान भारत योजना (ABY) के दायरे में आयेंगे. इस तरह PM-JAY के दायरे में 50 करोड़ लोग आएंगे. 

साल 2008 में यूपीए सरकार द्वारा लांच राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (NHBY) को भी आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY) में मिला दिया गया है.

ABY की योग्यता का निर्धारण कैसे होता है?

SECC के आंकड़ों के हिसाब से आयुष्मान भारत योजना (ABY) में लोगों को मेडिकल इंश्योरेंस मिल रहा है. SECC के आंकड़ों के हिसाब से ग्रामीण इलाके की आबादी में D1, D2, D3, D4, D5 और D7 कैटेगरी के लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल किये गए हैं. 

शहरी इलाके में 11 पूर्व निर्धारित पेशे/कामकाज के हिसाब से लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो सकते हैं. राज्यों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में पहले से शामिल लोग खुद ही आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो गए हैं.

ग्रामीण इलाके के लिए ABY की योग्यता 

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: 

  • ग्रामीण इलाके में कच्चा मकान, परिवार में किसी व्यस्क (16-59 साल) का नहीं होना, परिवार की मुखिया महिला हो, परिवार में कोई दिव्यांग हो, अनुसूचित जाति/जनजाति से हों और भूमिहीन व्यक्ति/दिहाड़ी मजदूर

  • इसके अलावा ग्रामीण इलाके के बेघर व्यक्ति, निराश्रित, दान या भीख मांगने वाले, आदिवासी और क़ानूनी रूप से मुक्त बंधुआ आदि खुद आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो जायेंगे.

शहरी इलाके के लिए ABY की योग्यता

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: भिखारी, कूड़ा बीनने वाले, घरेलू कामकाज करने वाले, रेहड़ी-पटरी दुकानदार, मोची, फेरी वाले, सड़क पर कामकाज करने वाले अन्य व्यक्ति. कंस्ट्रक्शन साईट पर काम करने वाले मजदूर, प्लंबर, राजमिस्त्री, मजदूर, पेंटर, वेल्डर, सिक्योरिटी गार्ड, कुली और भार ढोने वाले अन्य कामकाजी व्यक्ति स्वीपर, सफाई कर्मी, घरेलू काम करने वाले, हेंडीक्राफ्ट का काम करने वाले लोग, टेलर, ड्राईवर, रिक्शा चालक, दुकान पर काम करने वाले लोग आदि आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होंगे.

ABY में अस्पताल में भर्ती की प्रक्रिया

आयुष्मान भारत योजना (ABY) का लाभार्थी अस्पताल में एडमिट होने के लिए कोई चार्ज नहीं चुकाएगा. अस्पताल में दाखिल होने से लेकर इलाज तक का सारा खर्च इस योजना में कवर किया जायेगा. आयुष्मान भारत योजना (ABY) के लाभ में अस्पताल में दाखिल होने से पहले और बाद के खर्च भी कवर किये जायेंगे. पैनल में शामिल हर अस्पताल में एक आयुष्मान मित्र होगा. वह मरीज की मदद करेगा और उसे अस्पताल की सुविधाएं दिलाने में मदद करेगा. अस्पताल में एक हेल्प डेस्क भी होगा जो दस्तावेज चेक करने, स्कीम में नामांकन के लिए वेरिफिकेशन में मदद करेगा. आयुष्मान भारत योजना में शामिल व्यक्ति देश के किसी भी सरकारी/पैनल में शामिल निजी अस्पताल में इलाज करा सकेगा.

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के वरिष्‍ठ अधिकारी डेविड मालपास को विश्‍व बैंक का नए अध्‍यक्ष बना दिया गया। वह फिलहाल वित्त विभाग में अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप मंत्री है। उनका कार्यकाल नौ अप्रैल से पांच साल के लिये होगा।

अमेरिका के वित्‍त विभाग के वरिष्‍ठ अधिकारी डेविड मालपास विश्‍व बैंक के नए अध्‍यक्ष होंगे। विश्‍व बैंक के कार्यकारी बोर्ड ने 63 वर्ष के मालपास को पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए बैंक के 13वें अध्‍यक्ष के रूप में चयन किया। विश्वबैंक के कार्यकारी बोर्ड ने आम सहमति से मालपास का अध्यक्ष के रूप में चयन किया। वह फिलहाल वित्त विभाग में अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप मंत्री है। उनका कार्यकाल नौ अप्रैल से पांच साल के लिये होगा। गौरतलब है कि सभी 13 अध्यक्ष अमेरिकी हैं। विश्वबैंक का अध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (आईबीआरडी) तथा अंतरराष्ट्रीय विकास संघ (आईडीए) के निदेशक मंडल के अध्यक्ष होते हैं।

आज 27 मार्च को भारत ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल किया है. हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर Low Earth Orbit (LEO) में एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराया है. यह सैटेलाइट जो कि एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था, एसेट मिसाइल द्वारा मार गिराया गया. 'मिशन शक्ति' को तीन मिनट में सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया. यह अत्यंत कठिन ऑपरेशन था. इसमें उच्च गुणवत्ता वाली तकनीक की जरूरत थी. सभी निर्धारित उद्देश्य प्राप्त कर लिए गए. यह भारत में एंटी सैटेलाइट (ए-सेट) मिसाइल द्वारा सिद्ध किया गया.

 भारत ने अंतरिक्ष में एक और कामयाबी का परचम लहराया है और मिशन शक्ति (Mission Shakti) की सफलता के साथ अमेरिका, चीन, रूस के बाद भारत दुनिया का चौथा सबसे शक्तिशाली देश बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने देश के नाम संबोधन में इस बात की जानकारी दी. पीएम मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन के दौरान कहा कि भारत अंतरिक्ष पावर के रूप में दुनिया का चौथा सबसे शक्तिशाली देश बन गया है.

अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों और जिम्मेदार देश होने के कारण भारत ने पहले इस क्षमता को हासिल होने के बारे में कोई पुष्टि नहीं की थी। लेकिन वर्तमान में बढ़ते सामरिक खतरों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज इस मिसाइल के सफल परीक्षण के साथ इस बात की घोषणा कर दी कि भारत भी इस प्रकार के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है।

चीन ने भारत के उपग्रह रोधी मिसाइल परीक्षण पर सतर्कतापूर्वक प्रतिक्रिया जताते हुए उम्मीद जतायी कि सभी देश बाहरी अंतरिक्ष में शांति बनाये रखेंगे। चीन ने ऐसा एक परीक्षण जनवरी 2007 में किया था जब उसके उपग्रह रोधी मिसाइल ने एक निष्क्रिय मौसम उपग्रह को नष्ट कर दिया था।

क्या होता है लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) ?

लो अर्थ ऑर्बिट धरती के सबसे पास वाली कक्षा होती है। यह धरती से 2000 किमी ऊपर होती है। धरती की इस कक्षा में ज्यादातर टेलीकम्युनिकेशन सेटेलाइट्स को रखा जाता है।

क्या होता है स्पेस वॉर ?

माना जा रहा है कि अगला विश्‍व युद्ध धरती पर नहीं अंतरिक्ष में लड़ा जाएगा। इसे देखते हुए दुनिया के कई देशों ने उपग्रहों का प्रक्षेपण तेज कर दिया है। सभी देश अंतरिक्ष में अपनी ताकत तेज करने में लगे हुए हैं। जून 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक स्पेस फोर्स बनाने का एलान कर अंतरिक्ष में हथियारों और सेनाओं की मौजूदगी को लेकर बहस छेड़ दी थी। उन्होंने अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन को स्पेस-फोर्स बनाने का आदेश दिया था। स्पेस-फोर्स के फैसले को वो देश की निजी सुरक्षा से जुड़ा मानते हैं।

क्या होगा भारत को फायदा ?

पाकिस्तान और चीन की और से लगातार बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत को इसका बहुत फायदा होगा। चीन और पाकिस्तान की मिसा‍इलों का भारत की रडार से बचना अब खासा मुश्किल हो जाएगा। इससे न सिर्फ भारत का दुनिया में दबदबा बढ़ेगा बल्कि भारत की सुरक्षा व्यवस्‍था बेहद मजबूत हो जाएगी।

7 मार्च 2019 को जन औषधि दिवस देशभर में मनाया जाएगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये पांच हजार जन औषधि भण्‍डारों के संचालकों और इस कार्यक्रम के लाभार्थियों से बातचीत करेंगे। देश के छह सौ बावन जिलों में पांच हजार से अधिक प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना केन्‍द्र काम कर रहे हैं।

रसायन और उर्वरक राज्‍य मंत्री मनसुख मांडविया ने नई दिल्‍ली में संवाददाताओं को बताया कि पिछले तीन वर्षों में जेनेरिक औषधियों की बाजार में हिस्‍सेदारी में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है जो दो प्रतिशत से बढ़कर सात प्रतिशत हो गई है।

श्री मांडविया ने कहा कि सरकार का लक्ष्‍य 2020 तक ब्‍लॉक स्‍तर पर जन औषधि केन्‍द्र खोलने का है।

सारे देश में हमने पांच हजार जन औषधि स्टोर आज के दिन में सर्व कर दिया है। ये जन औषधि स्टोर पर मेक्सिमम 50 परसेन्ट, मिनिमम 20 परसेन्ट, 30 परसेन्‍ट रेट में क्‍वालिटी जेनेरिक मेडिसिन उपलब्‍ध होती है। जन औषधि केंद्र के माध्यम से जेनेरिक मेडिसिन उपलब्ध करवा के देश में जेनेरिक मेडिसिन पोपुलर बने, उसकेलिए भी हमने प्रयास करना शुरू किया है।

सरकार आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि जैसी योजनाओं के जरिए से सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करने के लिए लगातार काम कर रही है। इस परियोजना से आम नागरिकों को करीब लगभग 1000 करोड़ रुपये की बचत हुई है, केंद्रों के जरिए बेची जाने वाली दवाईओं की कीमत औसत बाजार मूल्य से 50 से 90 प्रतिशत तक कम होती है। जनऔषधि दिवस पर आज सभी केंद्रों पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस बारे में जागरूक किया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के उन तमाम वर्गो को सामाजिक सुरक्षा से लैस कर दिया जो अब तक इन सुविधाओं से वंचित थे।  पीएम ने अपनी गुजरात यात्रा के दूसरे दिन असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे कामगारों के लिए इस बड़ी योजना की शरूआत की। प्रधानमंत्री ने कहा कि ये योजना देश के श्रमजीवियों,कर्मजीवियों को समर्पित है और मां भारती के भाल पर ये एक तिलक के समान है। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि ग़रीबी कैसी होती है और एक मज़दूर का जीवन कितना संघर्षपूर्ण होता है इसे उन्होने नज़दीक से देखा है। वजह यही है आज़ादी के बाद जो काम ग़रीबों,मज़दूरों और कामगारों के हित के लिए नहीं हुआ उसे सिर्फ 55 महीने वाली सरकार ने मुमकिन करके दिखाया है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और मजदूरों के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना की घोषणा इस साल फरवरी में अंतरिम बजट में की गई थी। श्रम योगी मानधन योजना से वे सभी लोग जुड़ सकते हैं जिनकी आय 15 हज़ार प्रति माह है या इससे कम है।

इस योजना में स्वैच्छिक रूप से वो लोग जुड़ सकते हैं जो योग्य हों। योजना के साथ जुड़ने की उम्र 18 वर्ष से 40 वर्ष तक की है। किसी भी कॉमन सेंटर पर जाकर रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है। 60 वर्ष की उम्र के बाद जुड़ने वाले पात्र व्यक्तियों 3 हज़ार प्रति माह की निश्चित राशि पेंशन के रूप में मिलेगी। इसके तहत 18 वर्ष की उम्र में जुड़ने वाले व्यक्ति को 55रु. प्रति माह 29 वर्ष की आयु में जुड़ने वाले को 100रु. प्रति माह और 40वर्ष की उम्र में जुड़ने वाले व्यक्ति को 200रु. प्रति माह का अंशदान देना होगा। 

योजना से असंगठित क्षेत्र के 10 करोड़ श्रमिकों को लाभ मिलेगा। पीएम ने 'प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना' के तहत 11 लाख 51 हजार लाभार्थियों तक 13 करोड़ 58 लाख 31 हजार 918 रुपये की धनराशि सीधे श्रमिकों के पेंशन खातों में ट्रांसफर की। दरअसल, मेहनतकश लोगों तक सामाजिक लाभ पहुंचे इसके लिए सरकार ने प्रधानमंत्री बीमा योजना भी लागू की है। अब बीमा के बाद पेंशन योजना की शुरुआत असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए नई उम्मीद है। 

राष्‍ट्रपति श्री राम नाथ कोविन्‍द ने आज राष्‍ट्रपति भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में वर्ष 2015, 2016, 2017 और 2018 के लिए गांधी शांति पुरस्‍कार प्रदान किये। इस अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी, संस्‍कृति राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) डॉ. महेश शर्मा और अन्‍य गणमान्‍य व्‍यक्ति उपस्थित थे।

गांधी शांति पुरस्‍कार वर्ष 2015 के लिए विवेकानंद केन्‍द्र, कन्‍याकुमारी, 2016 के लिए संयुक्‍त रूप से अक्षय पात्र फाउंडेशन व सुलभ इं‍टरनेशनल, 2017 के लिए एकल अभियान ट्रस्‍ट तथा 2018 के लिए जापान के श्री योहेई ससाकावा को प्रदान किया गया।

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पुरस्‍कार विजेताओं के योगदान के बारे में राष्‍ट्रपति ने कहा कि विवेकानंद केन्‍द्र ने पूरे देश में विशेषकर जनजाति बहुल इलाकों में स्‍वयं सहायता, सततता और विकास को प्रोत्‍साहन दिया है। संगठन ने शिक्षा तथा स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में क्षमता निर्माण किया है। अक्षय पात्र फाउंडेशन ने शिक्षा का प्रसार करने, भूख को मिटाने तथा पोषण को बेहतर बनाने का कार्य किया है। फाउंडेशन स्‍कूली बच्‍चों को संतुलित और पोषण युक्‍त भोजन उपलब्‍ध कराने के लिए आधुनिकतम तकनीक का उपयोग करता है। सुलभ इं‍टरनेशनल और इसके संस्‍थापक डॉ. विंदेश्‍वर पाठक ने स्‍वच्‍छता के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई है। एकल अभियान ट्रस्‍ट 22 लाख बच्‍चों को शिक्षा प्राप्‍त करने में सहायता प्रदान कर रहा है। इन बच्‍चों में 52 प्रतिशत लड़कियां हैं। ट्रस्‍ट के कई कार्यक्रमों से जनजातीय समुदायों को लाभ मिला है। श्री योहेई ससाकावा ने कुष्‍ठ रोग के खिलाफ हमारी लड़ाई (रोकथाम व समाप्ति) में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अहिंसा के माध्‍यम से सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूपांतर के लिए गांधी शांति पुरस्‍कार की स्‍थापना 1995 में की गई थी। पुरस्‍कार के अंतर्गत एक करोड़ रुपये की धनराशि और एक प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। भारत के प्रधानमंत्री, ज्‍यूरी के अध्‍यक्ष हैं, जो विजेताओं का चयन करती है। यह वार्षिक पुरस्कार समाज के कमजोर तबको में शांति, अहिंसा और मानवीय कष्‍टों को समाप्‍त करने के लिए कार्य करने वाले संगठनों, संस्‍थाओं, संघों या व्‍यक्तिगत स्‍तर पर दिया जाता है। इस पुरस्‍कार के लिए सभी व्‍यक्ति योग्‍य हैं। इसके चयन में राष्‍ट्रीयता, भाषा, जाति, वर्ग, समुदाय या लिंग का विभेद नहीं किया जाता है।

पुलवामा आतंकी हमले और फिर भारतीय वायुसेना की ओर से 26 फरवरी को पाकिस्‍तान के बालाकोट में की गई एयर स्‍ट्राइक के बाद पाकिस्‍तान ने भारतीय हवाई क्षेत्र के उल्‍लंघन की कोशिश की, जिसे भारत ने सतर्कता से विफल कर दिया। हालांकि इस दौरान एक मिग-21 बायसन हादसे का शिकार हो गया और पायलट को पाकिस्‍तान ने अपनी हिरासत में ले लिया।

विंग कमांडर को पाकिस्‍तान द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद जेनेवा संधि की चर्चा हो रही है। इस चर्चा को इन आरोपों के बीच बल मिला कि पाकिस्‍तान में भारतीय विंग कमांडर के बीच बदसलूकी की गई और 'युद्ध बंदी' के साथ इस तरह का सलूक जेनेवा संधि का उल्‍लंघन है।

क्‍या है जेनेवा कन्‍वेंशन?

जेनेवा कन्‍वेंशन (1949) अंतरराष्‍ट्रीय संधियों का एक सेट है, जिसमें चार संधियां और तीन अतिरिक्त प्रोटोकॉल शामिल हैं। यह सुनिश्चित करता है कि युद्ध में शामिल सभी पक्ष नागरिकों और मेडिकल कर्मचारियों के साथ अंतरराष्‍ट्रीय कानून के तहत मानवीय व्‍यवहार करेंगे। दूसरे शब्‍दों में कहें तो यह कैदियों के युद्धकालीन बुनियादी अधिकारों (नागरिक और सैन्य) को परिभाषित करता है।

कौन होते हैं युद्धबंदी?

युद्ध के दौरान अगर कोई सैनिक शत्रु देश की सीमा में दाखिल हो जाता है और उसे गिरफ्तार किया जाता है तो वह युद्धबंदी माना जाएगा और शत्रु पक्ष उन्‍हें डरा-धमका या अपमानित नहीं कर सकता। कन्‍वेंशन यह प्रावधान भी करता है कि ऐसा कुछ भी न किया जाए, जिससे आम लोगों में उनके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़े। विंग कमांडर अभिनंदन के संदर्भ में संधि के उल्‍लंघन की बात इसलिए भी सामने आ रही है, क्‍योंकि सोशल मीडिया पर उनके कई वीडियो सामने आए हैं।

युद्ध बंदियों के क्‍या अधिकार हैं?

जेनेवा कन्‍वेंशन के तहत युद्धबंदियों को किसी तरह की शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना नहीं दी जा सकती और न ही उन्‍हें किसी तरह की सूचना देने के लिए शारीरिक या मानसिक तौर पर बाध्‍य किया जा सकता है। उनके साथ किसी भी तरह की जोर-जबरदस्‍ती निषेध है। अगर वह किसी सवाल का जवाब न देना चाहे तो उन्‍हें इसके लिए दंडित नहीं किया जा सकता और न ही उनका इस्‍तेमाल मानवीय ढाल (human shield) की तरह किया जा सकता है। हालांकि पकड़े जाने की स्थिति में युद्धबंदियों को अपना नाम, सैन्य पद और नंबर बताना होगा।

क्‍या युद्ध बंदियों को रिहा किया जा सकता है?

संध‍ि के प्रावधानों के तहत युद्धबंदियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का प्रावधान है। साथ ही एक विकल्प यह भी है कि युद्ध समाप्त हो जाने के बाद उन्हें संबंधित देश को वापस लौटा दिया जाए। संघर्षरत पक्षों को गंभीर रूप से घायल या बीमार सैनिकों को ठीक हो जाने के बाद उनके देश भेजना होगा। विभिन्‍न पक्ष इस बारे में समझौता कर सकते हैं और युद्धबंदियों की रिहाई या नजरबंदी के बारे में एक आम राय कायम कर सकते हैं। यहां उल्‍लेखनीय है कि 1971 के युद्ध के दौरान 80,000 से अधिक पाकिस्‍तानी सैनिकों ने भारत के सामने समर्पण कर दिया था, जिन्‍हें भारत ने 1972 के शिमला समझौते के तहत रिहा कर दिया था। विंग कमांडर अभिनंदन के संदर्भ में भी पाकिस्‍तान पर यह बात लागू होती है।

कौन निर्धारित करता है इस संधि का पालन हो रहा है या नहीं?

जेनेवा संधि का अनुपालन समुचित तरीके से हो रहा है या नहीं, इसका निर्धारण आम तौर पर अंतरराष्‍ट्रीय रेड क्रॉस समिति करती है। कारगिल युद्ध के दौरान भी पाकिस्‍तान ने दो भारतीय पायलटों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को पाकिस्‍तान ने बाद में रिहा कर दिया था, जबकि एक अन्‍य युद्ध बंदी स्‍क्‍वाड्रन लीडर अजय आहूजा पाकिस्‍तान की कैद में ही शहीद हो गए थे।

भारत में सन् 1986 से प्रतिवर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) मनाया जाता है। प्रोफेसर सी.वी. रमन (चंद्रशेखर वेंकटरमन) ने सन् 1928 में कोलकाता में इस दिन एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोज की थी, जो ‘रमन प्रभाव’ के रूप में प्रसिद्ध है। रमण की यह खोज 28 फरवरी 1930 को प्रकाश में आई थी। इस कारण 28 फरवरी राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस कार्य के लिए उनको 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस दिवस का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति आकर्षित करना, विज्ञान के क्षेत्र में नए प्रयोगों के लिए प्रेरित करना तथा विज्ञान एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति सजग बनाना है। इस दिन, विज्ञान संस्थान, प्रयोगशाला, विज्ञान अकादमी, स्कूल, कॉलेज तथा प्रशिक्षण संस्थानों में वैज्ञानिक गतिविधियों से संबंधित प्रोग्रामों का आयोजन किया जाता हैं। रसायनों की आणविक संरचना के अध्ययन में 'रमन प्रभाव' एक प्रभावी साधन है। 

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस देश में विज्ञान के निरंतर उन्नति का आह्वान करता है, परमाणु ऊर्जा को लेकर लोगों के मन में कायम भ्रातियों को दूर करना इसका मुख्य उद्देश्य है तथा इसके विकास के द्वारा ही हम समाज के लोगों का जीवन स्तर अधिक से अधिक खुशहाल बना सकते हैं।  

रमन प्रभाव में एकल तरंग- दैध्र्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें, जब किसी पारदर्शक माध्यम ठोस, द्रव या गैस से गुजरती है तब इसकी छितराई किरणों का अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कमजोर तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं। इन्हीं किरणों को रमन-किरण भी कहते हैं। > भौतिक शास्त्री सर सी.वी. रमन एक ऐसे महान आविष्कारक थे, जो न सिर्फ लाखों भारतीयों के लिए बल्कि दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। यह किरणें माध्यम के कणों के कंपन एवं घूर्णन की वजह से मूल प्रकाश की किरणों में ऊर्जा में लाभ या हानि के होने से उत्पन्न होती हैं। इतना ही नहीं इसका अनुसंधान की अन्य शाखाओं, औषधि विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान तथा दूरसंचार के क्षेत्र में भी बहुत महत्व है।

केंद्र सरकार ने 27 फ़रवरीं 2019 को आंध्र प्रदेश के लिए एक अलग नया रेलवे जोन दक्षिण तटीय रेलवे (एससीओआर-South Coast Railway) की स्थापना की घोषणा की है ।  इस रेलवे जोन में गुंतकल, गुंटूर तथा विजयवाड़ा डिवीज़न शामिल होंगे। यह डिवीज़न केन्द्रीय रेलवे के अधीन आते हैं। दक्षिणी केन्द्रीय रेलवे में हैदराबाद, सिकंदराबाद तथा नांदेड़ डिवीज़न शामिल होंगे। वाल्टेयर डिवीजन को दो भागों में बाटा जाएगा। वाल्टेयर डिवीजन के एक हिस्से को नए मंडल यानि दक्षिण तटीय रेलवे में शामिल करके पड़ोसी विजयवाड़ा डिवीजन में मिला लिया जाएगा। वाल्टेयर डिवीजन के बाकी हिस्से को एक नए डिवीजन में परिवर्तित कर दिया जाएगा। इसका मुख्यालय पूर्वी तटीय रेलवे के अधीन रायगडा में होगा। दक्षिण मध्य रेलवे में हैदराबाद, सिकंद्राबाद और नान्देड़ डिवीजन शामिल होंगे। 

आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 की अनुसूची 13 (बुनियादी ढांची) की मद संख्या 8 के अनुसार भारतीय रेलवे बोर्ड से उत्तराधिकारी राज्य आंध्र प्रदेश में एक नए रेल मंडल की स्थापना की जांच पड़ताल करना अपेक्षित था। इस मामले में हितधारकों के साथ परामर्श करके विस्तृत जांच पड़ताल की गई और विशाखापत्तनम में मुख्यालय वाले नए मंडल का निर्माण करने का निर्णय लिया गया।

भारतीय रेलवे विश्व के सबसे उत्कृष्ट रेलवे नेटवर्क में से एक है, भारतीय रेलवे का 1,51,000 किलोमीटर ट्रैक, 7000 स्टेशन, 13 लाख कर्मचारी तथा 160 वर्षों का इतिहास है। भारत में रेलवे की शुरुआत 16 अप्रैल, 1853 को बोरी बंदर और थाने के बीच हुई थी। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'प्रधानमंत्री जन आरोग्य' योजना (आयुष्मान भारत योजना यानी ABY) की घोषणा की है. इसे पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती पर 25 सितंबर से देशभर में लागू कर दिया गया है. सरकार ABY के माध्यम से गरीब, उपेक्षित परिवार और शहरी गरीब लोगों के परिवारों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना चाहती है. 

सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) 2011 के हिसाब से ग्रामीण इलाके के 8.03 करोड़ परिवार और शहरी इलाके के 2.33 करोड़ परिवार आयुष्मान भारत योजना (ABY) के दायरे में आयेंगे. 

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में हर परिवार को सालाना पांच लाख रुपये का मेडिकल इंश्योरेंस मिल रहा है. साल 2008 में यूपीए सरकार द्वारा लांच राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (NHBY) को भी आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY) में मिला दिया गया है. 

ABY की योग्यता का निर्धारण कैसे होता है?
SECC के आंकड़ों के हिसाब से आयुष्मान भारत योजना (ABY) में लोगों को मेडिकल इंश्योरेंस मिल रहा है. SECC के आंकड़ों के हिसाब से ग्रामीण इलाके की आबादी में D1, D2, D3, D4, D5 और D7 कैटेगरी के लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल किये गए हैं. 

शहरी इलाके में 11 पूर्व निर्धारित पेशे/कामकाज के हिसाब से लोग आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो सकते हैं. राज्यों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में पहले से शामिल लोग खुद ही आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो गए हैं.

ग्रामीण इलाके के लिए ABY की योग्यता 
आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: 

  • ग्रामीण इलाके में कच्चा मकान, परिवार में किसी व्यस्क (16-59 साल) का नहीं होना, परिवार की मुखिया महिला हो, परिवार में कोई दिव्यांग हो, अनुसूचित जाति/जनजाति से हों और भूमिहीन व्यक्ति/दिहाड़ी मजदूर

  • इसके अलावा ग्रामीण इलाके के बेघर व्यक्ति, निराश्रित, दान या भीख मांगने वाले, आदिवासी और क़ानूनी रूप से मुक्त बंधुआ आदि खुद आयुष्मान भारत योजना आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल हो जायेंगे.

शहरी इलाके के लिए ABY की योग्यता

आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होने के लिए मोटे तौर पर ये योग्यता हैं: भिखारी, कूड़ा बीनने वाले, घरेलू कामकाज करने वाले, रेहड़ी-पटरी दुकानदार, मोची, फेरी वाले, सड़क पर कामकाज करने वाले अन्य व्यक्ति. कंस्ट्रक्शन साईट पर काम करने वाले मजदूर, प्लंबर, राजमिस्त्री, मजदूर, पेंटर, वेल्डर, सिक्योरिटी गार्ड, कुली और भार ढोने वाले अन्य कामकाजी व्यक्ति स्वीपर, सफाई कर्मी, घरेलू काम करने वाले, हेंडीक्राफ्ट का काम करने वाले लोग, टेलर, ड्राईवर, रिक्शा चालक, दुकान पर काम करने वाले लोग आदि आयुष्मान भारत योजना (ABY) में शामिल होंगे.

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के विनिर्माण और उनके तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए फेम इंडिया योजना के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है।

कुल 10,000 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली यह योजना 1 अप्रैल, 2019 से तीन वर्षों के लिए शुरू की जाएगी। यह योजना मौजूदा ‘फेम इंडिया वन’ का विस्तारित संस्करण है। ‘फेम इंडिया वन’योजना 1 अप्रैल, 2015 को लागू की गई थी।

वित्तीय प्रभावः

फेम इंडिया योजना का दूसरा चरण 2019-20 से 2021-22 तक तीन वर्षों के लिए लागू किया जाएगा। इसके लिए कुल 10,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी।

प्रभावः

इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में इलेक्ट्रिक और हाईब्रिड वाहनों के तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसके लिए लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में शुरूआती स्तर पर प्रोत्साहन राशि देने तथा ऐसे वाहनों की चार्जिंग के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा विकसित करना है। यह योजना पर्यावरण प्रदूषण और ईंधन सुरक्षा जैसी समस्याओं का समाधान करेगी।

विवरणः

·         बिजली से चलने वाली सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर जोर।

·         इलेक्ट्रिक बसों के संचालन पर होने वाले खर्चों के लिए मांग आधारित प्रोत्साहन राशि मॉडल अपनाना, ऐसे खर्च राज्य और शहरी परिवहन निगमों द्वारा दिया जाना। 

·         सार्वजनिक परिवहन सेवाओं और वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए पंजीकृत 3 वॉट और 4 वॉट श्रेणी वाले इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए प्रोत्साहन राशि।

·         2 वॉट श्रेणी वाले इलेक्ट्रिक वाहनों में मुख्य ध्यान निजी वाहनों पर केन्द्रित रखना।

·         इस योजना के तहत 2 वॉट वाले 10 लाख, 3 वॉट वाले 5 लाख, 4 वॉट वाले 55,000 वाहन और 7000 बसों को वित्तीय प्रोत्साहन राशि देने की योजना है।

·         नवीन प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन राशि का लाभ केवल उन्हीं वाहनों को दिया जाएगा, जिनमें अत्याधुनिक लिथियम आयोन या ऐसी ही अन्य नई तकनीक वाली बैट्रियां लगाई गई हों।

·         योजना के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है इसके तहत महानगरों, 10 लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहरों, स्मार्ट शहरों, छोटे शहरों और पर्वतीय राज्यों के शहरों में तीन किलोमीटर के अंतराल में 2700 चार्जिंग स्टेशन बनाने का प्रस्ताव हैं।

·         बड़े शहरों को जोड़ने वाले प्रमुख राजमार्गों पर भी चार्जिंग स्टेशन बनाने की योजना है।

·         ऐसे राजमार्गों पर 25 किलोमीटर के अंतराल पर दोनों तरफ भी ऐसे चार्जिंग स्टेशन लगाने की योजना है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने  प्रधानमंत्री जी-वन (जैव ईंधन वातावरण अनुकूल फसल अवशेष निवारण) योजना के लिए वित्तीय मदद को मंजूरी दे दी है। इसके तहत ऐसी एकीकृत बायो-इथेनॉल परियोजनाओं को, जो लिग्नोसेलुलॉसिक बायोमास और अन्य नवीकरणीय फीडस्टॉक का इस्तेमाल करती हैं, के लिए वित्तीय मदद का प्रावधान है।

भारत सरकार ने इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम 2003 में लागू किया था। इसके जरिए पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण कर पर्यावरण को जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान से बचाना, किसानों को क्षतिपूर्ति दिलाना तथा कच्चे तेल के आयात को कम कर विदेशी मुद्रा बचाना है। वर्तमान में ईबीपी 21 राज्यों और 4 संघ शासित प्रदेशों में चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत तेल विपणन कम्पनियों के लिए पेट्रोल में 10 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाना अनिवार्य बनाया गया है। मौजूदा नीति के तहत पेट्रोकेमिकल के अलावा मोलासिस और नॉन फीड स्‍टाक उत्पादों जैसे सेलुलोसेस और लिग्नोसेलुलोसेस जैसे पदार्थों से इथेनॉल प्राप्त करने की अनुमति दी गई है।

वित्तीय प्रभावः

जी-वन योजना के लिए 2018-19 से 2023-24 की अवधि में कुल 1969.50 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय को मंजूरी दी गई है। परियोजनाओं के लिए स्वीकृत कुल 1969.50 करोड़ रुपये की राशि में से 1800 करोड़ रुपये 12 वाणिज्यिक परियोजनाओं की मदद के लिए, 150 करोड़ रुपये प्रदर्शित परियोजनाओं के लिए और बाकी बचे 9.50 करोड़ रुपये केन्द्र को उच्च प्रौद्योगिकी प्रशासनिक शुल्क के रूप में दिए जाएंगे।

विवरणः

इस योजना के तहत वाणिज्यिक स्तर पर 12 परियोजनाओं को और प्रदर्शन के स्तर पर दूसरी पीढ़ी के 10 इथेनॉल परियोजनाओं को दो चरणों में वित्तीय मदद दी जाएगी।

1.      पहला चरण (2018-19 से 2022-23)- इस अवधि में 6 वाणिज्यिक परियोजनाओं और 5 प्रदर्शन के स्तर वाली परियोजनाओं को आर्थिक मदद दी जाएगी।

2.      दूसरा चरण (2020-21 से 2023-24)- इस अवधि में बाकी बची 6 वाणिज्यिक परियोजनाओं और 5 प्रदर्शन स्तर वाली परियोजनाओं को मदद की व्यवस्था की गई है।

·         परियोजना के तहत दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल क्षेत्र को प्रोत्साहित करने और मदद करने का काम किया गया है। इसके लिए उसे वाणिज्यिक परियोजनाएं स्थापित करने और अनुसंधान और विकास गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने का काम किया गया है।

·         ईबीपी कार्यक्रम के तहत सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को मदद पहुंचाने के अलावा निम्नलिखित लाभ भी होंगे।

1.      जीवाश्म ईंधन के स्थान पर जैव ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर आयात पर निर्भरता घटाने की भारत सरकार की परिकल्पना को साकार करना।

2.      जीवाश्म ईंधन के स्थान पर जैव ईंधन के इस्तेमाल का विकल्प लाकर उत्सर्जन के सीएचजी मानक की प्राप्ति।

3.      बायोमास और फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान का समाधान और लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना।

4.      दूसरी पीढ़ी की इथेनॉल परियोजना और बायोमास आपूर्ति श्रृंखला में ग्रामीण और शहरी लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना।

5.      बायोमास कचरे और शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले कचरे के संग्रहण की समुचित व्यवस्था कर स्वच्छ भारत मिशन में योगदान करना।

6.      दूसरी पीढ़ी के बायोमास को इथेनॉल प्रौद्योगिकी में परिवर्तित करने की विधि का स्वदेशीकरण।

·         योजना के लाभार्थियों द्वारा बनाए गए इथेनॉल की अनिवार्य रूप से तेल विपणन कम्पनियों को आपूर्ति, ताकि वे ईबीपी कार्यक्रम के तहत इनमें निर्धारित प्रतिशत में मिश्रण कर सके।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 2022 तक पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण 10 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इथेनॉल की कीमत ज्यादा रखने और इथेनॉल खरीद प्रक्रिया को आसान बनाने के तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद 2017-18 के दौरान इथेनॉल की खरीद 150 करोड़ लीटर ही रही, हालांकि यह देशभर में पेट्रोल में इथेनॉल के 4.22 प्रतिशत मिश्रण के लिए पर्याप्त है। इथेनॉल इसी वजह से बायोमास और अन्य कचरों से दूसरी पीढ़ी का इथेनॉल प्राप्त करने की संभावनाएं पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा तलाशी जा रही हैं। इससे ईबीपी कार्यक्रम के तहत किसी तरह होने वाली कमी को पूरा किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री जी-वन योजना इसी को ध्यान में रखते हुए लागू की गई है। इसके तहत देश में दूसरी पीढ़ी की इथेनॉल क्षमता विकसित करने और इस नए क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने का प्रयास किया गया है।

इस योजना को लागू करने का अधिकार पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक तकनीकी इकाई सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी को सौंपा गया है। इस योजना का लाभ उठाने के इच्छुक प्रोजेक्ट डेवलपरों को अपने प्रस्ताव समीक्षा के लिए मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार समिति को सौंपने होंगे। समिति जिन परियोजनाओं की अनुशंसा करेगी उन्हें मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में संचालन समिति द्वारा मंजूरी दी जाएगी।

वर्ल्ड नम्बर-1 जोकोविक (Novak Djokovic) ने सातवीं बार ऑस्‍ट्रेलियन ओपन खिताब अपने नाम किया है. उन्‍होंने पिछली बार 2016 में साल के पहले ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपन का खिताब अपने नाम किया था. दो साल बाद उन्होंने एक बार फिर इस खिताब पर अपना कब्जा जमाया है. दूसरी ओर स्‍पेन नडाल ने 2009 में यह खिताब अपने नाम किया था.

ब्रितानी शासनकाल ने भारत को कई चीज़ें दी हैं. इनमें से एक अहम चीज़ है पूरे देश का एक ही टाइमज़ोन में होना. कई लोगों के अनुसार ये अनेकता में एकता का प्रतीक है. लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी मानते हों कि भारतीय मानक समय यानी इंडियन स्टेंडर्ड टाइम एक अच्छी चीज़ है. पढ़िए क्यों. पूर्व से पश्चिम तक भारत 3,000 किलोमीटर यानी 1,864 मील तक चौड़ा है. देशान्तर रेखा पर देखें तो ये कम से कम 30 डिग्री तक के इलाके में फैला है. सूर्य को आधार बना कर होने वाली समय की गणना के अनुसार इसका मतलब है कि एक छोर से दूसरे छोर तक समय का फर्क कम से कम दो घंटे का है.

इस फर्क का अंदाज़ा न्यू यॉर्क और यूटा के समय को देखने पर पता चलता है. अगर ये दोनों जगहें भारत में होतीं तो दोनों जगहों पर समय एक ही होता. लेकिन, भारत में इस छोटे से फर्क का असर लाखों लोंगों पर पड़ा है.

भारत के सूदूर पश्चिमी छोर के मुकाबले देश के पूर्व में सूर्योदय तकरीबन दो घंटे पहले होता है.

पूरे देश के लिए एक मानक समय की आलोचना करने वालों का कहना है कि देश के पूर्वोत्तर में सूर्य की रोशनी का पूरा इस्तेमाल करने के लिए ये ज़रूरी है कि भारत में दो मानक समय को स्वीकार किया जाए. पूर्व में सूर्य की रोशनी जल्दी पड़ती है और इस कारण वहां इसका इस्तेमाल पहले शुरु हो सकता है.

हमारे शरीर के भीतर एक घड़ी होती है जो एक नियत ताल पर चलती है, इसे सिर्काडियन रिदम कहते हैं. सूर्य का उदय होना और ढलना इस ताल को सीधे तौर पर प्रभावित करता है. जैसे-जैसे सांझ होने लगती है हमारे शरीर में नींद को प्रभावित करने वाला हॉर्मोन मेलाटोनिन बनता है, इस कारण व्यक्ति को नींद आने लगती है.

चूंकि पूरे भारत में एक ही मानक समय को अपनाया गया है तो देश भर के स्कूल लगभग एक ही समय पर खुलते हैं. लेकिन, जिन जगहों पर सूर्य देर से अस्त होता है वहां बच्चे देर में सोने जाते हैं और इस कारण उन्हें जितनी नींद मिलनी चाहिए उससे कम नींद मिलती है.

अगर सूर्य के अस्त होने में एक घंटे की देरी है तो बच्चे को इस कारण आधे घंटी की नींद कम मिलती है.

इंडियन टाइम सर्वे और भारतीय डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे के तहत जमा किए गए आंकड़ों का आकलन करने के बाद मौलिक जगनानी का कहना है कि जिन जगहों पर सूर्य देर में डूबता है वहां बच्चों को मिलने वाली शिक्षा का वक्त भी कम हो जाता है और ऐसी जगहों में बच्चों के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल छोड़ने की आशंका अधिक रहती है.

उनका कहना है कि सूरज के देर में डूबने के कारण अधिकतर ग़रीब परिवारों के बच्चों को नींद कम मिलती है. ख़ास कर ऐसे परिवारों में जो मुश्किल आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं.

अमरीका ने शीत युद्ध के दौर के प्रमुख परमाणु ​हथियार समझौते इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फ़ोर्स यानी आईएनएफ़ संधि को स्थगित कर दिया है. फिलहाल अमरीका ने संधि को छह महीनों के लिए स्थगित कर दिया है और अगर रूस के साथ मतभेद हल नहीं होते हैं तो अमरीका संधि से बाहर निकल जाएगा.

अमरीका का कहना है कि रूस के क्रूज़ मिसाइल विकसित करने से संधि की शर्तों का उल्लंघन हुआ है. हालांकि, रूस अमरीका के इस आरोप से लगातार इनकार करता रहा है. दोनों ही पक्ष सं​धि का पालन न करने को लेकर एक-दूसरे को लंबे समय से आरोपी ठहराते आए हैं.

यह संधि एक महत्वपूर्ण हथियार नियंत्रण समझौता है जिस पर अमरीका और सोवियत संघ ने 1987 में हस्ताक्षर किए थे.

दुनिया की महाशक्तियों ने संधि के तहत ज़मीन से मार करने वाली 500 से लेकर 5,500 किलोमीटर की रेंज वाली मध्यम दूरी की मिसाइलों और क्रूज़ मिसाइलों को नष्ट करने और प्रतिबंधित करने पर सहमति जताई थी. इसमें परमाणु और पारंपरिक दोनों तरह की मिसाइलें शामिल हैं.

1970 में सोवियत रूस ने पश्चिमी यूरोप में एसएस-20 मिसाइल भेजी थी जिनसे नेटो में शामिल देशों की चिंताएं बढ़ गई थीं.

आईएनएफ संधि के परिणामस्वरूप, अमरीका और सोवियत संघ ने जून 1991 तक 2,692 छोटी, मध्यम और मध्यवर्ती दूरी की मिसाइलों को नष्ट कर दिया था.

आईएनएफ़ का टूटना एसटीएआरटी संधि के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है. साल 2010 में हुई यह संधि लंबी दूरी की रणनीतिक मिसाइलों के लिए सीमा निर्धारित करती है. यह संधि 2021 में खत्म हो रही है.

अगर अमरीका और रूस दोनों तैयार होते हैं तो ये संधि पांच साल के लिए आगे बढ़ाई जा सकती है. लेकिन, कई विश्लेषकों की चिंताएं हैं कि वर्तमान में बिगड़ते राजनीतिक हालात में इस महत्वपूर्ण संधि को खतरा हो सकता है.

क्यों हुआ टकराव?

अमरीका साल 2014 से रूस पर मध्यम दूरी की नोवाटोर 9एम729 मिसाइल बनाकर संधि के उल्लंघन का आरोप लगाता रहा है.

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, रूस के पास संधि को तोड़ने वाली क़रीब 100 मिसाइलें हैं.

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, ''सालों से रूस बिना किसी पछतावे के आईएनएफ संधि की शर्तों को तोड़ता आ रहा है. एक पक्ष के समझौते का पालन न करने की स्थिति में उसमें बने रहना अच्छा नहीं है.''

वहीं, रूस कहता है कि उसकी मिसाइल 500 किमी से कम की रेंज में है और आरोप लगाता है कि अमरीका का पोलैंड और रोमानिया में ज़मीन से मार करने वाला बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम रूस पर हमले के लिए प्रतिबंधित मिसाइलों के इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

जबकी अमरीका का कहना है कि उसका मिसाइल डिफेंस सिस्टम पूरी तरह से आईएनएफ की शर्तों के अनुरूप है.

रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रिएटकोफ ने कहा कि अमरीका का आईएनएफ की संधि से पीछे हटना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है. उन्होंने ये बात माइक पोम्पियो की घोषणा से पहले कही थी.

उन्होंने कहा, ''यह अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण प्रणाली और सामूहिक विनाश के हथियारों के अप्रसार की प्रणाली के लिए एक गंभीर झटका होगा. एक पक्ष का इसे तोड़ना गैरजिम्मेदाराना रवैया होगा.''

नेटो ने अमरीका के दावे का समर्थन किया है और एक बयान जारी कर रूस को पूरी तरह इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.

नेटो ने कहा, ''अगर रूस अपनी 9एमएस729 प्रणाली को नष्ट करके आईएनएफ संधि का सम्मान नहीं करता और अमरीका के संधि से निकलने से पहले पूरी तरह संधि का पालन नहीं करता तो रूस इस संधि के ख़त्म होने के लिए अकेला ज़िम्मेदार होगा.''

सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में 10 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा 124वां संविधान संशोधन विधेयक 9 जनवरी 2019 को राज्यसभा में भी पास हो गया। उच्च सदन में विपक्ष सहित लगभग सभी दलों ने इस विधेयक का समर्थन किया। बिल को लेकर राज्यसभा में हुई वोटिंग के दौरान इसके समर्थन में 165 और खिलाफ में केवल 7 वोट पड़े। इससे पहले बिल को सिलेक्ट कमिटी के पास भेजने के लिए कनिमोझी ने प्रस्ताव रखा था। हालांकि वोटिंग के दौरान इसके पक्ष में 18 और खिलाफ में 155 वोट पड़े। इसके साथ ही बिल को सिलेक्ट कमिटी में भेजने की मांग खारिज हो गई। 

आपको बता दें कि 124वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा ने एक  दिन पहले 8 जनवरी 2019 को ही बहुमत के साथ पारित कर दिया था। सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि इस विधेयक को राज्यों की मंजूरी लेने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में इस विधेयक को मंजूरी के लिए अब सीधे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। कुछ विपक्षी दलों ने इस विधेयक को लोकसभा चुनाव से पहले लाए जाने को लेकर सरकार की मंशा तथा इस विधेयक की न्यायिक समीक्षा में टिक पाने को लेकर आशंका जताई। हालांकि सरकार ने दावा किया कि कानून बनने के बाद यह न्यायिक समीक्षा की अग्निपरीक्षा में भी खरा उतरेगा क्योंकि इसे संविधान संशोधन के जरिए लाया गया है। 

मुख्य तथ्य

1. इसके पूर्व 21 बार प्राइवेट मेंबर बिल लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी सुविधाएँ प्रदान करने की माँग हुईं.

2. मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी.झ् नरसिंह राव सरकार ने 1992 में एक प्रावधान किया था पर संविधान संशोधन नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया.

3. सिन्नो कमीशन (कमीशन टू एग्ज़ामिन सब-कैटेगोराइजेशन ऑफ ओबीसी) ने 2004 से 2010 तक इस बारे में काम किया और 2010 में तत्कालीन सरकार को प्रतिवेदन दिया.

4. मोदी सरकार ने इसी कमिशन की सिफ़ारिश के आधार पर संविधान संशोधन बिल तैयार किया है.

5. प्रस्तावित आरक्षण का कोटा वर्तमान कोटे से अलग होगा. अभी देश में कुल 49.5 फ़ीसदी आरक्षण है. अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी, अनुसूचित जातियों को 15 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.

6. संविधान के आर्टिकल 15 में 15.6 जोड़ा गया है जिसके अनुसार राज्य और भारत सरकार को इस संबंध में कानून बनाने से नहीं रोका जा सकेगा.

7. इसके अनुसार आर्थिक रूप से दुर्बल सामान्य वर्ग को शैक्षणिक संस्थानों में 10 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है.

8. संविधान के 16 आर्टिकल में एक बिंदु जोड़ा जाएगा जिसके अनुसार राज्य सरकार और केंद्र सरकार 10 फ़ीसदी आरक्षण दे सकते हैं.

9. ग़रीब सवर्णों को प्रस्तावित 10 फ़ीसदी आरक्षण मौजूदा 50 फ़ीसदी की सीमा से अलग होगा.

चीन ने चांद के अनदेखे हिस्से पर दुनिया का पहला अंतरिक्ष यान उतारने में सफलता हासिल की है. उसके अनदेखे हिस्से का अध्ययन करने के लिए पहली बार कोई मिशन लांच किया गया है. यह उपलब्धि अंतरिक्ष में सुपरपावर बनने की दिशा में चीन के बढ़ते कदम की गवाह है. चीन के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (सीएनएसए) ने घोषणा की कि यान चांग‘ई-4 ने चंद्रमा की दूसरी ओर की सतह को छुआ. चांद के इस हिस्से को डार्क साइड भी कहा जाता है.चांग‘ई-4 का प्रक्षेपण शिचांग के प्रक्षेपण केंद्र से 08 दिसंबर 2018 को लॉन्ग मार्च 3बी रॉकेट के जरिये किया गया था. चीन को 03 जनवरी को 2019 को सफलता हासिल हुई. ये यान अपने साथ एक रोवर भी लेकर गया है. लो फ्रीक्वेंसी रेडियो एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेशन की मदद से चांद के इस हिस्से के बारे में पता लगाएगा.

चंद्र अभियान चांग‘ई-4 का नाम चीनी पौराणिक कथाओं की चंद्रमा देवी के नाम पर रखा गया है.मिशन के तहत घाटियों का अध्ययन: इस मिशन के तहत वहां की भू-संरचनाओं व घाटियों का अध्ययन किया जाएगा. इसके अतिरिक्त चांद पर मौजूद खनिजों और उसकी सतह की संरचना का भी पता लगाया जाएगा. इस यान के साथ चार विशेष वैज्ञानिक उपकरण भी भेजे गए हैं जिनका इस्तेमाल मिशन के दौरान किया जाएगा.

एक सेटेलाइट भी लांच किया गया: पृथ्वी से ना दिखाई देने के कारण चांद के उस हिस्से से सीधे संचार स्थापित करना लगभग नामुमकिन है. इसी कारण चांग‘ई-4 से संपर्क स्थापित करने के लिए एक सेटेलाइट भी लांच किया गया है. क्यूकिआओ नाम का यह सेटेलाइट मई 2018 में लॉन्घ्च कर दिया गया था.सोवियत संघ ने ली पहली तस्वीरः उल्लेखनीय है कि चंद्रमा का आगे वाला हिस्सा हमेशा धरती के सम्मुख होता है और वहा कई समतल क्षेत्र हैं. इस पर उतरना आसान होता है, लेकिन इसकी दूसरी ओर की सतह का क्षेत्र पहाड़ी और काफी ऊबड़-खाबड़ है.

सोवियत संघ ने वर्ष 1959 में पहली बार चंद्रमा की दूसरी तरफ की सतह की पहली तस्वीर ली थी, लेकिन अभी तक कोई भी चंद्र लैंडर या रोवर चंद्रमा की विमुख सतह पर नहीं उतर सका था.

चीन अकादमी ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी: चीन ने अंतरिक्ष की खोज के लिए चीन अकादमी ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी की स्थापना वर्ष 1968 में की थी. यहां 27 हजार से ज्यादा कर्मचारी हैं. यह अकादमी वल्र्ड क्लास अकादमी में से एक है जो बेहतरीन स्पेसक्राफ्ट बनाती है.चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है. यह सौर मंडल का पाचवाँ,सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है. पृथ्वी के मध्य से चन्द्रमा के मध्य तक कि दूरी 3,84,403 किलोमीटर है. यह दूरी पृथ्वी कि परिधि के 30 गुना है. चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 1/6 है. यह पृथ्वी कि परिक्रमा 27.3 दिन में पूरा करता है और अपने अक्ष के चारों ओर एक पूरा चक्कर भी 27.3 दिन में लगाता है.

चांद की एक ओर अंधेरा क्यों रहता है?

चांद का हमेशा एक ही हिस्सा हमें इसलिए दिखता है, क्योंकि जिस गति से वह पृथ्वी के चक्कर लगाता है, उसी गति से अपनी धुरी पर भी चक्कर लगाता है. यही कारण है कि चांद का एक हिस्सा हमें नहीं दिखाई देता है.

असम में आज नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन जारी कर दिया गया है. नये मसौदे में असम में बसे सभी भारतीय नागरिकों के नाम पते और फोटो हैं. कुल 3.29 करोड़ आवेदन में 2.89 करोड़ लोगों के नाम नेशनल रजिस्टर में शामिल किए जाने के योग्य पाए गए हैं. वहीं 40 लाख लोग वैध नागरिक नहीं पाए गए. हालांकि यह फाइनल लिस्ट नहीं है बल्कि ड्राफ्ट है. जिनका नाम इस ड्राफ्ट में शामिल नहीं है वो इसके लिए दावा कर सकते हैं.   

यह पहला मौका है जब राज्य में अवैध रूप से रहने वाले लोगों के बारे में जानकारी मिल सकेगी. देश में लागू नागरिकता कानून से थोड़े अलग रूप में राज्य में असम समझौता 1985 लागू है. इसके मुताबिक 24 मार्च 1971 की आधी रात तक सूबे में प्रवेश करने वाले लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा.

असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के फाइनल ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों के नाम शामिल न किए जाने पर सड़क से लेकर संसद तक संग्राम मचा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुआई में विपक्षी दल जहां सरकार पर हमलावर हैं, वहीं बीजेपी इसे एक बड़ा कदम बता रही है। मंगलवार को राज्यसभा में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एनआरसी को 1985 में राजीव सरकार द्वारा किए गए असम अकॉर्ड का हिस्सा बताया। शाह के इस बयान पर जबर्दस्त हंगामा हुआ। शाह ने कहा कि 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम अकॉर्ड को डिक्लेयर किया, लेकिन इसके बाद इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटाई जा सकी। आइए आपको बताते हैं कि 1985 में राजीव सरकार द्वारा साइन किए गए असम अकॉर्ड में आखिर था क्या और एनआरसी से इसका क्या कनेक्शन है.

देश में असम ही एक मात्र राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है। असम में सिटिजनशिप रजिस्टर देश में लागू नागरिकता कानून से थोड़ा अलग है। प्रदेश में 1985 से लागू असम समझौते के अनुसार, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक असम में प्रवेश करने वाले लोग और उनकी अगली पीढ़ी को भारतीय नागरिक माना जाएगा। 

बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर राजीव गांधी ने एजीपी से किया था समझौता असम में 1980 में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हावी था। पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद से असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का अवैध प्रवेश चल रहा था। घुसपैठ के मुद्दे ने राज्य की राजनीति में भी जोर पकड़ा और सिटिजनशिप रजिस्टर अपडेट करने को लेकर आंदोलन खड़ा हो गया। इसका इसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम गण परिषद ने किया था। आंदोलन की आंच राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंच गई और 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ। 

राजीव ने अवैध बांग्लादेशियों को बाहर करने का आश्वासन दिया था 
असम गण परिषद और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के बीच असम समझौता हुआ। राजीव गांधी ने अवैध बांग्लादेशियों को प्रदेश से बाहर करने का आश्वासन दिया था। इस समझौते में कहा गया कि 24 मार्च 1971 तक असम में आकर बसे बांग्लादेशियों को नागरिकता दी जाएगी। इस तय समय के बाद आए बाकी लोगों को राज्य से डिपोर्ट किया जाएगा। 

एनआरसी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश 
बाद के सालों में यह मामला लटकता चला गया। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। असम पब्लिक वर्क नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने 2013 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। असम के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और 2018 जुलाई में फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल के लिए रोक लगाई है।

दो सप्ताह तक चलने वाली संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन बिना किसी नतीजों के साथ शुक्रवार को खत्म हो गई। अक्षय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) की तरफ सुचारु ढंग से बढ़ने के मद्देनजर विकसित देशों की ओर से विकासशील देशों को धन देने के मसले पर जलवायु विशेषज्ञों के बीच अभी भी विवाद बना हुआ है।विकासशील देशों के एक प्रतिनिधि वार्ताकार ने बताया, 'बड़ा सवाल है कि पेरिस जलवायु समझौते के तहत धनी देशों की ओर से कितना पैसा गरीब देशों को दिया जाएगा। इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण समय है, कब दिया जाएगा।'उन्होंने बताया कि ये सब मूल प्रश्न हैं जिनको लेकर 197 देशों के वार्ताकार उलझे हुए हैं और सम्मेलन समाप्त होने जा रहा है।

वाशिंगटन स्थित वर्ल्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट के सस्टेनेबल फायनेंस सेंटर में क्लाइमेट फायनेंस एसोसिएट निरंजली मनेल अमेरासिंघे ने बताया, 'विकसित देश पहले ही 2020 तक विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर सालाना देने को सहमत हो चुके थे। यह धन विकासशील देशों को निम्न कार्बन उत्सर्जन प्रौद्योगिकी अपनाने और जलवायु असर के लिए उनको तैयार करने में मदद के लिए देने की बात थी।'भारत समेत विकासशील देशों के लिए 2020 के पहले की जलवायु कार्ययोजना को लेकर एक बड़ी उपलब्धि की बात यह थी कि दुनिया के विकसित देश बाद के दो वर्षो में भी इस विषय पर बातचीत को राजी थे।

भारत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री हर्षवर्धन ने कहा कि विकासशील देशों को वित्तीय मदद, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण सहायता प्रदान करने के प्रावधान संकटपूर्ण हैं।जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में गुरुवार को मंत्रियों की उच्चस्तरीय बैठक में उन्होंने कहा, 'हमें कार्रवाई करने के लिए हमेशा वैज्ञानिक रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है।'उन्होंने कहा कि सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को दो डिग्री सेंटीग्रेड तक सीमित रखने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल के तहत विकसित देशों की ओर से 2020 के पहले अतिरिक्त व प्रारंभिक कार्य-योजना और विकासशील देशों को वित्तीय मदद, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण सहायता प्रदान करने के प्रावधान संकटपूर्ण स्थिति में हैं।भारत सम्मेलन के पहले दिन 6 नवंबर से ही 2020 के पूर्व की जलवायु कार्य-योजना को वार्ता के औपचारिक एजेंडा में शामिल करने की मांग कर रहा था।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय वायुसेना (आईएएफ) ने 3.11.2017 को ओडिशा के चांदीपुर में एकीकृत टेस्ट रेंज में स्वदेशी तौर पर निर्मित हल्के 'ग्लाइड बम' का परीक्षण किया।

स्मार्ट एंटी एयरफील्ड हथियार (SAAW) के रूप में नामित, आईएएफ विमान से जारी बम को सटीक नेविगेशन प्रणाली के माध्यम से मार्गदर्शन किया गया था।
एक आधिकारिक बयान के मुताबिक, 'ग्लैड बम' 70 किमी से अधिक की दूरी पर लक्ष्य तक पहुंच गया, जिसमें उच्च क्षमताएं थीं।

तीन रिसाव की स्थिति और सीमाओं के साथ-साथ तीन परीक्षण-अग्नि का आयोजन किया गया था।

डीआरडीओ के अन्य प्रयोगशालाओं और आईएएफ के सहयोग से डीआरडीओ के रिसर्च सेंटर इमरात (आरसीआई) ने बम विकसित किया है।

सफलता के बाद, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने आईएएफ की टीम और डीआरडीओ के वैज्ञानिकों को बधाई दी।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ। एस क्रिस्टोफर ने पुष्टि की कि सआव को जल्द ही सशस्त्र बलों में शामिल कर लिया जाएगा।
डायरेक्टर जनरल मिसाइल और स्ट्रैटेजिक सिस्टम डीजी (एमएसएस) डा। जी। सतेश रेड्डी ने निर्देशित बम विकसित करने के लिए स्वदेशी क्षमताओं में SAAW को एक प्रमुख मील का पत्थर कहा।

 SAAW लंबी दूरी की सटीक-निर्देशित एंटी-एयरफ़ील्ड हथियार है, जो 100 किमी की सीमा तक उच्च परिशुद्धता के साथ जमीन के लक्ष्य को सक्षम करने के लिए तैयार किया गया है।

साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार साल 2017 के लिए हिन्दी की शीर्षस्थ कथाकार कृष्णा सोबती को प्रदान किया जायेगा. यह पुरस्कार उन्हें साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रदान किया जायेगा. ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने बताया कि प्रो. नामवर सिंह की अध्यक्षता में 3.11.2017 को हुई प्रवर परिषद की बैठक में वर्ष 2017 का 53वां ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर कृष्णा सोबती को देने का निर्णय किया गया. कृष्णा सोबती को 11 लाख रूपये, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा प्रदान की जायेगी.

कृष्णा सोबती को उनके उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ के लिए साल 1980 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. उन्हें 1996 में अकादमी के उच्चतम सम्मान ‘साहित्य अकादमी फैलोशिप’ से नवाजा गया था. इसके अलावा कृष्णा सोबती को पद्मभूषण, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान से भी नवाजा जा चुका है.

कृष्णा सोबती के कालजयी उपन्यासों ‘सूरजमुखी अँधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘हम हशमत’, ‘बादलों के घेरे’ ने कथा साहित्य को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है.

हाल में प्रकाशित ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख’ और ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान’ भी उनके लेखन के उत्कृष्ट उदाहरण है. 18 फरवरी 1924 को गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी सोबती साहसपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती है.

उनके रचनाकर्म में निर्भिकता, खुलापन और भाषागत प्रयोगशीलता स्पष्ट परिलक्षित होती है. 1950 में कहानी ‘लामा’ से साहित्यिक सफर शुरू करने वाली सोबती स्त्री की आजादी और न्याय की पक्षधर है. उन्होंने समय और समाज को केंद्र में रखकर अपनी रचनाओं में एक युग को जिया है.

गौरतलब है कि पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 में मलयालम के लेखक जी शंकर कुरूप को प्रदान किया गया था. सुमित्रानंदन पंत ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले हिन्दी के पहले रचनाकार थे. कृष्णा सोबती ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाली हिन्दी की 11वीं रचनाकार हैं. इससे पहले हिन्दी के 10 लेखकों को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल चुका है. इनमें पंत, दिनकर, अज्ञेय और महादेवी वर्मा शामिल हैं.

भारत वर्ल्ड इकनोमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स पर चीन में 21 स्थानों पर फिसल गया, चीन और बांग्लादेश के पीछे पड़ोसी देशों के पीछे, मुख्य रूप से अर्थव्यवस्था में महिलाओं की कम भागीदारी और कम मजदूरी के कारण। इसके अलावा, भारत की नवीनतम रैंकिंग 2006 के मुकाबले 10 गुणा कम है, जब डब्ल्यूईएफ ने लिंग अंतर को मापना शुरू किया था।

डब्ल्यूईएफ ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2017 के अनुसार, भारत ने अपने लिंग अंतर में 67%, अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के मुकाबले कम, और बांग्लादेश जैसे कुछ पड़ोसी देशों को 47 वां स्थान दिया है जबकि चीन को 100 वें स्थान पर रखा गया है।

विश्व स्तर पर भी, इस साल की कहानी एक उदास एक है डब्ल्यूईएफ ने चार स्तंभों – स्वास्थ्य, शिक्षा, कार्यस्थल और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अंतर को मापने के बाद से पहली बार – वैश्विक अंतराल वास्तव में चौड़ाइ आई है. “वेफ ग्लोबल जेंडर  गैप रिपोर्ट 2006 में पहली बार प्रकाशित होने के बाद पहली बार लैंगिक अंतर को चौड़ा करने के साथ, 2017 में लिंगों के बीच समानता को सुधारने में धीमी लेकिन स्थिर प्रगति के एक दशक का रुख आया।”

आज प्रकाशित इस साल की रिपोर्ट में पाया गया कि वैश्विक लिंग अंतर का कुल 68% बंद हो गया है। 2016 से यह मामूली गिरावट आई जब अंतर बंद हुआ 68.3% था।

प्रगति की वर्तमान दर पर, पिछले वर्ष 83 की तुलना में वैश्विक लिंग अंतर को पुल के लिए 100 साल लगेंगे।

यह मामला कार्यस्थल लिंग भेदभाव के मामले में भी बदतर है, जो रिपोर्ट के अनुमानों को बंद करने के लिए 217 साल लगेगा।

एक सकारात्मक नोट पर, हालांकि, कई देशों ने निराशाजनक वैश्विक रुझानों को आगे बढ़ाया है, इस साल के सभी 144 देशों में से एक से अधिक आधे से ज्यादा लोग पिछले 12 महीनों में अपने स्कोर को सुधारते देखा है।

ग्लोबल के शीर्ष पर, लिंग गैप इंडेक्स आइसलैंड है देश ने अपने अंतराल का लगभग 88% बंद कर दिया है नौ साल तक यह दुनिया का सबसे लिंग-समान देश रहा है।

शीर्ष 10 में नॉर्वे (2), फिनलैंड (3), रवांडा (4) और स्वीडन (5), निकारागुआ (6) और स्लोवेनिया (7), आयरलैंड (8), न्यूजीलैंड (9) और फिलीपींस 10) अन्य शामिल हैं।

भारत की सबसे बड़ी चुनौतियां आर्थिक भागीदारी और अवसर स्तंभ में हैं जहां देश 13 9 के साथ-साथ स्वास्थ्य और अस्तित्व के स्तम्भ के स्थान पर है जहां देश को 141 स्थान पर रखा गया है।

रिपोर्ट ने वैश्विक ग्लोबल ग्लैप गेप इंडेक्स पर राजनीतिक सशक्तिकरण के साथ-साथ स्वस्थ जीवन प्रत्याशा और बुनियादी साक्षरता में लिंग अंतर को चौड़ा करने के लिए भारत की स्थिति में गिरावट का श्रेय दिया।

“1966 में देश की पहली महिला प्रधान मंत्री के उद्घाटन के बाद 50 से अधिक वर्षों तक पारित होने के बाद, राजनीतिक सशक्तिकरण उप-सूचकांक में अपनी वैश्विक शीर्ष 20 रैंकिंग को बनाए रखने से भारत एक नई पीढ़ी महिला राजनीतिक नेतृत्व, “रिपोर्ट ने कहा।

भारत ने विश्वबैंक की कारोबार सुगमता रिपोर्ट रैंकिंग में लंबी छलांग लगायी है. देश की रैंकिंग 30 पायदान सुधरकर 100वें स्थान पर पहुंच गयी. इससे उत्साहित सरकार ने सुधारों को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया जिससे देश आने वाले वर्ष में कारोबार सुगमता के मामले में शीर्ष 50 देशों में शामिल हो सकता है.

नरेंद्र मोदी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के समय भारत की रैंकिंग 142 थी. पिछले साल यह 130 थी. इस साल भारत एकमात्र बड़ा देश है जिसने कराधान, निर्माण परमिट, निवेशक संरक्षण और ऋण शोधन के लिये उठाये गये कदम के दम पर यह बड़ी उपलब्धि हासिल की.

विश्व बैंक ने कहा इस साल के आकलन में यह शीर्ष 10 सुधारकर्ता देशों में एक है. कारोबार सुगमता के 10 संकेतकों में से आठ में सुधारों को क्रियान्वित किया गया. यह पहला मौका है जब भारत इस मामले में पहले 100 देशों में शामिल हुआ है. इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सरकार सुधार, निष्पादन और रूपांतरण के मंत्र के साथ रैंकिंग में और सुधार तथा आर्थिक वृद्धि में तेजी लाने को प्रतिबद्ध है. उन्होंने कारोबार सुगमता में भारत की रैंकिंग में उछाल की सराहना की और कहा कि यह चौतरफा तथा विविध क्षेत्रों में किये गये सुधारों का नतीजा है.

अपनी सालाना रिपोर्ट ‘डूइंग बिजनेस 2018: रिफार्मिंग टू क्रिएट जॉब्स’ में विश्वबैंक ने कहा कि भारत की रैंकिंग 2003 से अपनाये गये 37 सुधारों में से करीब आधे का पिछले चार साल में किये गये क्रियान्वयन को प्रतिबिंबित करता है. हालांकि, व्यापार माहौन के आकलन के लिये जून को आखिरी महीने के रूप में लिया गया है.इससे रैंकिंग में जीएसटी क्रियान्वयन के बाद के कारोबारी माहौल पर गौर नहीं किया गया है. इस नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था से 1.3 अरब की आबादी वाला देश एक कर के साथ एक बाजार में तब्दील हुआ और व्यापार के लिये राज्यों के बीच की बाधाएं दूर हुई है.

भारत पिछले साल 190 देशों की सूची में 130वें स्थान पर था. इस साल के आकलन में यह शीर्ष 10 सुधारकर्ता देशों में एक है. कारोबार सुगमता के 10 संकेतकों में से आठ में सुधारों को क्रियान्वित किया गया. यह पहला मौका है जब भारत इस मामले में पहले 100 देशों में शामिल हुआ है. विश्वबैंक की इस रिपोर्ट से नरेंद्र मोदी सरकार के तरकश में नये तीर आ गये हैं. यह रिपोर्ट ऐसे समय आयी है जब मोदी सरकार जीएसटी और नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था में आयी नरमी को लेकर विपक्ष के निशाने पर है.

हालांकि कंपनी गठित करना, अनुबंधों को लागू करना और निर्माण परमिट के मामले में लेकिन इसके बावजूद भारत कारोबार शुरू करने, अनुबंध के लागू करने तथा निर्माण परमिट के मामले में अब भी पीछे है. नई कंपनी को पंजीकरण कराने में अब भी 30 दिन का समय लगता है जो 15 साल पहले 127 दिन था लेकिन स्थानीय उद्यमियों के लिये प्रक्रियाओं की संख्या जटिल बनी हुई है. उन्हें अब भी 12 प्रक्रियाओं से गुजरने की आवश्यकता होती है.

हालांकि भारत निवेशकों के संरक्षण के मामले में दुनिया में चौथे स्थान (पिछले साल 13वें स्थान) पर आ गया लेकिन बिजली प्राप्त करने के मामले में स्थिति बिगड़ी है और पिछले साल के 26 से 29वें स्थान पर आ गया. कर्ज उपलब्धता रैंकिंग 44 से सुधरकर 29 पर आ गयी. वहीं कर भुगतान सुगमता के मामले में रैंकिंग 172वें से सुधकर 119वें स्थान पर आ गयी.

विश्वबैंक के ‘ग्लोबल इंडिकेटर्स ग्रुप’ के कार्यवाहक निदेशक रीता रमाल्हो ने वाशिंगटन में पीटीआई भाषा से कहा, ‘यह बड़ा उछाल है.’ उन्होंने 30 पायदान के सुधार के लिये मोदी सरकार की अगुवाई में 2014 से किये गये सुधारों को श्रेय दिया. एक जुलाई से लागू माल एवं सेवा कर (जीएसटी) अगले साल की व्यापार सुगमता रिपोर्ट में प्रतिबिंबित होगा. रीता ने कहा, ‘इस साल जीएसटी सुधारों पर गौर नहीं किया गया. इस पर अगले साल की रिपोर्ट में विचार किया जाएगा.’ विश्वबैंक के अनुसार दुनिया में न्यूजीलैंड कारोबार के लिहाज से सबसे बेहतर जगह है. उसके बाद क्रमश: सिंगापुर, डेनमार्क, दक्षिण कोरिया और हांगकांग का स्थान है. अमेरिका तथा ब्रिटेन सूची में क्रमश: छठे और सातवें स्थान पर है.

ब्रिक्स देशों में रूस सूची में अव्वल है और वह 35वें स्थान पर है. उसके बाद चीन का स्थान है जो लगातार दूसरे साल 78वें स्थान पर है. रिपोर्ट लिखने वालों ने कहा कि यह इस साल का सबसे बड़ा आश्चर्य भारत है. उसकी रैंकिंग 30 पायदान सुधरी है. इस संदर्भ में उसका अंक 4.71 बढ़कर 60.76 अंक पहुंच गया.

भारतमाला नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट हैं। इसके तहत नए हाईवे के अलावा उन प्रोजेक्ट्स को भी पूरा किया जाएगा तो अब तक अधूरे हैं। इसमें बॉर्डर और इंटरनेशनल कनेक्टिविटी वाले डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को शामिल किया गया है। पोर्ट्स और रोड, नेशनल कॉरिडोर्स को ज्यादा बेहतर बनाना और नेशनल कॉरिडोर्स को डेपलप करना भी इस प्रोजेक्ट में शामिल है। इसके अलावा बैकवर्ड एरिया, रिलीजियस और टूरिस्ट साइट्स को जोड़ने वालेनेशनल हाइवे बनाए जाएंगे।

भारतमाला परियोजना के तहत भारत सरकार ने 7 फेज में 34,800 किलोमीटर सड़कें बनाने का फैसला लिया है। इसके तहत नेशनल हाईवे, बॉर्डर्स, कोस्टल एरिया को जोड़ा जाएगा। ईस्टर्न और वेस्टर्न बॉर्डर्स पर 3,300 किमी रोड बनाई जाएंगी। लुधियाना-अजमेर और मुंबई-कोचीन के बीच नया नेशनल हाईवे बनाया जाएगा। लुधियाना-अजमेर के प्रपोज्ड हाईवे में दूरी 721 किमी तो हो जाएगी, लेकिन दोनों शहरों के बीच ट्रैवल टाइम घटकर 9 घंटे 15 मिनट हो जाएगा। मौजूदा 627 किमी लंबे हाईवे में अभी 10 घंटे लगते हैं। इसी तरह, प्रपोज्ड मुंबई-कोचीन हाईवे में दूरी 200 किमी बढ़ जाएगी, वक्त करीब 5 घंटे कम हो जाएगा।

कैटिगरी

किलोमीटर

इकोनॉमिक कॉरिडोर
9000
इंटर कॉरिडोर/फीडर रूट
6000
नेशनल कॉरिडोर एफिशिएंसी इम्प्रूवमेंट                              
5000
बॉर्डर रोड/इंटरनेशनल कनेक्टिविटी
2000
कोस्टल रोड/पोर्ट कनेक्टिविटी
2000
ग्रीन फील्ड एक्स्प्रेसवे
800
बैलेंस NHDP वर्क्स
10,000

कितना खर्चा आएगा?

 5.35 लाख करोड़ रुपए खर्च आएगा। इस भारतमाला परियोजना को कैबिनेट ने 24.10.2017 को मंजूरी दी।

पैसा कहां से आएगा?

भारतमाला प्रोजेक्ट के लिए 2.09 लाख करोड़ रुपए मार्केट, 1.06 लाख करोड़ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट और 2.19 लाख करोड़ CRF/TOT/टोल के जरिए आएगा।

लुधियाना-अजमेर, मुंबई-कोचीन के प्रपोज्ड हाईवे में कितना वक्त बचेगा?

मौजूदा लुधियाना-अजमेर नेशनल हाईवे के बीच की दूरी 627 किमी है। इसके लिए अभी 10 घंटे का वक्त लगता है।

भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले हाईवे में दूरी 100 किमी बढ़कर 721 किमी हो जाएगी, लेकिन करीब 45 मिनट की बचत होगी। नए रूट में करीब 9 घंटे 15 मिनट लगेंगे।

मौजूदा मुंबई-कोचीन नेशनल हाईवे के बीच की दूरी 1346 किमी है। अभी इस सफर में 29 घंटे का वक्त लगता है। 

भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले नए रूट के तहत दूरी बढ़कर 1537 किमी हो जाएगी, लेकिन वक्त 5 घंटे कम हो जाएगा। इस सफर को पूरा करने में करीब 24 घंटे का वक्त लगेगा।

बॉर्डर्सऔर कोस्टल एरिया में कितने किमी सड़क बनेंगी?

भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत ईस्टर्न और वेस्टर्न बॉर्डर्स पर 3300 किमी रोड बनाई जाएंगी। पहले फेज में 1000 किमी प्रस्तावित है। टूरिज्म और इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए 2100 किमी की कोस्टल रोड्स बनाई जाएंगी।

पोर्ट कनेक्टिविटी के लिए 2000 किमी की रोड बनाए जाएंंगी। इसे पहले फेज में बनाया जाएगा।

अभी कितने हाईवे हैं?

फिलहाल देश में 82 हाईवे हैं। इसमें 34 हजार करोड़ का इन्वेस्टमेंट किया जाना है। पहले फेज में 9 हाईवे के 680.64 किमी को चुना गया है। इस पर 6,258 करोड़ का खर्च आएगा।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी की संपत्ति में लगातार इजाफा हो रहा है। 38 अरब डॉलर (2.5 लाख करोड़ रुपये) की नेटवर्थ के साथ वो लगातार 10वें साल भारत के सबसे अमीर शख्स बनकर उभरे हैं। दिलचस्प बात यह है कि आर्थिक सुस्ती के दौर में भी टॉप 100 अमीर लोगों की नेटवर्थ (संपत्ति) में 26 फीसद का इजाफा हुआ है। अमीर लोगों का आंकलन करने वाली पत्रिका ने इंडिया रिच लिस्ट 2017 की सूची जारी की है।

इस सूची में मुकेश अंबानी टॉप पर बने हुए हैं। वहीं देश की तीसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर निर्माता कंपनी विप्रो के प्रमुख अजीम प्रेमजी ने दूसरा स्थान हासिल किया है। उनकी कुल नेटवर्थ 19 अरब डॉलर की है। अजीम प्रेमजी ने इस सूची में दो स्थानों की छलांग लगाई है।

नोबेल यानी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक। यह पुरस्कार स्वीडन के अल्फ्रेड नोबेल के नाम पर दिया जाता है, जो वैज्ञानिक, कारोबारी और हथियार निर्माता थे। 1896 में मरने से पहले उन्होंने अपने वसीयत में लिखा कि उनका सारा पैसा नोबेल फाउंडेशन के नाम कर दिया जाए और इन पैसों से नोबेल प्राइज़ दिया जाए। नोबेल के नाम पर करीब साढ़े तीन सौ पेटेंट थे, तो पैसा भी बहुत था। फिर 1901 से नोबेल प्राइज़ दिए जाने शुरू हुए। यह अवॉर्ड मेडिकल साइंस, फिजिक्स, केमेस्ट्री, पीस, लिटरेचर और इकॉनमिक्स के क्षेत्र में सबसे उम्दा काम करने वालों को दिया जाता है। 

नोबेल पुरस्कार हर साल 10 दिसंबर को दिए जाते हैं, क्योंकि इसी दिन अल्फ्रेड नोबेल का देहांत हुआ था। इस साल के नामों की घोषणा हो चुकी है और पुरस्कार समारोह 10 दिसंबर को होगा। 

#1. मेडिकल साइंस 

किसे मिला: अमेरिका के जेम्स पी. एलिसन और जापान के तासुकू होन्जो। 
क्यों मिला: इम्यून चेकपॉइंट थ्योरी के लिए। 

समाज में क्या योगदान: हमारे शरीर में ढेर सारी कोशिकाएं होती हैं। इनमें कैंसर की कोशिकाएं भी होती हैं. हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम इन खराब कोशिकाओं को पहचानकर इन्हें खत्म करने की कोशिश करता है। रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी या सर्जरी से कैंसर वाली कोशिकाएं खत्म की जा सकती हैं। लेकिन, कैंसर फैलाने वाली कोशिकाओं को पकड़ना आसान नहीं होता है। अगर एक बार इलाज के बाद ये दोबारा फैलती हैं, तो और ताकतवर हो जाती हैं। तो इन वैज्ञानिकों ने वह प्रोटीन खोज लिया है, जो कैंसर के दौरान शरीर का इम्यून सिस्टम कमज़ोर करता है। इसका नाम पीडी-1 है। इन वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज के लिए इम्यूनोथेरेपी ईजाद की। इम्यूनोथेरेपी में शरीर का इम्यून सिस्टम कैंसर सेल्स और इस प्रोटीन को निशाना बनाता है। यानी कैंसर के इलाज का एक और विकल्प खुल गया है।

#2. फिजिक्स 

किसे मिला: अमेरिका के ऑर्थर अश्किन, फ्रांस के जेरार्ड मोउरो और कनाडा की डोना स्ट्रिकलैंड 
क्यों मिला: लेज़र फिज़िक्स के क्षेत्र में अपने काम के लिए। 

समाज में क्या योगदान: आपने बल्ब और लेज़र लाइट की रोशनी देखी होगी। बल्ब की रोशनी चारों तरफ फैलती है, जबकि लेज़र बीम सीधी चलती है। आर्थर अश्किन ने ऐसा अविष्कार किया है, जिससे लेज़र बीम के ज़रिए अणुओं और परमाणुओं को पकड़ा जा सकता है। जेरार्ड मोउरो और डोना स्ट्रिकलैंड को संयुक्त रूप से पुरस्कार दिया गया है, जो एक ही मकसद पर काम कर रहे थे। लेज़र बीम के ज़रिए चीज़ों को जलाया भी जा सकता है। इन दोनों वैज्ञानिकों ने चिर्प्ड पल्स एंप्लीफिकेशन का अविष्कार किया, जिससे लेज़र बीम की इंटेसिटी को कम-ज़्यादा किया जा सकता है। मान लीजिए आप प्लास्टिक की बोतल में पानी खौला रहे हैं। तो पहले की तकनीक में वह बोतल जल जाती, लेकिन जेरार्ड और डोना के अविष्कार से अब पानी गर्म हो जाएगा, लेकिन बोतल को नुकसान नहीं होगा। 

#3. केमेस्ट्री 

किसे मिला: अमेरिका की फ्रांसेस अर्नॉल्ड, अमेरिका के जॉर्ज स्मिथ और ब्रिटेन के ग्रेगरी विंटर 
क्यों मिला: डायरेक्टेड इवॉल्यूशन और फेज़ डिस्प्ले के क्षेत्र में नई खोजों के लिए। 

समाज में क्या योगदान: इन तीनों वैज्ञानिकों ने डायरेक्टेड इवॉल्यूशन और फेज़ डिस्प्ले के क्षेत्र में नई खोजें की हैं। इसे समझने के लिए हमें डार्विन के पास जाना होगा। डार्विन की थ्योरीज़ के मुताबिक जीवों में आनुवांशिक तौर पर बदलाव आते रहते हैं, जिससे कई हज़ार सालों में एक नए किस्म के जीव तैयार होते हैं। लेकिन प्राकृतिक रूप से यह प्रक्रिया बहुत लंबी है। इन वैज्ञानिकों ने जो खोजें की हैं, उससे यह प्रॉसेस तेज किया जा सकता है। डायरेक्टेड इवॉल्यूशन के ज़रिए नए एंजाइम बना सकते हैं और फेज़ डिस्प्ले के ज़रिए बेहतर मेडिकल एंटीबॉडी डिवेलप की जा सकती है। इन खोजों का इस्तेमाल इंसानी शरीर के अलावा जैव-ईंधन जैसे ऊर्जा के सस्ते विकल्प और कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए किया जा सकता है। 

#4. पीस (शांति) 

किसे मिला: इराक की नादिया मुराद और अफ्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के डेनिस मुकवेज 
क्यों मिला: नादिया ने यौन हिंसा के खिलाफ मुहिम चलाई। डेनिस ने यौन हिंसा की शिकार महिलाओं का इलाज किया। 

समाज में क्या योगदान: 25 साल की नादिया को आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने अगवा कर लिया था। उनका तीन महीने तक शोषण हुआ। किसी तरह छूटने के बाद उन्होंने बताया कि कैसे IS आतंकी दिन-रात यजीदी लड़कियों का रेप करते थे और मन भरने पर बेच देते थे। उन्होंने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई, जिसे दुनियाभर में सुना गया। 2016 में वह संयुक्त राष्ट्र की गुडविल ऐंबैसडर बनाई गईं। नादिया शांति का नोबेल पाने वाली पहली इराकी नागरिक हैं। 
कॉन्गो के डेनिस मुकवेज को 'डॉक्टर मिरैकल' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी कांगो में यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं के इलाज में बिताई। इनमें से अधिकांश महिलाएं कांगो में लंबे समय तक चले गृहयुद्ध के दौरान यौन हिंसा की शिकार हुई थीं। डेनिस ने न सिर्फ महिलाओं का इलाज किया, बल्कि कोई ऐक्शन न लेने पर कांगो समेत कई देशों की सरकारों की आलोचना भी की। 

#5. इकॉनमिक्स 

किसे मिला: अमेरिकी अर्थशास्त्री (इकॉनमिस्ट) विलियम डी. नॉर्डहॉस और पॉल एम रोमर 
क्यों मिला: जलवायु परिवर्तन पर नई तकनीक की खोज के लिए। 

समाज में क्या योगदान: विलियम और पॉल मैक्रोइकॉनमिक्स से ताल्लुक रखते हैं। दोनों ने प्रकृति और मार्केट इकॉनमी के बीच रिश्ते को विस्तार देने वाले मॉडल बनाए हैं और जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को रोकने के तरीकों पर खोज की है। 21वीं सदी में पूरी दुनिया के सामने ग्लोबल वॉर्मिंग और इकॉनमिक डिवेलपमेंट दो सबसे बड़े सवाल हैं। इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने अपनी थ्योरीज़ में इन अहम सवालों के जवाब दिए हैं कि कैसे दुनिया के देश प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना अपनी आर्थिक वृद्धि को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं। विलियम को जलवायु परिवर्तन इकॉनमिक्स का पितामह कहा जाता है, जबकि पॉल वर्ल्ड बैंक के सीनियर वाइस प्रेज़िडेंट हैं। 

#6. साहित्य (लिटरेचर) 

किसे मिला: किसी को नहीं। 
क्यों नहीं: इस साल किसी को भी साहित्य का नोबेल नहीं दिया जाएगा, क्योंकि नोबेल पुरस्कारों की घोषणा करने वाली 'दि स्वीडिश कमिटी' कई झंझावतों से गुज़री है। इस कमिटी में 18 सदस्य होते हैं। इसकी एक सदस्य कटरीना फ्रॉस्टेनशन के फटॉग्रफर पति जीन क्लोड अनॉर्ल्ट पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा और फिर रेप के जुर्म में दो साल की सज़ा सुनाई गई। इसके अलावा जीन पर आरोप लगा कि उन्होंने सात बार नोबेल विजेताओं के नाम आधिकारिक घोषणा से पहले लीक कर दिए। ज़ाहिर है कि वह अपनी पत्नी की वजह से ऐसा कर पाए। कमिटी के तमाम लोग चाहते थे कि कटरीना को कमिटी से बाहर किया जाए और इसके लिए तीन सदस्यों ने इस्तीफा भी दे दिया। लेकिन, कटरीना ने सदस्यता नहीं छोड़ी। इस पूरे विवाद के दौरान 3 मई को अकैडमी ने फैसला लिया कि वह इस साल साहित्य का नोबेल नहीं देगी, क्योंकि ऐसा करने पर नोबेल की प्रतिष्ठा कम हो जाएगी। 

चलते-चलते: नोबेल के लिए किसी को कैसे चुना जाता है 
- पहले चरण में लोगों से नामांकन मंगाए जाते हैं, फिर नॉमिनेट हुए लोगों पर एक्सपर्ट्स विचार करते हैं। उनकी खासियत और योगदान पर चर्चा होती है। नॉमिनेट हुए शख्स के बारे में उसके देश की सरकार, पूर्व नोबेल विजेताओं और विद्वानों से राय मांगी जाती है। इसके बाद ही किसी का नाम फाइनल होता है। 
- किसी व्यक्ति को उसकी मौत के बाद नोबेल प्राइज़ के लिए नॉमिनेट नहीं किया जा सकता। हां, अगर नॉमिनेशन के बाद मौत हो गई हो, तो पुरस्कार दिया जा सकता है। ऐसा दो बार हो चुका है। 
- अगर किसी कैटेगरी में दो विजेता चुने गए हैं, तो दोनों इनाम की राशि आधी-आधी बांटेंगे। अगर तीन विजेता चुने गए हैं, तो पहले विजेता को आधी रकम मिलेगी, जबकि बाकी दोनों विजेता बची रकम को आधा-आधा बांटेंगे। 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में अब सिर्फ 3000 से भी कम गांव ऐसे बचे हैं जहां बिजली नहीं पहुंची है. लेकिन, सरकार भी मानती है कि देश में चार करोड़ से ज्यादा ऐसे परिवार हैं जिनके पास घरों में बिजली का कनेक्शन नहीं है और वह अंधेरे में जीने को मजबूर हैं. 25.09.2017 को यह ऐलान किया कि अब वह इस स्थिति को बदलने जा रही है. सोमवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती के मौके पर सौभाग्य नाम की योजना की शुरुआत की, जिसका मकसद है हर घर तक बिजली का कनेक्शन पहुंचाना.

इस योजना का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह खुद मिट्टी तेल के दीए में पढ़ चुके हैं और इसलिए इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि जिन घरों में बिजली नहीं पहुंची है वहां जिंदगी कितनी मुश्किल होती है.

उन्होंने कहा कि सौभाग्य योजना से 2018 दिसंबर तक हर घर तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि देश में कोई भी घर अंधेरे में ना रहे. यानी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार इसे एक अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करना चाहेगी.

सौभाग्य योजना के लिए सरकार ने 16,320 करोड़ रुपये का बजट रखा है और हर घर तक बिजली पहुंचाने का 60 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाएगी 10% खर्च राज्य सरकारों को उठाना होगा और 30% बैंकों से लोन लिया जाएगा. इस योजना की खास बात यह है कि लोगों को अपने घर में बिजली कनेक्शन पाने के लिए कोई खर्च नहीं करना होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस योजना के लागू होने के बाद बिजली का कनेक्शन पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के बार बार चक्कर काटने का सिलसिला भी बंद हो जाएगा. क्योंकि सरकार खुद लोगों के घर-घर जाकर बिजली कनेक्शन लगाएगी और उन लोगों की पहचान करेगी जिनके घर बिजली का कनेक्शन अभी तक नहीं है.

प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए मोबाइल ऐप का सहारा लिया जाएगा और लोग बिजली के कनेक्शन के लिए आवेदन देने से लेकर सारी कार्यवाही मोबाइल के जरिए ही पूरी कर सकेंगे. गरीब लोगों के लिए बिजली कनेक्शन पाने की प्रक्रिया पूरी तरह मुफ्त होगी. लेकिन बाकी लोगों को भी इसके लिए सिर्फ ₹500 खर्च करने होंगे और वह भी 10 किश्तों में बिजली बिल के साथ लिया जाएगा.

देश के दूरदराज इलाकों में जहां हर घर में बिजली का कनेक्शन पहुंचाना मुश्किल है वहां सरकार घरों को रोशन करने के लिए सौर ऊर्जा का सहारा लेगी और लोगों को बैटरी, 5 LED लाइट और एक पंखा भी दिया जाएगा.

सौभाग्य योजना से पहले मोदी सरकार ने हर घर तक एलपीजी गैस कनेक्शन पहुंचाने के लिए उज्ज्वला योजना चलाई थी जिसके तहत अब तक तीन करोड़ सिलेंडर के कनेक्शन बांटे जा चुके हैं. उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के चुनाव में BJP को उज्वला योजना का जबरदस्त फायदा मिला.

माना जा रहा है कि सौभाग्य योजना के पीछे पूरी ताकत लगाकर बीजेपी अगले लोकसभा चुनाव में इसे भी अपनी एक बड़ी कामयाबी के रूप में पेश करना चाहेगी.

देश में 40,000 रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर बहस तेज है। इस बीच देश में चकमा और हजोंग शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दे दी गई है। चकमा और हजोंग शरणार्थी भारत में बांग्लादेश के चटगांव के पहाड़ी क्षेत्रों से आए हैं। इन लोगों की जमीनें 1960 के दशक में वहां कर्णाफुली नदी पर बनी कापताई बांध परियोजना में चली गई थीं। इसके अलावा धार्मिक उत्पीड़न का भी इन्हें शिकार होना पड़ा है। चकमा बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, जबकि हजोंग हिंदू हैं।

चकमा लोग बंगाली-असमिया भाषा से मिलती-जुलती भाषा बोलते हैं। हजोंग तिब्बती-बर्मी भाषा बोलते हैं, हालांकि इसे असमिया की तरह ही लिखा जाता है। 

फिलहाल भारत में लगभग 1 लाख चकमा और हजोंग शरणार्थी रह रहे हैं।- वर्ष 1964 में जब ये लोग भारत आए थे, तब करीब 15,000 चकमा थे और 2,000 हजोंग थे।2015 के आंकड़ों के मुताबिक शुरुआती दौर में भारत आए तमाम लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से सिर्फ 5,000 लोग कैंपों में हैं।

2010-11 में गृह मंत्रालय की ओर से किए गए सर्वे के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश के तीन जिलों में इनकी आबादी 53,730 थी। 1987 में 45,000 अन्य चकमा लोगों ने बांग्लादेश से त्रिपुरा में प्रवेश किया था।

1947 में भारत विभाजन के बाद चटगांव को पूर्वी पाकिस्तान को सौंपे जाने के विरोध में चकमा बुद्ध आज भी 'चकमा ब्लैक डे' का आयोजन करते हैं। यही नहीं 1971 में जब बांग्लादेश का गठन हुआ तो वह उसका हिस्सा भी नहीं रहना चाहते थे। स्वायत्ता के लिए उन्होंने शांति वाहिनी के नाम से सशस्त्र संघर्ष भी शुरू किया था। बांग्लादेशी सेना से लड़ते हुए ये लोग लगातार भारत के त्रिपुरा राज्य में प्रवेश करते रहे।

1990 में चकमा लोगों से शेख हसीना सरकार ने शांति वार्ता की थी और उन्हें जनजाति का दर्जा दिया था। हालांकि अब भी चकमा वहां उ त्पीड़न के डर से भारत में ही बने रहना चाहते हैं।

2005 में चुनाव आयोग ने चकमा और हजोंग शरणार्थियों को अरुणाचल प्रदेश की मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया था। अरुणाचल की मतदाता सूचियों में करीब 1,000 से ज्यादा चकमा लोगों के नाम शामिल हैं।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के ग्लोबल ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स (वैश्विक मानव पूंजी सूचकांक) में 130 देशों की लिस्ट में भारत 103वें स्थान पर है। ये रैंक ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, साउथ अफ्रीका) में भी सबसे नीचे है। नॉर्वे इस लिस्ट में टॉप पर है। ये इंडेक्स इस बात का संकेत होता है कि कौन-सा देश अपने लोगों के डेवलपमेंट, उनकी टीचिंग- ट्रेनिंग और टैलेंट के इस्तेमाल में कितना आगे है।

इस बार की लिस्ट में नॉर्वे ने टॉप पर जगह बनाई है और इस देश ने पिछले बार के टॉप पर बरकरार फिनलैंड को इस बार दूसरे स्थान पर धकेल दिया है।

जेनेवा के डब्ल्यूईएफ (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इम्प्लॉयमेंट में जेंडर गैप के मामले में भी भारत दुनिया में सबसे पीछे है। हालांकि फ्यूचर के लिए जरूरी स्किल्स के डेवलपमेंट के मामले में भारत की स्थिति बेहतर है और इस मामले में 130 देशों के बीच इसकी रैंक 65 है। फोरम ने पिछले साल की अपनी रिपोर्ट में भारत को 105वीं रैंक दी थी और कहा था कि यह देश अपनी ह्यूमन कैपिटल की संभावनाओं का सिर्फ 57% ही इस्तेमाल कर पा रहा है। उस लिस्ट में फिनलैंड टॉप पर था। WEF की लिस्ट किसी देश के लोगों की नॉलेज और स्किल के आधार पर तैयार होती है, ये ग्लोबल इकोनॉमिक सिस्टम में उस देश की वैल्यू को बताती है और उसकी ह्यूमन कैपिटल रैंक तय करती है।

WEF के मुताबिक इस साल की लिस्ट में ब्रिक्स देशों में रूस सबसे आगे है। उसे 16वीं रैंक मिली है। चीन को 34वीं, ब्राजील को 77वीं और साउथ अफ्रीका को 87वीं रैंक हासिल हुई है। नई लिस्ट में शामिल साउथ एशिया के देशों में भारत, श्रीलंका और नेपाल से पीछे है, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश से आगे है। ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स में भारत के पीछे रह जाने की रिपोर्ट में कई वजहें बताई गई हैं। मसलन- एजुकेशन की फील्ड में पिछड़ना और ह्यूमन कैपिटल का कम फैलाव होना। WEF के मुताबिक इसका मतलब है कि भारत में अवलेबल स्किल का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने 09.09.2017 को देश की पहली ग्रीन फील्ड स्मार्ट सिटी का भूमि पूजन किया। लगभग 7000 करोड़ रुपये की यह परियोजना दो वर्षों में मूर्त रूप लेगी। उपराष्ट्रपति ने इसके साथ ही स्मार्ट सिटी परिसर में प्रस्तावित 690 करोड़ 71 लाख रुपये की लागत वाले अर्बन सिविक टावर, कंवेंशन सेंटर तथा झारखंड अर्बन प्लानिंग एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (जुपमी) के बिल्डिंग निर्माण की आधारशिला भी रखी।

इस बीच उन्होंने जहां झारखंड अर्बन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड (जुटकोल), रियल इस्टेट रेगुलेटरी अथारिटी (रेरा) और स्मार्ट सिटी की वेबसाइट की लांचिंग की, वहीं स्मार्ट सिटी के मास्टर प्लान का विमोचन भी किया।

रांची स्थिति एचईसी के कोर कैपिटल एरिया में प्रस्तावित स्मार्ट सिटी के भूमि पूजन समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्मार्ट सिटी की स्मार्ट परिकल्पना को धरातल पर उतारने के लिए स्मार्ट लीडर की जरूरत है। ऐसा लीडर जिसमें क्षमता हो, दूरदर्शिता हो, स्पष्टवादिता हो, जनता के प्रति कमिटमेंट हो। हाई-फाई, कोट-टाई, सूट-बूट नहीं चलेगा।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि कि दुनिया आगे बढ़ रही है। फिर हम पीछे क्यों रहें? बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, 24 घंटे बिजली, जलापूर्ति, अच्छी सड़कें, सीवरेज, पार्क, आईटी कनेक्टिविटी, नो व्हीकल जोन, स्मार्ट मीटरिंग, वाटर हार्वेस्टिंग, सौर ऊर्जा, पैदल पथ आदि स्मार्ट सिटी की पहचान हैं।

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत को बड़ी कूटनीतिक जीत मिली है। चीन चाहता था कि भारत इस मंच पर पाक के खिलाफ आतंकवाद का मुद्दा न उठाए, लेकिन ब्रिक्स देशों की ओर से जो घोषणापत्र का मजमून सामने आया है, उसमें आतंकवाद की कड़ी निंदा की गई है। और तो और, पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन की भी कड़ी निंदा की गई है। यह घोषणापत्र अहम है क्योंकि चीन कई बार जैश-ए-मोहम्मद चीफ मसूद अजहर पर यूएन द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने की दिशा में अड़ंगा लगा चुका है। भारत आतंकवाद के मुद्दे पर चीन को साथ जोड़ने में कामयाब हो गया है। 

शायमेन डिक्लेरेशन में लिखा है, 'हम ब्रिक्स देशों समेत पूरी दुनिया में हुए आतंकी हमलों की निंदा करते हैं। हम सभी तरह के आतंकवाद की निंदा करते हैं, चाहे वो कहीं भी घटित हुए हों और उसे किसी ने अंजाम दिया हो। इनके पक्ष में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। हम क्षेत्र में सुरक्षा के हालात और तालिबान, आईएसआईएस, अलकायदा और उसके सहयोगी, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश ए मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और हिज्ब-उत-ताहिर द्वारा फैलाई हिंसा की निंदा करते हैं।' 

घोषणापत्र में लिखा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की जरूरत है। यह काम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक होना चाहिए। इसमें देशों की संप्रभुता का खयाल रखना चाहिए, अंदरूनी मामलों में दखल नहीं दिया जाना चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम एक साथ हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ व्यापक संधि को स्वीकार किए जाने के काम में तेजी लाई जानी चाहिए। कट्टरपंथ रोके जाने का प्रयास होना चाहिए। 

ब्राजील, रूस्, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका ने सभी देशों से अपील की कि वे आतंकवाद से निपटने के लिए एक समग्र रूख अपनाए। आतंकवाद से निपटने के क्रम में चरमपंथ से निपटने और आतंकियों के वित्त पोषण के स्रोतों को अवरूद्ध करने की भी बात की गई।समूह ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति के साथ-साथ तालिबान, आईएसआईएस, अल-कायदा और लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद एवं हक्कानी नेटवर्क समेत इसके सहयोगी संगठनों द्वारा की जाने वाली हिंसा पर चिंता जाहिर की।समूह ने ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, तहरीक-ए-तालिबान और हिज्ब उत-तहरीर जैसे आतंकी संगठनों का भी जिक्र किया।

ब्रिक्स ने कहा कि हम संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से कंप्रीहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेरेरिज्म अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र समझौते को जल्दी ही अंतिम रूप दिए जाने और इसे अंगीकार किए जाने की मांग करते हैं।

भारत ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स सम्मेलन के लिए चीन के शहर श्यामेन में हैं। पीएम ने ब्रिक्स बैठक में बोलते हुए कहा कि सभी देशों में शांति के लिए ब्रिक्स देशों का एकजुट रहना जरूरी है। उन्होंने सम्मेलन में आतंकवाद का भी मुद्दा उठाया। इस पर अन्य सदस्य देशों ने भी चिंता जताई। इससे पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पीएम मोदी का औपचारिक स्वागत किया।

बता दें कि ये ब्रिक्स का 9वां सम्मेलन है। ब्रिक्स में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका देश शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास को आगे ले जाने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच मजबूत भागीदारी का आज आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस ब्लॉक ने सहयोग के लिए एक मजबूत ढांचा विकसित किया है और अनिश्चितता की तरफ बढ़ रही दुनिया में स्थिरता के लिए योगदान दिया है। मोदी ने आंतकवाद का भी मुद्दा उठाया। इस पर ब्रिक्स देशों ने क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति और तालिबान, अल-कायदा, पाकिस्तान आधारित लश्कर-ए-तैयबा एवं जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी समूहों द्वारा की जा रही हिंसा पर चिंता जतायी।

चीन के शियामन शहर में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि व्यापार और अर्थव्यवस्था  ब्रिक्स-ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के बीच सहयोग का आधार हैं। उन्होंने विकासशील देशों की संप्रभु और कॉरपोरेट कंपनियों की वित्तीय आवयश्यकताओं को पूरा करने के लिए ब्रिक्स रेटिंग एजेंसी बनाए जाने का भी आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि नवोन्मेष और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर सदस्य देशों के बीच मजबूत भागीदारी विकास को आगे ले जाने, पारदर्शिता को बढ़ाने और सतत विकास लक्ष्यों का समर्थन करने में मदद कर सकती है। उन्होंने सदस्य देशों के सेंट्रल बैंकों से अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने और समूह तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आकस्मिक विदेशी मुद्रा कोष व्यवस्था के बीच सहयोग को बढ़ावा देने का भी आग्रह किया।मोदी ने स्मार्ट शहरों, नगरीकरण और आपदा प्रबंधन में सहयोग की रफ्तार बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स ने सहयोग, स्थिरता में योगदान तथा अनिश्चितता की दिशा में बढ़ रही दुनिया में विकास के लिए एक मजबूत ढांचा विकसित किया है। हमारे प्रयास आज कृषि, संस्कृति, पर्यावरण, ऊर्जा, खेल तथा सूचना एवं प्रौद्योगिकी जैसे विविध क्षेत्रों से जुड़े हैं। मोदी ने कहा कि गरीबी उन्मूलन और स्वास्थ्य, स्वच्छता, कौशल, खाद्य सुरक्षा, लैंगिक समानता, ऊर्जा तथा शिक्षा सुनश्चित करने के लिए समूह मिशन मोड में है। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम उत्पादकता बढ़ाने वाले कार्यक्रम हैं जो महिलाओं को राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में लाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय शांति और विकास के लिए सभी करें काम- जिनपिंग 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि जिस तरह से दुनिया में परिवर्तन हुए हैं, उसके बाद ब्रिक्स में देशों का सहयोग अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय परिस्थितियों में हमारे मतभेदों के बावजूद हमारे 5 देश डीजीएचपीएनएटी के समान चरण में हैं और समान विकास साझा करते हैं। हमें एक आवाज से बात करनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं विकास से संबंधित मुद्दों के लिए संयुक्त रूप से समाधान पेश करना चाहिए। चीन ने एनडीबी परियोजना तैयार करने के लिए 4 मिलियन अमेरिकन डॉलर का योगदान दिया है ताकि बैंक का संचालन और  और उसका विकसा लंबे समय तक किया जा सके। शी ने कहा  कि दुनिया के अन्य भागों से भी हमें अपने संबंध मधुर बनाने की जरूरत है। उन्होंने  कहा कि ब्रिक्स के हम 5 देश वैश्विक शासन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसलिए हमारे सहयोग के बिना दुनिया की चुनौतियों का समाधान नहीं हो सकता।

पीएसएलवी-सी 39 / आईआरएनएसएस -1 एच का गुरूवार, 31 अगस्त 2017 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र शार, श्रीहरिकोटा से 19:00 बजे प्रमोचन निर्धारित किया गया है ।

ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन वाहन, अपने इकतालसवीं उड़ान (पीएसएलवी-सी39) द्वारा आईआरएनएसएस-1एच भारतीय प्रादेशिक नौसंचालन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) के आठवें उपग्रह को उप- भूतुल्यकाली स्तानांतरण कक्षा (उप-जीटीओ) में प्रमोचन करेगा।

प्रमोचन सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी), शार श्रीहरिकोटा के दूसरे प्रमोचन पैड (एसएलपी) से किया जाएगा। आईआरएनएसएस उपग्रहों के पहले के 6 प्रमोचनों की तरह पीएसएलवी-सी39 “एक्सएल” रूपांतर 6 स्ट्रैपऑन के साथ, जिनमें प्रत्येक में 12 टन प्रनोदक होगा, का उपयोग करेगा।

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य लेखन के लिए दिया जाने वाला प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान अगले हफ्ते कोंकणी साहित्यकार महाबलेश्वर सैल को दिया जाएगा.

के के बिरला फाउंडेशन की ओर से जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि वर्ष 2016 का ‘सरस्वती सम्मान’ आगामी 30 अगस्त को यहां राष्ट्रीय संग्रहालय सभागार में रेल मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा सैल को उनके उपन्यास ‘होथन’ के लिए दिया जाएगा.

74 वर्षीय लेखक ने चार मराठी नाटक और सात कोंकणी उपन्यास लिखे हैं. इसके अलावा उन्होंने मराठी भाषा में पांच लघु कथाएं और एक उपन्यास भी लिखा है. फाउंडेशन के लिए इस पुरस्कार में 15 लाख रुपये का नकद और एक प्रशस्ति पत्र दिया जाता है. पहला सरस्वती सम्मान 1991 में हरिवंश राय बच्चन को उनकी आत्मकथा के लिए प्रदान किया गया था.

प्रधानमंत्री देउबा पांच दिवसीय भारत यात्रा पर 23.08.2017 को नई दिल्ली पहुंचे। जून में पदभार संभालने के बाद यह उनका पहला विदेशी दौरा है। 24.08.2017 को  भारत और नेपाल के बीच विभिन्न क्षेत्रों में आठ समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से चार नेपाल में भूकंप के बाद पुनर्निर्माण से संबंधित हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने नरेंद्र मोदी और शेर बहादुर देउबा नेतृत्व में हुई प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद ट्वीट कर कहा, "सहयोग के नए तंत्रों की स्थापना। भारत और नेपाल के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए समझौते।"

भारत ने नेपाल में अप्रैल 2015 को आए भूकंप के बाद पुनर्निर्माण कार्यो के लिए एक अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई थी। नेपाल में 50,000 घरों के पुनर्निर्माण में मदद के लिए आवास अनुदान, शिक्षा, सांस्कृतिक विरासत और स्वास्थ्य क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच चार समझौता ज्ञापन (एमओयू) हुए।

एक अन्य एमओयू भारत के अनुदान से एशियाई विकास बैंक के दक्षिण एशिया उपक्षेत्रीय आर्थिक सहयोग (एसएएसईसी) सड़क संपर्क कार्यक्रम के तहत मेची पुल के निर्माण के लिए लागत साझा करने और सुरक्षा मुद्दों के क्रियान्वयन को लेकर हुआ।

छठा एमओयू नशाखोरी रोकथाम के तहत नार्कोटिक्स ड्रग्स, साइकोट्रॉपिक पदार्थो व अन्य रासायनिक पदार्थो की तस्करी रोकने को लेकर हुए।

सातवां एमओयू इंस्टीटयूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया और इंस्टीटयूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ नेपाल के बीच सहयोग को लेकर हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने बड़े फैसले में नागरिक के निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। इसके साथ ही निजता अब मौलिक अधिकारों में शामिल हो गया है। कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व जज केएस पुट्टस्वामी ने सन् 2012 में 'आधार' को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. इस मामले समेत 21 पिटीशंस पर सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने फ़ैसला देते हुए कहा है कि प्राइवेसी या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है.

संविधान के भाग-3 में मौलिक अधिकार के प्रावधान हैं, जिन्हें डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान की आत्मा बताया था. अनुच्छेद-21 में जीवन तथा स्वतन्त्रता का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने अनेक मामलों में निर्णय देकर शिक्षा, स्वास्थ्य, जल्द न्याय, अच्छे पर्यावरण आदि को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है. संविधान के अनुच्छेद-141 के तहत सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला देश का क़ानून माना जाता है, और अब प्राइवेसी भी मौलिक अधिकार का हिस्सा बन गई है. मौलिक अधिकार होने के बाद कोई भी व्यक्ति हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में सीधे याचिका दायर करके न्याय की मांग कर सकता है.

सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दिया कि प्राइवेसी कॉमन लॉ के तहत कानून तो है पर इसे मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं दिया जा सकता. इस बारे में सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के पुराने दो फैसलों खड़क सिंह (1954) और एमपी शर्मा (1962) की जोरदार दलील दी गई थी. पिटीशनर्स के अनुसार संविधान में जनता सर्वोपरि है तो फिर प्राइवेसी को मौलिक अधिकार क्यों नहीं माना जाना चाहिए? पिटीशंस ने अमेरिका में प्राइवेसी के बारे में चौथे अमेंडमेंट समेत कई अन्य दलीलें रखीं. सुप्रीम कोर्ट ने पिटीशनर्स की तरफ से पेश दलीलों को मानते हुए प्राइवेसी को मौलिक अधिकार मान लिया है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले लगाई रोक के बावजूद सरकार द्वारा 'आधार' को 92 कल्याणकारी योजनाओं में अनिवार्य बना दिया गया था. 'आधार' के तहत लोगों को निजी सूचनाओं के साथ बायोमैट्रिक्स यानि फेस डिटेल्स, अंगुलियों के निशान और आंखों की पुतलियों के निशान देने पड़ते हैं. 'आधार' को इनकम टैक्स समेत कई अन्य जगहों पर जरूरी कर दिया गया है. 'आधार' की अनिवार्यता और बायोमैट्रिक्स के सरकारी डेटाबेस को प्राइवेसी के ख़िलाफ़ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन फ़ाइल हुई थी. इस मामले में पहले तीन जजों की बेंच में और फिर पांच जजों की बेंच ने सुनवाई की. खड़कसिंह मामले में 8 जजों की बेंच ने फ़ैसला दिया था इसलिए प्राइवेसी के मामले पर फ़ैसले के लिए नौ जजों की बेंच बनाई गई. संविधान पीठ के इस फ़ैसले के बाद अब पांच जजों की बेंच 'आधार' मामले पर सुनवाई करेगी.

आधार के अलावा सुप्रीम कोर्ट में व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पालिसी को चुनौती दी गई थी. प्राइवेसी पर संविधान पीठ के फैसले के बाद व्हाट्सऐप मामले पर पांच जजों की बेंच सुनवाई करेगी. सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान जस्टिस चन्द्रचूड़ ने डिजिटल कम्पनियों द्वारा डेटा कलेक्शन पर चिंता जताई थी. फ़ैसले में जस्टिस सप्रे ने डिजिटल कम्पनियों द्वारा डेटा ट्रान्सफर और प्राइवेसी के उल्लघंन पर चिंता जताई. फ़ैसले में लिखा गया है कि उबर कम्पनी बगैर टैक्सी के, फ़ेसबुक बगैर कंटेन्ट के और अलीबाबा बगैर सामान के ही विश्व की बड़ी कम्पनी बन गई हैं. केएन गोविन्दाचार्य ने सन् 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट में डिजिटल कम्पनियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े करते हुए इन कम्पनियों के ऑफ़िस और सर्वर्स भारत में स्थापित करने की मांग की थी.

सुप्रीम कोर्ट में प्राइवेसी पर सुनवाई के दौरान सरकार ने पूर्व जज श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में डेटा प्रोटेक्शन पर क़ानून बनाने के लिए समिति का गठन कर दिया था. तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला उसी दिन से लागू हो गया. प्राइवेसी पर नौ जजों ने सहमति से ऐतिहासिक फ़ैसला दिया है, जिसे तुरंत प्रभाव से सरकार को लागू करना पड़ेगा. इस फ़ैसले के बाद सरकार को इंटरनेट और मोबाइल कम्पनी द्वारा डेटा के गैर-क़ानूनी कारोबार पर रोक लगानी होगी, जिससे डिजिटल इंडिया के विस्तार पर सवालिया निशान खड़े हो सकते हैं.

फैसले के बाद सरकार के सामने चुनौतियाँ

इस फ़ैसले के बाद सरकार को आधार कानून में बदलाव करने के साथ डेटा प्रोटेक्शन पर जल्द ही क़ानून बनाना होगा. डिजिटल इंडिया के व्यापक दौर में दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) अपनी भूमिका के निर्वहन में विफल रही है. प्राइवेसी के क़ानून को लागू करने के लिए सरकार को प्रभावी रेगुलेटरी व्यवस्था बनाना होगा. इस फ़ैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में पिटीशन्स और पीआईएल का दौर आया तो अदालतों में मुकदमों का बोझ और बढ़ जायेगा.

क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदल सकती है ?

शाहबानो मामले में राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदल दिया था. राज्यसभा में बहुमत नहीं होने से सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को शायद ही बदल पाए. 1973 में केशवानंद भारती मामले में 13 जजों की बेंच ने ये फ़ैसला दिया था कि संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव करने के लिए संसद क़ानून नहीं बना सकती. इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा पारित न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को अक्टूबर-2015 में निरस्त कर दिया था. प्राइवेसी अब मौलिक अधिकार है जिसे संसद के क़ानून द्वारा अब बदलना मुश्किल है.

सरकार की तरफ़ से सुप्रीम कोर्ट में यह कहा गया कि विकासशील देश में जनता की भलाई के लिए कुछ अभिजात्य लोगों की प्राइवेसी को देशहित में दर-किनार किया जा सकता है पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से देश के सभी 127 करोड़ लोगों को फ़ायदा हुआ है. 

शहरीकरण एक ख़ास समय में ग्रामीण बस्तियों से शहरी बस्तियों में बसने की प्रक्रिया है जहां 70 प्रतिशत लोग दोयम अथवा तीसरे दर्ज (सेवाएं) की श्रेणी वाले क्षेत्रों में निवास करते हैं. शहरों को समावेशी आर्थिक विकास का इंजन’ माना जाता है. शहरी क्षेत्रों में सांविधिक क्षेत्र’ (नगर निगमनगरपालिकाछावनी बोर्ड या अधिसूचित क्षेत्र समिति)और न्यूनतम 5000 की जनसंख्या तथा ग़ैर कृषि गतिविधियों में संलग्न 75 प्रतिशत मुख्य पुरुष कामगारों तथा प्रति कि.मी. न्यूनतम 400 व्यक्तियों की जनसंख्या घनत्व के मानदंड के साथ जनगणना कस्बे’ दोनों सम्मिलित होते हैं. भारत की जनगणना 2011 के अनुसारहमारी शहरी जनसंख्या 37.7 करोड़ (31.16 %) है. इस तरह 1901-2011 के दौरानभारत की शहरी जनसंख्या में 20 प्रतिशत बिंदुओं से अधिक की वृद्धि हुई है.

ऐतिहासिक रूप से, 1901 के बाद जब भारत की शहरी जनसंख्या कुल जनसंख्या का मात्र 10.8 प्रतिशत थीइसमें लगभग तीन गुणा बढ़ोतरी हुई है.

यद्यपिविश्व बैंक और जनसंख्या डाटा के अनुसार शहरी जनसंख्या का यह अनुपात कई विकासशील और विकसित देशों की अपेक्षा बहुत ही कम है.

उदाहणार्थ-जापान(91.16%)ब्राजील(84.6%)ब्रिटेन(81.6%)जर्मनी(74.5%)रूस(73.77%) और चीन(50.6%). भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में मुंबईदिल्लीकोलकाताचेन्नैबंगलुरूहैदराबादअहमदाबादपुणेसूरत और जयपुर दस बड़े शहर हैं. 2001-2011 में दिल्ली में 35 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (आगरा और विशाखापत्तनम को एक साथ जोडक़रइनके बराबर)बंगुलरू में 28 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (कानपुर के बराबर)चेन्नै में 20 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (पटना के बराबर)मुंबई में 20 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (कोझीकोड के बराबर)हैदराबाद में 19 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (त्रिशूर के बराबर)सूरत में 18 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (वडोदरा के बराबर)अहमदाबाद में 14 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (वाराणसी के बराबर)पुणे में 13 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (श्रीनगर के बराबर)कोलकाता में 8 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (वारंगल के बराबर)और जयपुर में 7 लाख अतिरिक्त जनसंख्या जुड़ी (देहरादून के बराबर). 2030 तक भारत की शहरी आबादी 40.7% हो जायेगी.

शहरों में जनसंख्या में वृद्धि तीन कारणों से है: पहलाअसीमित संख्या में उच्चतर जन्म दरदूसरा मृत्यु दर में कमी और तीसरा गांवों से (ग्रामीण से शहरी विस्थापन) अथवा छोटे कस्बों (कस्बों से शहरों में) से शहरों की तरफ विस्थापन. वास्तव मेंकिसी शहर विशेष में एक अवधि के लिये जनसंख्या में स्थिरता के पीछेमहिलाओं की अधिक और बेहतर शिक्षाछोटे परिवार के आदर्श का प्रसारपरिवारों के बीच अधिक मनोरंजन सुविधाओं का होनाबड़े आकार के परिवारों को संभालने में आर्थिकविशेष और सामाजिक कठिनाइयांबार-बार गर्भधारण करने से उत्पन्न होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरों के बारे में जागरूकता के कारण अपेक्षाकृत कुल प्रजनन दर में कमी के कारण प्रति वर्ष जन्म दर में गिरावट आई है. यद्यपि एक शहर में होने वाले कुल जन्मों का विकास पर प्रभाव होता हैलेकिन शहरों के आकार में वृद्धि के पीछे सामान्यत: उच्च जन्म दर ही नहीं है.

इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाएंविशेषकर प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से बेहतर रूप में उपलब्ध हैंअत: प्रति हजार जन्मों पर पांच बच्चों की मृत्यु दर और प्रति लाख जन्मों पर मातृत्व मृत्यु दर ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में कम है. तदनुसार जनसंख्या में मामूली वृद्धि है परंतु यह भी कम जन्म दर के द्वारा संतुलित है. लेकिन विस्थापन (ग्रामीण और अन्य शहरी क्षेत्रोंदोनों से) शहरों में जनसंख्या वृद्धि में बहुत बड़ा योगदान करता है. विस्थापन सामान्यत: खिंचाव’ एवं दबाव’ दोनों कारणों से होता है. शहरों के खिंचाव कारकों में मुख्यत: संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में अधिक नये और बेहतर आजीविका अवसर (सार्वजनिक और निजी) होनाबच्चों की स्कूली और उच्चतर शिक्षा दोनों के लिये अधिक और बेहतर अवसर होनाअधिक और बेहतर आवासीय सुविधाएंबेहतर सांस्कृतिक और मनोरंजन सुविधाएं (सिनेमाक्लबथिएटर)अधिक सरकारी कार्यालय और सार्वजनिक उपयोगिताएंनिजी क्षेत्र का विकासविभिन्न प्रकार से भिन्न-2 स्तरों पर राजनीतिक भागीदारी के लिये अधिक अवसर प्रदान करने के लिये राजनीतिक मामलों का हबस्वास्थ्य और साफ-सफाई के लिये अधिक और बेहतर सुविधाएंअभिव्यक्ति और भागीदारी के लिये अवसर प्रदान करने हेतु अधिक जनसंचार स्रोतयुवाओं को अधिक आज़ादीअधिक और बेहतर परिवहन और संचार सुविधाएं आदि शामिल होती हैं.

यही कारण है कि दस लाख से अधिक जनसंख्या वाले मेट्रो शहरों की संख्या 1901 में 1 (कलकत्ता) से बढक़र 2011 के दौरान 52 हो गई-1951 में यह संख्या 5, 1961 में 7, 1971 में 9, 1981 में 12, 1991 में 24, 2001 में 39 और 2011 में 52 हो गई. अब महाराष्ट्र में 6 शहरकेरल और उत्तर प्रदेश में प्रत्येक में 7, मध्य प्रदेशगुजरात और तमिलनाडु में प्रत्येक में 4, झारखंडराजस्थान और आंध्र प्रदेश में प्रत्येक में 3, पश्चिम बंगालछत्तीसगढ़ और पंजाब में प्रत्येक में 2, और दिल्लीजम्मू एवं कश्मीरहरियाणाबिहार और कर्नाटक में प्रत्येक में 1 में दस लाख से अधिक जनसंख्या (2011) है. भारत में सबसे तेज़ी से विकसित हो रहे दस शहर हैं - गाजिय़ाबाद (23.8 लाख जनसंख्या)दुर्ग-भिलाईनगर (10.6), वसाई-विरार (12.2), फरीदाबाद (14.1), मलापुरम (17), कन्नूर (16.4), सूरत (45.9), भोपाल (18.9), औरंगाबाद (महाराष्ट्र 11.9) और धनबाद (12) - वार्षिक वृद्धि दर 4.8 प्रतिशत (धनबाद) से 6.9 प्रतिशत (गाजिय़ाबाद) है.

दूसरी तरफ मुख्यत: गांवों में दबाव’ के कारक हैं: आजीविका के अवसरों का अभाव (कृषि में रोजग़ार के अवसरों की कमी अथवा प्रच्छन्न बेरोजगारी’ (जैसा कि गुन्नार मिरडल ने इसे संज्ञा दी)शैक्षणिक और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभावपरिवहन और संचार सुविधाओं का अभावअनावश्यक बंधन और रूढि़वादी रीति रिवाजविशेषकर महिलाओंनिचले तबकों और समुदायों के मामले में. पिछले पांच-छह दशकों में यह प्रवृत्ति भी रही है कि गांवों में उग्रवाद और नक्सलवाद की समस्या के कारण बहुत से परिवार उसी राज्य में अथवा अन्य विकसित राज्य/अथवा राष्ट्रीय राजधानी में सामूहिक रूप से शहरी केंद्रों में विस्थापित हो गये.

शहरीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

शहरीकरण को भारतीय अर्थव्यवस्था के उचित संदर्भ में भी देखा जाना चाहिये. भारत चीन (138 करोड़ जनसंख्या) के बाद जनसंख्या के हिसाब से दुनिया में जनसंख्या की दृष्टि से (विश्व जनसंख्या में 17.5 प्रतिशत हिस्सेदारी) दूसरा सबसे बड़ा देश है (2011 की जनगणना के अनुसार 121 करोड़ लोगअब 2016 में करीब 130 करोड़ होने का अनुमान). विश्व अर्थव्यवस्था में चीन (विश्व अर्थव्यवस्था में 17.4 प्रतिशत की हिस्सेदारी) और अमरीका (विश्व अर्थव्यवस्था में 15.4 प्रतिशत की हिस्सेदारी) के बाद भारत (विश्व अर्थव्यवस्था में 7.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी) तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.

प्रति व्यक्ति जीडीपी की दृष्टि सेअमरीका के 57.2 हजार डॉलरआस्ट्रेलिया के 48.2 हजार डॉलरजर्मनी के 47.5 डॉलरकनाडा के 46.2 हजार डॉलरब्रिटेन के 42 हजार डॉलरफ्रांस के 41.9 हजार डॉलरसऊदी अरब के 53.7 हजार डॉलरजापान के 38.7 हजार डॉलरदक्षिण कोरिया के 37.7 हजार डॉलरइटली के 36.2 हजार डॉलररूस के 25.2 हजार डॉलरमैक्सिको के 17.9 हजार डॉलरब्राजील के 15.2 हजार डॉलरचीन के 15.1 हजार डॉलरदक्षिण अफ्रीका के 13.2 हजार डॉलरइंडोनेशिया के 11.6 हजार डॉलर के मुकाबले भारत के केवल 6.6 हजार डॉलर (पीपीपी) हैं.

इस प्रकार मानव विकास सूचकांक एचडीआई रैंकिंग (2014) में भारत 130वें स्थान पर है-न केवल जी-20 देशों और ब्रिक्स में सबसे निचले स्थान पर बल्कि दुनिया के किसी भी विकासशील देश से नीचे है. भारतीय अर्थव्यवस्था प्रति वर्ष 7 प्रतिशत की दर से तेज़ी से बढ़ रही है परंतु लेबर ब्यूरो डाटा (2016) के अनुसार गैर कृषि अर्थव्यवस्था के 8 प्रमुख क्षेत्रों के आधार पर रोजग़ार में वृद्धि मात्र 1.1 प्रतिशत वार्षिक की है. इस तरह बेरोजग़ारी दर में 2011 में 3.8 प्रतिशत से वृद्धि होकर 2015 में प्रतिशत हो गई. 2016 में कुल सृजित रोजग़ार शिक्षा में 50 लाख (कम मज़दूरी)व्यापार में 14.5 लाखस्वास्थ्य में 12.1 लाख (कम मज़दूरी)आईटी/बीपीओ में 10.4लाखआवास/रेस्तरां में 7.7 लाखपरिवहन में 5.8 लाख और निर्माण क्षेत्र में 3.7 लाख था. परंतु आईटी में तेज़ी को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हैविशेषकर वैश्विक मंदीवीजा प्रतिबंध और घरेलू आईटी सेक्टर में कटौतियों के कारण ऐसा हो रहा है. इसने शहरी मध्यमवर्गीय घरों को कई तरीकों से प्रभावित किया है.

शहरीकरण की समस्याएं:

यदि हम परिवहन और इसके प्रभावों की स्थिति पर नजऱ डालेंहम पाते हैं कि दिल्ली में सर्वाधिक संख्या में पंजीकृत वाहन हैं (25 मई, 2017 को 1.05 करोड़ से अधिक)जिनमें से 66.49 लाख मोटर साइकिल/स्कूटर, 31.73 लाख कारें और 7.46 लाख अन्य वाहन हैं. (2.25 लाख माल ढुलाई वाहनों सहित). ऐसे वाहनों के कारण बड़े उच्च स्तर का ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण होता है. दिल्ली को विश्व श्रव्य सूचकांक ने केवल ध्वनि प्रदूषण के आधार पर दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा ध्वनि प्रदूषण वाले शहर का स्थान दिया है परंतु इसे सर्वाधिक शोर और अधिकतम श्रव्य हानि की दृष्टि से विश्व में दूसरे स्थान पर रखा गया है-गौंगझोऊ (चीन) पहले स्थान पर है. दिल्ली को दुनिया में उन 50 शहरों में पहले स्थान पर रखा गया हैजहां पर श्रव्य सर्वाधिक निम्नीकृत है (सभी कारणों सेध्वनि प्रदूषण सहित). दिल्ली मेंकिसी व्यक्ति में श्रव्य क्षमता कम से कम बीस वर्ष आयु के किसी व्यक्ति के समान है-अर्थात उस आयु में 20 प्रतिशत कम की क्षमता होती है. शहरी ध्वनि प्रदूषण और श्रव्य हानि के बीच निकट का सकारात्मक संबंध है-(64 प्रतिशत). अधिक स्पष्ट रूप में भारत में दिल्ली जैसे बड़े शहरी क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत सडक़ यातायातविमानट्रेनेंनिर्माण गतिविधियां और उद्योग हैं.

यदि हम वायु प्रदूषण पर नजऱ डालेंकई भारतीय शहरों में स्थिति फिर गंभीर है. वैश्विक वायु 2017 रिपोर्ट की स्थिति के अनुसारसंपूर्ण दुनिया में महीन कणों (पीएम 2.5) का दीर्घावधि प्रभाव 2015 में 42 लाख समयपूर्व मृत्यु का कारण बना जिसमें से भारत और चीन को एक साथ जोडक़र इसमें 52 प्रतिशत की हिस्सेदारी थीयानी चीन में ऐसी मौतें 11.08 लाखभारत में 10.90 लाखयूरोपीय संघ में 2.57 लाखरूस में 1.37 लाखपाकिस्तान में 1.35 लाखबंगलादेश में 1.22 लाख और अमरीका में 88400 लाख मौतें हुईं. 1990 से लेकर पीएम 2.5 से संबंधित समय पूर्व मौतों में चीन में 17.22 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि में भारत में यह वृद्धि 48 प्रतिशत हुई.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट (अगस्त, 2016) के अनुसार, 2015 में 10 लाख से अधिक की आबादी वाले 41 भारतीय मेट्रो शहरों को कुल निगरानी दिवसों के 60 प्रतिशत में खराब वायु गुणवत्ता का सामना करना पड़ा. 24 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में 168 शहरों में ग्रीन पीस रिपोर्ट एअरपोकैलीप्स’’ अध्ययन से पता चला है कि दक्षिण भारत में कुछ शहरों को छोडक़रज्यादातर भारतीय शहर विश्व स्वास्थ्य संगठन अथवा राष्ट्रीय व्यापक वायु गुणवत्ता मानदंडों का पालन नहीं करते हैं. 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (पीएम10) की मानक सीमा के बदले भारत में 20 सबसे बड़े शहरों में 268 और 168 (2015) के बीच बहुत अधिक पीएम 10स्तर रखते हैं - दिल्ली का स्थान पहला है (268 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर)तदुपरांत गाजियाबाद (258), इलाहाबाद (250), बरेली (240), फरीदाबाद (240), झरिया (228), अलवर (227), रांची (216), कुसुंडाझारखंड (214), बस्ताकोलाझारखंड (216), कानपुर (205) और पटना (200) का स्थान आता है. वायु प्रदूषण विशेष तौर पर युवा और बुजुर्गों में श्वासहृदय और रक्तचाप जैसी समस्याओं का मुख्य कारण बनता है.

ज्यादातर भारतीय शहरों में वाहनों से निकलने वाला धुआंखुली निर्माण सामग्रियोंकचड़े को जलानेपराली (फसल के अवशेष)विशेषकर पंजाबहरियाणा और पश्चिमी उ.प्र. में जलाने के कारण होने वाले धुएंईंट भट्ठों से निकलने वाली राखपुराने भवनों को गिराये जानेथर्मल संयंत्रों से होने वाले उच्च उत्सर्जनकोयला जलनेकुछेक क्षेत्रों में ईंधन लकड़ी के इस्तेमाल आदि के कारण वायु प्रदूषण होता है. दिल्ली में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन का वायु प्रदूषण में 40 प्रतिशत से अधिक योगदान है. 2000-2016 के दौरान दिल्ली में वाहनों में स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल बढऩे और थर्मल संयंत्रों के बंद होने से सल्फर डाईऑक्साइड (एसओ2) 15 माइक्रोग्राम से कम होकर 7 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गया परंतु दूसरी तरफ इसी अवधि के दौरान नाइट्रोजन डाईआक्साइड (एनओ2) का स्तर 36 माइक्रोग्राम से 65 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गया. डीजल वाहनों की संख्या में वृद्धि के कारण-दिल्ली में बिकने वाली कारों 2000 में डीजल इंजन वाली कारों की संख्या 10 प्रतिशत से कम थी परंतु अब 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है-एनओ2 में वृद्धि हुई है. अत: डीजल से पेट्रोल और सीएनजी में तबदीली की आवश्यकता है. इसके अलावा एनओ2 को कम करने के लिये कचड़े और जैविक ईंधन के जलाये जाने को बंद करना होगा

वायु में एनओ2 का स्तर बढऩे के कारण ओजोन प्रदूषण बुरी तरह होता है. बीएस- ढ्ढढ्ढ में सल्फर की मात्रा 500 पीपीएम थी जबकि बीएस-ढ्ढढ्ढढ्ढ में यह 100पीपीएम और बीएस-ढ्ढङ्क में यह मात्र 50 पीपीएम है.

हम हर साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस वास्तविक कार्य सूची से अधिक बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं. क्षेत्रोंराष्ट्रों और उप राष्ट्रों के बीच पानी का विषम वितरण है. उदाहरण के लिये एशिया में दुनिया की 60 प्रतिशत जनसंख्या है परंतु इसमें केवल वैश्विक प्रवाह 36 प्रतिशत है जबकि दक्षिण अमरीका में विश्व की मात्र 6 प्रतिशत जनसंख्या है परंतु वहां 26 प्रतिशत वैश्विक प्रवाह है. इसी तरह भारत में विश्व जनसंख्या का 17.5 प्रतिशत है परंतु केवल 4 प्रतिशत विश्व का ताज़ा जल इसे प्राप्त होता है. सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों में से एक 2015 तक सुरक्षित पेयजल की पहुंच से वंचित लोगों में आधी संख्या को कम करना था परंतु हम इस प्रमुख लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए.

शहरी भारत मेंहम विभिन्न शहरों में भिन्न भिन्न प्रकार से और समानुपात में पानी की कमी का सामना करते हैंउदाहरण के लिये राजस्थान में दस कस्बों में तीन दिनों में से केवल एक दिन पानी की आपूर्ति की जाती है. इसके अलावा भारत में 35 शहरों में करीब एक करोड़ लोगों को पूर्व की सामान्य आपूर्ति की अपेक्षा 38प्रतिशत कम पानी की आपूर्ति की जाती है. 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समयदिल्ली में करीब 800 तालाब/झीलें थीं परंतु इनमें से ज्यादातर का अतिक्रमण कर लिया गया है और भवनों के निर्माणसमतल क्षेत्रोंसडक़ों और अन्य सार्वजनिक उपयोगिताओं के लिये उनकी प्रकृति को बदल दिया गया. इसके अलावा चार मेट्रो शहरों (कोलकातादिल्लीचेन्नै और मुंबई) में रोज़ाना 90 करोड़ लीटर गंदा पानी नदियों में बहा दिया जाता है परंतु केवल 30 प्रतिशत को शोधन किया जाता है. देश के अन्य शहरोंविशेषकर कानपुरइलाहाबादवाराणसीलखनऊपटनाभागलपुर आदि के मामले में भी ऐसा ही है.

भारत के पास 433 अरब क्यूबिक मीटर भूजल है और भारत में ग्रामीण तथा शहरी घरेलू जल की 80 प्रतिशतता से अधिक जरूरत भूजल से पूरी होती है. परंतु भारत की प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में तेज़ी से गिरावट हुई है-1947 में 6042 क्यूबिक मीटर से 2011 में 1545 मीटर क्यूबिक-और इसमें आगे गिरावट होकर 2015 में 1340 क्यूबिक मीटर और 2050 में 1140 क्यूबिक मीटर हो जाने की आशा है. दूसरी तरफ भारत केवल कुल वर्षा जल का केवल 20 प्रतिशत संरक्षित करता है जबकि इस्राइल वैज्ञानिक रूप से इसके कुल वर्षा जल का 80 प्रतिशत संरक्षित करता है. पानी की कमी अक्सर झुग्गियों और अविकसित कालोनियों में आम लोगों के बीच झगड़ों/दंगों का कारण बनती है जहां जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक होता है और पानी के नल/टैंकर/हैंड पंप बहुत कम उपलब्ध होते हैं.

सुधारात्मक उपाय: भारत में स्मार्ट शहर विकसित किये जा रहे हैं परंतु इनकी संख्या सीमित है और पहले से मौजूद शहरों को स्मार्ट शहरों में परिवर्तित किया जा रहा है. अत: सभी शहरी केंद्रों को विकसित किये जाने की आवश्यकता है.

अत: उपर्युक्त गंभीर स्थिति की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित कदम गंभीरता के साथ उठाये जाने चाहियें:-

क) राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशानुसार 15 वर्ष या अधिक पुराने सभी डीजल वाहनों को शहरों में चलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये क्योंकि ये अधिक प्रदूषित हवा छोड़ते हैंनये डीजल वाहनों के उत्पादन को हतोत्साहित किया जाना चाहिये और इनके लिये बहुत अधिक पंजीकरण और पार्किंग शुल्क होने चाहियेअब केवल भारत ङ्कढ्ढ (यूरो ङ्कढ्ढ की पद्धति पर) अनुपालन वाहनों का उत्पादन और पंजीकरण किया जाना चाहिये और वाहनों में केवल स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल की अनुमति होनी चाहिये.

ख) एक तरफ पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराया जाना चाहिये और दूसरी तरफ जनता को भी सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल और निजी वाहनों का मित्रोंपड़ोसियों और साथियों के साथ मिलकर इस्तेमाल करने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिये.

ग) पर्याप्त तैयारी के साथ वाहनों का ओड-ईवन फार्मूला लागू किया जाना चाहिये.

घ) शादियोंजन्मत्योहारों (दीवाली) और अन्य समारोहों का शहरों में पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध/इनके उत्पादनबिक्री और खरीद को सीमित करते हुए रोक लगाई जानी चाहिये.

ड़) प्रदूषण फैलाने वाली सभी फैक्ट्रियोंथर्मल संयंत्रोंईंट भट्ठों आदि को तत्काल शहरों और आसपास के क्षेत्रों से अन्य क्षेत्रों में तबदील किया जाना चाहियेइसके अलावा इन्हें नई प्रौद्योगिकियों के साथ पर्यावरण अनुकूल बनाया जाना चाहिये.

च) सब्सिडी देकर वर्षा जल संरक्षण को लोकप्रिय बनाया जाना चाहिये और सभी पुराने तालाबों/टैंकों का पुनर्विकास किया जाना चाहिये.

छ) शहरों में हर साल सुनियोजित वृक्षारोपण अभियान चलाये जाने चाहियें और छात्रोंशिक्षकोंसरकारी कर्मचारियोंआंगनबाड़ी कार्यकर्ताआशास्वैच्छिक संगठनोंनगर निकायों आदि को सही प्रकार से संलग्न किया जाना चाहिये.

ज) ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये उच्च शक्ति की लाउड स्पीकरोंडी. जे. आदि के आवासीय और सांस्थानिक क्षेत्रों में इस्तेमाल पर प्रतिबंध होना चाहिये.

झ) चालकों को अनावश्यक हार्न न दिये जाने के प्रति प्रशिक्षित किया जाना चाहिये (जैसा कि पश्चिमी देशों में व्यवहार में है)

ट) निर्माण कार्यों के लिये सुनियोजित नियम होने चाहियें जिसमें शोर और वायु प्रदूषण रोकने तथा निर्माण सामग्रियों के लिये सडक़/लेन को बाधित नहीं किये जाने के नियम शामिल हों.

ठ) साइकिलों और बैटरी रिक्शा (सुरक्षा उपकरणों के साथ) के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये और यूरोपीय देशों की तरह साइकिल चलाने वालों के लिये साइकिल ट्रैकों का निर्माण किया जाना चाहिये.

ड) स्वच्छता कार्य योजना में जलवायु और मिट्टी प्रदूषण की रोकथाम के लिये उपकरणों और यंत्रों को शामिल किया जाना चाहियेमुख्य सडक़ों की यंत्रीकृत सफाई शीघ्रातिशीघ्र की जानी चाहिये क्योंकि जमा धूल जानलेवा होती जा रही है.

ण) प्रत्येक नागरिक शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों दोनों में खाद्य के अधिकार के भाग के तौर पर पर्याप्त सुरक्षित पेयजल प्राप्त करने का हकदार होना चाहिये-क्योंकि यह समस्या शहरी झुग्गी झोपडिय़ों में अधिक गंभीर है.

त) झोपडिय़ोंभीड़भाड़ वाले कस्बों और तथाकथित ग़ैर कानूनी कालोनियों का अच्छी तरह विकास करना जिनमें स्वच्छ पेयजलसडक़स्वास्थ्यशिक्षासीवर और अन्य सुविधाएं प्राथमिकता के आधार पर होनी चाहियेकेवल तभी स्मार्ट शहरों’ की अवधारणा को हक़ीकत बनाया जा सकता है.

27.07.2017 को फोर्ब्स मैगजीन से जारी किए गए अनुमान के मुताबिक अमेजॉन के संस्थापक जेफ बेजोस ने माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स को पछाड़कर दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति का खिताब हासिल कर लिया था. उनकी कुल संपत्ति देखी जाए तो बिल गेट्स की 90.7 बिलियन डॉलर की प्रॉपर्टी के मुकाबले 90.9 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी. फोर्ब्स के मुताबिक, बिल गेट्स मार्च में पत्रिका की सालाना रैंकिंग में पिछले चार सालों से सबसे अमीर व्यक्ति थे.

भारत के सबसे धमवान मुकेश अंबानी से कितने अमीर हैं जेफ बेजोस

हालांकि दुनिया के सबसे अमीर इंसान और भारत के सबसे अमीर इंसान की संपत्ति की तुलना की जाए तो अंतर को जानकर आपको भारी हैरानी होगी. अगर भारत के सबसे अमीर-धनवान की बात की जाए तो मुकेश अंबानी के पास कुल 19.3 अरब डॉलर की नेटवर्थ है. अगर जेफ बेजोस की 90.9 अरब डॉलर की नेटवर्थ के सामने देखें तो दोनों की संपत्ति में 71.6 अरब डॉलर का भारी अंतर है.

भारत के कुल  6 करोड़ लोगों के बराबर अकेले जेफ बेजोस की इनकम !

जेफ बेजोस की संपत्ति का रुपये में आकलन किया जाए तो ये 5,768,440,000,000 रुपये बैठती है और अगर इसके सामने भारत की कुल आबादी की प्रति व्यक्ति आय देखें तो ये 1 लाख 3 हजार 219 रुपये सालाना है. इसको दूसरे नजरिए से देखें तो भारत के लगभग 5.8 करोड़ लोग एक साल में जितनी आय हासिल करते हैं उतनी अकेले की इनकम विश्व के सबसे धनवान व्यक्ति जेफ बेजोस के पास है.

कैसे बने जेफ बेजोस दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति

दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन रिटेलर कंपनी एमेजन इंक कंपनी एमेजन के शेयरों में आए 1 फीसदी की उछाल की बदौलत इसका शेयर कल 1046 डॉलर के ऊपरी स्तर पर पहुंच गया. कल यानी गुरूवार के कारोबार के दौरान अमेजॉन का शेयर 1083.31 डॉलर पर तक जा पहुंचा था. जेफ बेजोस के पास अमेजन के कुल 8 करोड़ शेयर हैं और जो कंपनी के कुल शेयरों का 17 फीसदी है. कल की शानदार तेजी के बदौलत कल इनकी कुल वैल्यू 87 अरब डॉलर हो गई थी जो अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है. 2017 की शुरुआत में बेजोज़ चौथे सबसे अमीर शख्स थे. लेकिन अब वो वारेन बफेट और एमैंसियो ऑर्टिगा को भी पछाड़ चुके हैं. हालांकि, कल कुछ ही देर बाद बेजोस फिसल कर फिर से दूसरे नंबर पर आ गए क्योंकि अमेजॉन के शेयरों द्वारा बनाई गई बढ़त कम हो गई.

दुनिया के टॉप 5 नेटवर्थ वाले शख्स/गुरुवार का आंकड़ा

1. जेफ बेजोज़- 90.9 बिलियन डॉलर

2. बिल गेट्स- 90.7 बिलियन डॉलर

3. एमैंसियो ऑर्टिगा 82.7 बिलियन डॉलर

4. बारेन बफेट- 74.5 बिलियन डॉलर

5. मार्क जकरबर्ग- 70.5 बिलियन डॉलर

देश के पूर्व राष्ट्रपति और एक महान वैज्ञानिक के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि (27.07.2017) पर उन्हें देशभर में याद किया गया एवं श्रद्धांजलि दी गई. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की दूसरी पुण्यतिथि पर आज ओडिशा सरकार ने भद्रक जिले में बाहरी व्हीलर द्वीप का नाम एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप रखा है.

राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री महेश्वर मोहंती ने बताया कि राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग ने गृह मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र मिलने के बाद कल गजट अधिसूचना जारी की. मोहंती ने गजट अधिसूचना की एक प्रति मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को सौंपी , जिन्होंने पूर्व में व्हीलर द्वीप का नाम कलाम के नाम पर करने की घोषणा की है.

पटनायक ने पूर्व राष्ट्रपति की दूसरी पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित समारोह में उन्हें श्रद्धांजलि दीं. समारोह में उन्होंने भद्रक जिले में व्हीलर द्वीप और बालेश्वर जिले में चांदीपुर के अस्थायी प्रक्षेपण स्थल से कलाम के भावनात्मक जुड़ाव को याद किया.

श्रद्धांजलि देने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि कलाम ने देश की प्रतिरक्षा के लिए मिसाइल विकसित करने के अपने प्रयासों के तहत इन दो जगहों पर सबसे अधिक समय बिताया हैं.

यह योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत ‘आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना’ नामक एक नई योजना की शुरू कर रहा है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री राम कृपाल यादव ने कहा कि आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन सेवाओं की सुविधा प्रदान करके DAY-NRLM के तहत पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के सदस्यों को आजीविका का एक वैकल्पिक स्रोत प्रदान करना है।

इस योजना के तहत आर्थिक विकास के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सहित प्रमुख सेवाओं और सुविधाओं के साथ दूरदराज के गांवों को एक दुसरे से जुड़ने के लिए ई-रिक्शा, 3 और 4-व्हीलर मोटर परिवहन वाहनों जैसी एक सुरक्षित, सस्ती और समुदाय निगरानी सहित ग्रामीण परिवहन सेवाएं प्रदान की जाएंगी।

आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना का एक वैकल्पिक आजीविका बनाने के लिए महिला स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं की आर्थिक मदद से महिलाओं की सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है। मंत्रालय ने घोषणा की है कि 2017-18 से 2019-20 तक 3 वर्षों की निर्धारित समय अवधि के लिए देश भर में 250 ब्लॉकों में जल्द ही कार्यान्वित किया जाएगा। उप-योजना के तहत दिए जाने वाले प्रस्तावों में से एक यह है कि सामुदायिक आधार संगठन (CBO) अपने स्वयं के कोष से स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को वाहन खरीदने के लिए ब्याज रहित ऋण प्रदान करेगा।

एजीवीका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना का उद्देश्य डीएआई-एनआरएलएम के तहत स्व-सहायता समूह (एसएचजी) के सदस्यों को आजीविका का एक वैकल्पिक स्रोत प्रदान करना है। अब तक, कार्यक्रम के तहत 34.4 लाख महिलाएं एसएचजी समर्थित हैं। आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना, पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को संभालने के लिए सभी सुविधाएं प्रदान करेगी।

एजसी सभी दूरस्थ गांवों को मुख्य सेवाओं के साथ जोड़ने के लिए सुरक्षित, सस्ती और सामुदायिक निगरानी वाले ग्रामीण परिवहन वाहनों को प्रदान करना सुनिश्चित करेगा। जिन वाहनों का उपयोग इस योजना के तहत किया जाएगा वे हैं|

भारत, अमेरिका और जापान की नौसेना के बीच संयुक्त अभ्यास सोमवार को ख़त्म हो गया। इस अभ्यास का मक़सद तीनों देशों की सेनाओं के बीच सैन्य ऑपरेशन के दौरान बेहतर तालमेल बनाना है। इस दौरान समुद्र में तीनों देशों की सेनाओं की ताक़त और अत्याधुनिक तकनीक का प्रदर्शन किया गया।

अमेरिका, जापान और भारतीय नौसेना द्वारा 10 से 17 जुलाई के बीच बंगाल की खाड़ी में ऑपरेशन मालाबार नाम का नौसेना अभ्यास किया गया। इस नौसेना अभ्यास में तीनों देशों के विमान, नौसेना की परमाणु पनडुब्बियां और नौसैन्य पोत शामिल हुए। मालाबार सैन्य अभ्यास का लक्ष्य सामरिक रूप से प्रशांत क्षेत्र में तीनों नौसेनाओं के बीच गहरे सैन्य संबंध और तालमेल स्थापित करना है। भारत का आईएनएस विक्रमादित्य, जापान का जिमूआ और दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट करियर माना जाने वाला अमेरिका का यूएसएस निमित्ज़ भी इसमें शामिल हुआ।

मालाबार अभ्यास की प्रक्रिया एक साल पहले शुरू हुई थी और शुरुआती योजना छह महीने पहले बनी थी। इस नौसैनिक अभ्यास में तीनों देशों के करीब 95 विमान, 16 जहाज और दो पनडुब्बियों ने हिस्सा लिया। इस दौरान समुद्र तट पर और समुद्र में अभ्यास किया गया। इसमें समूह अभियान, समुद्री गश्त और टोही कार्रवाई, सतह और पनडुब्बीरोधी युद्ध का अभ्यास किया गया। इस अभ्यास में चिकित्सा अभियान, ख़तरे कम से कम करने, विस्फोटक आयुध निपटान, हेलीकॉप्टर अभियान का भी अभ्यास किया गया।

गौरतलब है कि पीएम मोदी के अमेरिका दौरे में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि अमेरिकी सेना भारत के साथ आपसी सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। दरअसल अमेरिका ने भारत को बड़ा रक्षा साझीदार माना है और इसी के चलते दोनों देशों में सहयोग बढ़ा है। भारत-अमेरिका और जापान के बीच नौसेना अभ्यास 1992 से शुरू हुआ था और तब से लगातार जारी है। दुनिया के मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात को देखते हुए इस अभ्यास को अहम माना जा रहा है।

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग कर लिया। व्‍हाइट हाउस के रोज गार्डन से प्रसारित अपने कॉन्‍फ्रेंस में उन्‍होंने इसकी घोषणा की। सन 2015 में पेरिस समझौते में 195 देशों ने सहमति जताई थी। इसके तहत जीवाश्म ईंधन के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों के उत्सर्जन को घटाना लक्ष्य है। समझौते के तहत अमेरिका ने 2025 तक 2005 के स्तर से अपने उत्सर्जन को 26 से 28 प्रतिशत कम करने का वादा किया था।

पेरिस जलवायु समझौते से अलग होने के बाद अमेरिका सीरिया और निकारागुआ के साथ आ गया जिन्होंने इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के दौरान इस समझौते को अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश बताया था। 

अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते से बाहर निकलने के फैसले पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री हर्ष वर्धन ने कहा है कि भारत सरकार देश की भावी पीढ़ी को एक स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण देने के लिए प्रतिबद्ध है और वह इसे लेकर अपने प्रयासों को जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन को लेकर क्या फैसला लेता है, यह उसकी अपनी नीतियों पर निर्भर करता है। 

साइबर सुरक्षा वैश्विक सूचकांक (GCI) में भारत को 165 देशों में से 23 वां स्थान प्रदान किया गया. दूसरा ग्लोबल साइबर सिक्युरिटी इंडेक्स (जीसीआई) संयुक्त राष्ट्र के दूरसंचार एजेंसी इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (आईटीयू) द्वारा जारी किया गया.

भारत, 0.683 के अंक के साथ इंडेक्स पर 23 वें स्थान पर है और परिपक्व श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है. सिंगापुर,  0.925 अंक के साथ सूचकांक में शीर्ष पर स्थित है.

साइबर सुरक्षा के शीर्ष 5 में स्थित देश है -1. सिंगापुर, 2. यूनाइटेड स्टेट्स, 3. मलेशिया, 4. ओमान, 5. एस्टोनिया

पीएम मोदी ने असम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की आधारशिला रखते हुए देश के लिए एक नई नीति की घोषणा की। मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 3 साल पूरे होने पर पीएम ने संपदा योजना (स्कीम फॉर एग्रो मरीन प्रोसेसिंग ऐंड डिवेलपमेंट ऑफ एग्रो प्रोसेसिंग क्लस्टर्स) को देश को समर्पित किया। सरकार ने समुद्री एवं विभिन्न कृषि उत्पादों के प्रोसेसिंग को गति देने के लिए लगभग 6000 करोड़ रुपए की एक नई फूड प्रोसेसिंग योजना संपदा (SAMPADA) को अपनी मंजूरी दे दी है जिसे 2016 से 2020 की अवधि में पूरी तरह लागू किया जाना है। 

इस योजना के तहत मिनिस्‍ट्री ऑफ फूड प्रोसेसिंग इंडस्‍ट्रीज के अंतर्गत एग्रो मैराइन प्रोसेसिंग एंड डवलेपमेंट ऑफ एग्रो क्‍लस्‍टर्स की योजनाओं को साल 2019-20 तक पूरा किया जाना है। मेगा एग्रो प्रोसेसिंग योजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद इनमें लगभग 31400 करोड़ रुपए का निवेश होने की पूरी संभावना है। सरकार को यह उम्‍मीद है कि इससे करीब 334 लाख टन खाद्य पदार्थों को खराब होने से पूरी तरह बचाया जा सकेगा और इसके एवज में लगभग 1.04 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्‍त बचत हर साल की जा सकेगी। इन योजनाओं से करीब 20 लाख किसानों को बहुत ही फायदा होगा और 5,305,00 लोगों को प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से रोजगार भी मिल सकेगा। फूड प्रोसेसिंग इंडस्‍ट्रीज मिनिस्‍टर हरसिमरन कौर ने इससे पहले कहा था कि कोल्‍ड चेन और प्रोसेसिंग सिस्‍टम के अभाव में हर साल लगभग 92 हजार करोड़ रुपए के खाद्य पदार्थ बेकार हो जाते हैं।

इस नई योजना के लिए लगभग 6,000 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। यह 31,400 करोड़ रुपए के निवेश को आकर्षित करने और 1,04,125 करोड़ रुपए मूल्य के 334 लाख टन कृषि उत्पादों के प्रबंधन की सुविधा भी देगी।

अगर चीन ने गीदड़भभकी के जरिये अपनी विस्तारवादी नीति को जायज ठहरने की कोशिश करेगा तो यह चीन को महंगा भी पड़ सकता है. २१वी सदी के भारत या अन्य किसी देश को कम करके आंकना चीनी खिलौनों की तरह उसका सपना बिखर जायेगा. 

सिक्किम सेक्टर में भारतीय और चीनी सेना के बीच महीने भर से जारी गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इससे पहले चीन के सरकारी मीडिया और थिंक टैंक ने कहा था कि इस विवाद से अगर उचित तरीके से नहीं निपटा गया तो इससे 'युद्ध' छिड़ सकता है। राजनयिक ने कहा कि चीन सरकार इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट है कि वह स्थिति का शांतिपूर्ण समाधान चाहती है और इसके लिए इलाके से भारतीय सैनिकों की वापसी 'पूर्व शर्त' है।

भारत चीन के बीच सीमा पर लगातार तनाव बरकरार है। इस बीच चीन की नौसेना के कई पोतों और पनडुब्बियों का हिन्दमहासागर में दखल देखा गया है। चीन की नापाक की हरकतों पर भारतीय नौसेना बारीकी से नजर बनाए हुए है और इसके लिए जीसैट-7 का इस्तेमाल कर रही है, जिसे भारत ने 29 सितंबर 2013 को लॉन्च किया था। 

हिंदमहासागर में चीन के बढ़ते हुए दखल को देखते हुए नौसेना समुद्री सीमाओं पर नजर बनाए हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत को चीनी नौसेना की हर कदम की जानकारी जीसैट-7 सेटेलाइट के जरिए मिल रही है। इस उपग्रह का नाम रुक्मिणी है।

आपको बता दें कि हाल ही में हिंदमहासागर क्षेत्र में 14 चीनी नौसेना पोतों को भारतीय समुद्री क्षेत्र में घूमते देखा गया था। इनमें आधुनिक लुआंग-3 और कुनमिंग क्लास स्टील्थ डेस्ट्रॉयर्स भी शामिल थे।

क्या है रुक्मिणी

यह भारत का पहला सैन्य सेटेलाइट है। 2,625 किलोग्राम वजन का यह सैटेलाइट हिंद महासागर क्षेत्र में नजर रखने में नौसेना की मदद कर रहा है। यह एक मल्‍टी-बैंड कम्‍युनिकेशन-कम सर्विलान्‍स सेटेलाइट है, जिसका 36,000 किमी की ऊंचाई से संचालन हो रहा है। इसके जरिए हिंद महासागर के विस्तृत जलक्षेत्र में 2000 किमी तक के दायरे में निगरानी करना भारतीय नौसेना के लिए काफी आसान हो गया है। रुक्मिणी सेटेलाइट जंगी बेड़ों, सबमरीन, समुद्री एयरक्राफ्ट की गतिविधियों का रियल टाइम अपडेट मुहैया कराता है। इस सेटेलाइट की जद में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ही हैं। 

2013 में भारत के पास 4 टन वर्ग के सैटलाइट को लॉन्च करने के लिए आधुनिक जीएसएलवी रॉकेट नहीं थे। इसकी वजह से भारत को 185 करोड़ रुपये कीमत वाले जीसैट-7 सैटलाइट को फ्रेंच गुएना से लॉन्च से किया गया था।

अब भारतीय वायुसेना के लिए भी इसी तरह का एक अन्य सैटलाइट जीसैट-7A विकसित किया जा रहा है। एक सूत्र ने बताया, 'इस सैटलाइट का लॉन्च साल के आखिर में होना है।' इसकी मदद से एयरफोर्स जमीन पर स्थित कई रेडार स्टेशनों, एयरबेसों और एयरबॉर्न अर्ली वॉर्निंग ऐंड कंट्रोल (अवॉक्स) एयरक्राफ्ट्स से सीधे जुड़ सकेगी।

ये है विवाद की वजह

डोक ला इस क्षेत्र का भारतीय नाम है, जिसे भूटान डोकलाम के रूप में मान्यता देता है, जबकि चीन इसे अपने डोंगलांग इलाके का हिस्सा बताता है। भारत में चीन के राजदूत झाओहुई ने कहा, 'स्थिति गंभीर है, जिसने मुझे गंभीर चिंता में डाल दिया है। यह पहला मौका है जब भारतीय सैनिकों ने पारस्परिक सहमति वाली सीमा रेखा पारकर चीन की सीमा में प्रवेश किया है। इससे चीन और भारत के सीमा पर तैनात सैनिकों के बीच गहरा गतिरोध पैदा हो गया है। अब 19 दिन बीत चुके हैं लेकिन स्थिति अब भी सहज नहीं हो सकी है।' उन्होंने कहा कि भारत को चीन-भूटान सीमा वार्ता में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है और ना ही वह भूटान की तरफ से क्षेत्र को लेकर दावा करने के लिए अधिकृत है।

कहां है डोकलाम

संधि स्थल को भारत डोक ला कहता है। भूटान इसे डोकलाम कहता है। चीन इसी हिस्से में डोंगलोंग पर अपना दावा करता है। चीन और भूटान के बीच क्षेत्र पर दावे को लेकर वार्ता होती रही है। भूटान का चीन के साथ कोई कूटनीतिक रिश्ता नहीं है। भारत ही उसे सैन्य और कूटनीतिक समर्थन देता है। चीन का कहना है कि भारत के पास न तो चीन-भूटान सीमा विवाद में हस्तक्षेप का और न ही भूटान की तरफ से क्षेत्र पर दावे का अधिकार है।

अगर आप स्कूल में बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं लेकिन किसी और पेशे से जुड़े हैं, तो भी आप बच्चों को पढ़ा सकेंगे। मोदी सरकार आपको पढ़ाने के अपने सपने को पूरा करने का मौका देने जा रही है। ऐसे लोगों के लिए जो शिक्षक नहीं है लेकिन बच्चों को पढ़ाने की हसरत रखते हैं, मोदी सरकार 16 जून से विद्यांजलि योजना शुरू करने जा रही है। इसके तहत स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षक होने की बाध्यता खत्म होगी। इस योजना का मकसद आम जन को सरकारी स्कूलों से जोड़कर उनका विकास करना है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से विद्यांजलि योजना की शुरुआत 16 जून से हो गयी। पहले चरण में देश के 210 राज्यों के सरकारी स्कूलों में योजना लागू होगी। बीते आठ फरवरी को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की राज्यों के अफसरों के साथ बैठक में इस योजना के संचालन पर सहमति बनी।

खास बात है कि हुनरमंद महिलाओं के साथ कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति या एनआरआई स्कूलों में पढ़ा सकता है। रिटायर्ड शिक्षक, सरकारी कर्मी और सेना के जवान भी पे स्केल पर पढ़ा सकते हैं।

विद्यांजलि योजना के तहत कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति किसी भी सरकारी स्कूल से जुड़ सकता है। इसके लिए mygov.in वेबसाइट पर स्कूल के नाम के साथ आवेदन करना होगा।

पूर्ण गरीबी गंभीर अभाव, भूख, समयपूर्व मृत्यु और पीड़ा के मामले के रूप में देखी गई है। यह गरीबी की एक महत्वपूर्ण समझ का कब्जा करता है और इसकी प्रासंगिकता आज दुनिया के कुछ हिस्सों में फैली हुई है। यह कार्रवाई की जरूरी आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करती है हालांकि, कुछ परिस्थितियां हैं, जैसे कि भुखमरी या असुरक्षित पानी, जो तत्काल मृत्यु की ओर ले जाते हैं, इनमें से अधिकांश मानदंडों को निर्णय और तुलना की आवश्यकता होती है। 

जैसे, 1995 में संयुक्त राष्ट्र ने गरीबी की दो परिभाषाओं को अपनाया

संपूर्ण गरीबी को परिभाषित किया गया था:

"भोजन, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता सुविधाओं, स्वास्थ्य, आश्रय, शिक्षा और सूचना सहित बुनियादी मानवीय जरूरतों के गंभीर अभाव के कारण एक ऐसी स्थिति होती है, जो केवल आय पर ही नहीं बल्कि सेवाओं तक पहुंच पर निर्भर करती है।"

"कुल गरीबी विभिन्न रूपों में शामिल है, जिनमें शामिल हैं: आय और उत्पादक संसाधनों की कमी, स्थायी जीवनसाध्य, भूख और कुपोषण, बीमार स्वास्थ्य, सीमित और शिक्षा और अन्य बुनियादी सेवाओं तक पहुंच की कमी, बीमारी से रोग और मृत्यु दर में वृद्धि, बेघर और अपर्याप्त आवास असुरक्षित वातावरण और सामाजिक भेदभाव और बहिष्कार.यह निर्णय लेने में और सिविल, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी की कमी के कारण भी होता है। यह सभी देशों में होता है: कई विकासशील देशों में गरीबी, गरीबी की जेबें विकसित हुईं देशों, आर्थिक मंदी के कारण आजीविका के नुकसान, आपदा या संघर्ष के कारण अचानक गरीबी, कम मजदूरी वाले श्रमिकों की गरीबी, और परिवार के समर्थन प्रणाली, सामाजिक संस्थानों और सुरक्षा नेट से बाहर गिरने वाले लोगों की निराशा होती है। "

ये गरीबी की रिश्तेदार परिभाषाएं हैं, जो समाज के भीतर रहने वाले न्यूनतम स्वीकार्य मानकों के मामले में गरीबी को देखते हैं, जिसमें किसी विशेष व्यक्ति का जीवन रहता है। (संयुक्त राष्ट्र, 1 99 5) लेकिन 'समग्र गरीबी' आगे चला जाता है, कई कारकों को पहचानना जो कि वंचितों में योगदान दे सकता है 2010 में, संयुक्त राष्ट्र ने स्वास्थ्य और शिक्षा को कवर करने वाले एक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) को अपनाया, साथ ही साथ रहने के मानकों का भी मूल्यांकन किया।

केंद्र सरकार ने 13.06.2017 को स्पष्ट किया कि गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स 1 जुलाई से ही लागू होगा और इसकी तैयारियों जोर-शोर से चल रही हैं। 

छोटे व्यवसाय भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। ये देश की अर्थव्यव्स्था और औद्योगिक विकास को गति देकर नौकरियां पैदा करते हैं। हालांकि, देश में बहुत से व्यवसाय नियमित रूप से रिटर्न फाइल नहीं करते और न ही टैक्स अदा करते हैं। इसकी कुछ वजहें हो सकती हैं। मसलन, जानकारी का अभाव, परिस्थितिजन्य परेशानियां या कारोबारियों की यह धारणा कि आकार, संचालन और कमाई के लिहाज से उनका बिजनस बहुत छोटा है, इसलिए डेडलाइन मिस भी हो जाए तो चलता है। यही वजह है कि उन्हें टैक्स डिपार्टमेंट नोटिस भेजकर टैक्स पेमेंट, इंट्रेस्ट, लेट फी और पेनल्टीज की मांग करता रहता है। 

एक व्यापक अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के रूप में जीएसटी लागू होते ही मौजूदा अप्रत्यक्ष कर खत्म हो जाएंगे और इसके लागू होते ही किसी व्यवसाय की सफलता और विश्वसनीयता इस बात पर बहुत हद तक निर्भर हो जाएगी कि कारोबारी जीएसटी के नियमों का किस हद तक पालन कर रहे हैं।

जीएसटी सेल्फ-मॉनिटरिंग मेकनिजम पर काम करेगा। इस मॉडल के तहत वस्तु एवं सेवा मुहैया करवाने वाले और प्राप्त करने वालों के बीच इनवॉइस की बड़ी भूमिका होगी। दोनों इनवॉइस मैच करने और सप्लायर की ओर से टैक्स पे करने के बाद ही कन्ज्यूमर को इनपुट टैक्स क्रेडिट मिल पाएगा।

ऐसे में कोई भी ग्राहक वैसे वेंडरों के साथ ही बिजनस करना चाहेगा जो जीएसटी के नियम-कानून का सही-सही पालन करता हो। इस तरह जीएसटी लागू होने के बाद ग्राहक और दुकानदार या सेवा प्रदाता के बीच का भावनात्मक रिश्ता बदल जाएगा और कानून पालन की अनिवार्यता इस रिश्ते की जगह ले लेगी।

इस तरह जीएसटी लागू होने पर टैक्स कानून का पालन नहीं करने से फाइन, इंट्रेस्ट और पेनल्टीज के रूप में खर्चे बढ़ जाएंगे बल्कि आपके व्यवसाय पर भी असर होगा और कंप्लायंस रेटिंग भी घट जाएगी। चलिए, जीएसटी के तहत फाइल होने वाले विभिन्न प्रकार के रिटर्न्स के साथ-साथ इन्हें फाइल करते वक्त ध्यान रखने वाली बातों पर गौर करें.

महीने की 10 तारीख को फॉर्म जीएसटीआर-1 फॉर्म

जीएसटीआर-1 में आपको हर महीने बेचे गए सामान या दी गई सेवाओं का विस्तृत जिक्र करना होगा। रजिस्टर्ड डीलरों को सप्लाइज के हरेक इनवॉइस और ग्राहकों के लिए सामानों और सेवाओं की कुल कर योग्य कीमत की जानकारी देनी होगी। अगर दूसरे राज्य के ग्राहक को की गई आपूर्ति की कर योग्य कीमत 2.5 लाख रुपये से अधिक है तो हर हरेक इनवॉइस का विवरण देना होगा।

11 तारीख को फॉर्म जीएसटीआर-2

एजीएसटीआर-1 में सप्लायर की घोषणा के आधार पर महीने की 11वीं तारीख को प्राप्तकर्ता के लिए जीएसटीआर-2ए फॉर्म तैयार हो जाएगा। 11 से 15 तारीख के बीच इसमें संशोधन किया जा सकता है। रिटर्न फाइल करने के नजरिए से यह अवधि काफी महत्वपूर्ण होगी क्योंकि अगर इस दौरान आपने जीएसटीआर-2ए में संशोधन नहीं किया तो आपकी इनपुट टैक्स क्रेडिट एलिजिबलिटी पर असर पड़ सकता है। खास बात यह है कि नियमों का पालन करने और समय की बचत करने में टेक्नॉलजी आपकी बहुत मददगार साबित होगी।

15 तारीख को फॉर्म जीएसटीआर-2

फॉर्म जीएसटीआर-2ए में दी गई जानकारी के अतिरिक्त कोई दावा करने के लिए 15 तारीख तक जीएसटीआर-2 फॉर्म जमा कर देना होगा।

जीएसटीआर-2 में दी गई जानकारी के आधार पर आपके ई-क्रेडिट लेजर में आईटीसी क्रेडिट हो जाएगा और इनवॉइस मैच होने पर यह पक्का हो जाएगा।

16 तारीख को फॉर्म जीएसटीआर-1ए

फॉर्म जीएसटीआर-2 में आप जो सुधार करेंगे, उन्हें आपके सप्लायर को फॉर्म जीएसटीआर-1ए के जरिए मुहैया कराया जाएगा। तब सप्लायर आपके संशोधनों को स्वीकार या खारिज करेगा। 

20 तारीख को जीएसटीआर-3 फॉर्म

जीएसटीआर-1 और जीएसटीआर-2 के आधार पर 20 तारीख को ऑटो-पॉप्युलेटेड रिटर्न जीएसटीआर-3 उपलब्ध हो जाएगा जिसे आप पेमेंट के साथ जमा कर सकते हैं।

फॉर्म जीएसटी एमआईएस-1 में इनपुट टैक्स क्रेडिट की आखिरी स्वीकृतिफॉर्म जीएसटीआर-3 में मंथली रिटर्न फाइल करने की सही तारीख के बाद आंतरिक आपूर्ति और बाह्य आपूर्ति में मिलान किया जाएगा। तब जीएसटी एमआईएस-1 में इनपुट टैक्स क्रेडिट को आखिरी स्वीकृति मिलेगी। बिलों के मिलान के वक्त इनका सहारा लिया जाएगा.

सप्लायर का जीएसटीआईएन

रिसीपिअंट का जीएसटीआईएन

इनवॉइस या डेबिट नोट नंबर

इनवॉइस या डेबिट नोट डेट

टैक्सेबल वैल्यू टैक्स अमाउंट

इसी मिलान के आधार पर इनपुट टैक्स क्रेडिट के दावे पर विचार किया जाएगा। 

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, जीएसटी के नियमों का पालन एक दिन का काम नहीं है। जीएसटी के तहत रिटर्न साइकल मौजूदा रिवाजों को खत्म कर देगा। अभी ज्यादातर छोटे कारोबारी अपनी खरीद और बिक्री का आकलन कर एक दिन में रिटर्न तैयार कर लेते हैं। लेकिन, अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि जीएसटी रिटर्न साइकल पूरे महीने चलने वाला है। दूसरी बात यह कि कारोबारियों को ऑफलाइन की जगह ऑनलाइन आंकड़े सुरक्षित करने होंगे। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह कि इस पूरी प्रक्रिया में टेक्नॉलजी की महत्वूर्ण भूमिका होगी। 

पुणे की परसिस्टेंट सिस्टम्स ने भर्तियों की पुरानी प्रथा को तोड़ते हुए अपनी टीम में कुछ फ्रीलांसरों और कंसल्टंट्स को शामिल कर लिया जिन्होंने कम वक्त के एक प्रॉजेक्ट पर काम किया। जॉब की दुनिया में यह थोड़ा नया आइडिया है जो ग्लोबल टेक्नॉलजी सर्विस इंडस्ट्री में धीरे-धीरे जोर पकड़ता जा रहा है। इसे 'गिग इकॉनमी' या वर्कफोर्स का ऊबराइजेशन (ऐप बेस्ड कैब मुहैया करानेवाली कंपनी ऊबर की तरह इस्तेमाल किया जाना) कहा जा रहा है, जहां लोग डिमांड-सप्लाइ मॉडल पर काम करते हैं। इसमें डिमांड और इंट्रेस्ट एरियाज के लिहाज से विभिन्न प्रॉजेक्ट्स के लिए एक से दूसरी कंपनी का भ्रमण करते रहते हैं। 

परसिस्टेंट सिस्टम्स के चीफ पीपल ऑफिसर समीर बेंद्रे ने कहा, 'हालांकि यह (ऊबराइजेशन) सर्विसेज कंपनियों में बड़े पैमाने पर अब तक नहीं दिखा है, लेकिन इसकी शुरुआत हो चुकी है।' उन्होंने कहा, 'कुछ पॉकेट्स में हम इसका प्रयोग कर रहे हैं... हमें लगता है कि कुछ क्षेत्रों में इसके इस्तेमाल के अच्छे अवसर हैं। मसलन, अगर महिलाएं मातृत्व अवकाश के बाद कम पर लौट रही हों तो।'

इन्फोसिस और विप्रो समेत दूसरी भारतीय आईटी कंपनियां 'ऊबराइज्ड वर्कफोर्स' के आइडिया पर विचार कर रही हैं। इस ट्रेंड के जोर पकड़ने के पीछे मार्केट में उठापटक और इंडियन आईटी सर्विसेज के सबसे बड़े मार्केट अमेरिका में बदली राजनीतिक स्थिति से कहीं बड़ी वजह युवाओं की प्राथमिकताओं का बदलना है। 

इन्फोसिस में एचआर हेड रिचर्ड लोबो ने कहा, 'वर्कफोर्स में मिलेनियल्स के बढ़ते दबदबे से वो सारी धारणाएं टूट रही हैं जो किसी एंप्लॉयी को कंपनी से जुड़ा और प्रेरित रखती थीं।' उन्होंने कहा, 'हम ज्यादा-से-ज्यादा मिलेजुले वर्कफोर्स के साथ डील कर रहे हैं जहां फुल टाइम और पार्ट टाइम एंप्लॉयी एक ही जगह पर काम करते हैं, लेकिन दोनों की जरूरतें बिल्कुल भिन्न हैं।'

लोबो कहते हैं कि फुल टाइम जॉब नहीं करने की चाहत रखनेवालों की तादाद बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा, 'जिस तरह लोगों को ऑन डिमांड कारों से आवाजाही की आदत हो गई है, उसी तरह एंप्लॉयर्स भी उन खास कामों के लिए लोगों की ऑन डिमांड हायरिंग कर लेंगे जिन्हें रेग्युलर स्टाफ नहीं निपटा सकते।' 

पिछले साल जब विप्रो ने अमेरिकी आईटी कंसल्टिंग फर्म ऐपिरियो का अधिग्रहण किया था, तब सीईओ आबिदअली नीमचवाला ने कहा था, 'हमें लगता है कि आईटी इंडस्ट्री में कामकाज का भविष्य कुछ हद तक ऊबराइज्ड होने जा रहा है।' 

चीन की बढ़ती ताकत और उसकी विस्‍तारवादी नीति को लेकर अब बड़े देशों को चिंता होने लगी है। इसका बड़ा उदाहरण अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन की वह रिपोर्ट है जिसमें चीन के पाकिस्‍तान और और अफ्रीका के जिबुति में मिलिट्री बेस स्‍थापित करने की बात कही है। जिबुति की भौगोलिक स्थिति सामरिक दृष्टि से काफी अहम है। यह अफ्रीकन देश हिंद महासागर के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर बसा हुआ है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है चीन विदेशों में बंदरगाहों के जरिए अपनी विस्‍तारवादी नीति को अंजाम देने में लगा है। फिर चाहे वह पाकिस्‍तान का ग्‍वादर हो या कोई और। पूर्व राजनयिक विवेक काटजू भी मानते हैं कि चीन इस तरह से इस पूरे इलाके में अपनी स्थिति को मजबूत करने में लगा हुआ है।

जिबुति इसलिए भी खास है कि क्‍योंकि यहां पर अमेरिका का भी नेवल बेस है। यह लाल सागर और दक्षिण से स्‍वेज नहर में जाने का रास्‍ता भी है। अमेरिका का जहां रक्षा बजट 180 बिलियन डॉलर है वहीं चीन का रक्षा बजट करीब 954 बिलियन युआन (करीब 140.4 बिलियन डॉलर) है। वर्ष 2017 चीन ने पाकिस्‍तान को आठ पनडुब्बियों को बेचने की डील भी की है। वर्ष 2011-15 के दौरान चीन के हथियारों की बिक्री 9 बिलियन से बढ़कर 20 बिलियन तक पहुंच गई है।

यहां पर यह भी ध्‍यान रखना जरूरी होगा कि चीन के कर्ज में डूबे श्री लंका के लिए हबनतोता बंदरगाह को उसे सौंपना बहुत बड़ी मजबूरी बन गया है। हालांकि सरकार की तरफ से इसके करीब 80 फीसद शेयर चीन की कंपनी को बेचने की बात कही जा रही है। कुल मिलाकर यह चीन के ही कब्‍जे में है। इसपर चीन ने करीब आठ बिलियन डॉलर का खर्च किया है। श्री लंका की हालत इतनी खराब है कि वह चीन का कर्ज चुका पाने में नाकाम दिखाई दे रहा है। इसके अलावा पाकिस्‍तान का ग्‍वादर पोर्ट जिसकी सुरक्षा का जिम्‍मा भी चीन के पास है, में भी स्थिति काफी कुछ ऐसी ही है। ऐसे में चीन लगातार भारत को घेरने और भारत की चिंता का सबब बनता जा रहा है। भारत के प्रभाव को रोकने के लिए चीन की यह नई रणनीति का एक अहम हिस्‍सा है।

अमेरिकी कांग्रेस के सामने पेश की गई 97 पन्नों की रिपोर्ट में पिछले साल चीन की सेना द्वारा की गई गतिविधियों का भी जिक्र किया गया है। अमेरिका के मुताबिक, चीन ने अपने सुरक्षा खर्च में जमकर खर्च किया है। पेंटगन की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने इस क्षेत्र में 115 खरब से भी ज्यादा का बजट खर्च किया है जबकि वह अपना रक्षा बजट आधिकारिक तौर पर 90 खरब बताता रहा है। ऐसा इसलिए भी है क्‍योंकि चीन के नेता आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार को नजरअंदाज करते हुए रक्षा खर्च में बढ़ोतरी के पक्षधर हैं। गौरतलब है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पाकिस्‍तान चीन द्वारा बेचे जाने वाले हथियारों का एक बड़ा ग्राहक है। चीन ने 2011 से 2015 के बीच कुल 12 खरब रुपये के हथियारों का निर्यात किया, जिसमें से करीब 6 खरब रुपये के हथियार अकेले पाकिस्तान ने खरीदे हैं।

रक्षा विशेषज्ञ अनिल कौल मानते हैं कि चीन और पाकिस्‍तान की विदेशनीति काफी भारत को देखते हुए बनाई जाती है। अफ्रीका में चीन के मिलिट्री बेस का होना इस बात का सुबूत है कि चीन हर तरफ से भारत पर नजर बनाए रखना चाहता है। वह लगातार भारत को घेरने की साजिश रच रहा है। इस साजिश के तहत उसने पहले श्रीलंका में बंदरगाह पर कब्‍जा जमाया है। इसके बाद पाकिस्‍तान में सीपैके के जरिए ग्‍वादर पोर्ट पर कब्‍जा किया है और अब अफ्रीका तक जा पहुंचा है। वह इसको विस्‍तारवादी नीति के अलावा भारत के घेराव की नीति भी मानते हैं। उनका यह भी कहना है कि भारत की कभी भी इस तरह की कोई पॉलिसी नहीं रही है। पेंटागन की रिपोर्ट पर बात करते हुए उन्‍होंने माना कि चीन के बढ़ते कदमों की आहट से अमेरिका भी काफी परेशान है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका चीन को अपने वर्चस्‍व के लिए अब खतरा मानने लगा है। लिहाजा उसको इसे लेकर चिंता होनी स्‍वाभाविक है। 

फाबिओला जानोती, इटली

2014 में ब्रिटेन के अख़बार द गर्डियन ने इटली की भौतिक विज्ञानी फाबिओला जानोती को 'ब्रह्मांड के रहस्यों की कुंजी वाली महिला' करार दिया था. फाबिओला ने 2016 में स्विटज़रलैंड स्थित दुनिया के अहम विज्ञान केंद्र यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फोर न्यूक्लियर रिसर्च में पार्टिकल फिजिक्स की अगुवाई की. 1994 से फाबिओला इस सेंटर में एक अहम भौतिक विज्ञानी खोजकर्ता थीं. 2009 से 2013 तक लार्ज हैड्रन कोलाइडर में एटलस के लिए प्रवक्ता रहीं. इन्होंने इस बात को दुनिया के सामने रखा कि प्रकृति में व्यापक पैमाने पर पार्टिकल क्यों हैं.

क्रिस्टिना फिगेरस, कोस्टा रिका

क्रिस्टिना से जब बीबीसी मुंडो ने पूछा कि उन्हें विज्ञान से प्रेम कैसे हुआ तो उन्होंने कहा कि प्रकृति उनका पहला घर रहा है. क्रिस्टिना ने कहा कि प्रकृति उनका अब भी पहला घर है. क्रिस्टिना एन्थ्रोपॉलोजिस्ट हैं और वह कोस्टा रिका के तीन बार राष्ट्रपति रहे जोसे फिगेरस फेरर की बेटी हैं. क्रिस्टिना 2012 और 2016 के बीच संयुक्त राष्ट्र संघ में फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज की कार्यकारी सचिव रहीं. क्रिस्टिना ने 2010 में कानकुन, 2011 में डर्बन, 2013 में वार्सा और 2014 में लिमा के जलवायु परिवर्तन कॉन्फ्रेंस की अगुवाई की थी. पेरिस में 2015 के ऐतिहासिक जलवायु समझौते में क्रिस्टिना की अहम भूमिका रही थी.

किरण मजूमदार-शॉ, भारत

अपने योगदान के कारण किरण मजूमदार-शॉ विज्ञान की दुनिया में पहचान के लिए मोहताज नहीं हैं. 2010 में अमरीका की महत्वपूर्ण पत्रिका टाइम ने वर्षिक रैंकिंग 'टाइम 100' में हमारी दुनिया की 100 प्रभावशाली लोगों में जगह दी थी. बायोटेक्नोलॉजी में अपने योगदान के कारण उन्हें हीरो की कैटिगरी में जगह दी गई थी. 2014 में फ्यूचर मैगज़ीन में किरण को एशिया-पसीफिक में सबसे प्रभावशाली महिला करार दिया था. किरण का जन्म भारत में हुआ था. वह बायोकॉन की संस्थापक और अध्यक्ष हैं. यह कंपनी बायोटेक्नॉलजी के क्षेत्र में शोध करती है.

गोयन शॉटवेल, अमरीका

अमरीकी मैगज़ीन फोर्ब्स ने दुनिया की 100 शक्तिशाली महिलाओं में गोयन को 76वें पायदान पर रखा था. इस लिस्ट में कंस्ट्रक्शन और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वह एकमात्र महिला थीं. गोयन की विशेषज्ञता अप्लाइड मैथ्स में भी है. वह स्पेसएक्स की अध्यक्ष हैं. यह कंपनी स्पेस तकनीक पर काम करती है. इस कंपनी का जोर ख़ासकर स्पेस ट्रांसपोर्ट में खर्च को कम करना है.

मारग्राटा चान, चीन

चीनी फिजिशन मारग्राटा चान ने रोगाणुरोधक को लेकर काम किया है. चान ने गानरीअ जैसी बीमारियों को लेकर सतर्क किया था. वह विश्व स्वास्थ संगठन की महानिदेशक भी रही हैं. चान सांस संबंधी बीमारियों और बर्ड फ्लू की विशेषज्ञ हैं. चान ने महिलाओं और बच्चों की सेहत को लेकर काफी काम किया है.

इसरो के सबसे ताकतवर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल GSLV मार्क 3 डी-1 ने 05.06.2017 को पहली उड़ान भरी। इसका वजन 200 हाथियों के बराबर है। इसे आंध्र प्रदेश के सतीश धवन स्पेस सेंटर से छोड़ा गया। रॉकेट ने एक हाथी के बराबर वजनी देश के सबसे भारी कम्युनिकेशन सैटेलाइट GSAT-19 को 16 मिनट में स्पेस ऑर्बिट में पहुंचाया। इससे आने वाले कुछ सालों में भारत में हाई स्पीड इंटरनेट की शुरुआत होगी। इसरो ने कहा कि आने वाले वक्त में नए जीएसएलवी रॉकेट से इंसानों को स्पेस की सैर कराई जा सकती है। इस ऐतिहासिक मिशन की कामयाबी पर नरेंद्र मोदी और प्रेसिडेंट प्रणब मुखर्जी ने इसरो को बधाई दी।

1) क्या है ये मिशन?

इसरो के सबसे ताकतवर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल GSLV मार्क 3 डी-1 ने पहली उड़ान भरी। यह अपने साथ देश के सबसे भारी कम्युनिकेशन सैटेलाइट GSAT-19 (वजन 3136 kg ) को स्पेस में लेकर गया।

2) क्या है GSAT-19?

GSAT-19 देश में तैयार सबसे वजनी सैटेलाइट है। इसमें मॉडर्न प्लेन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। यह हीट पाइप, फाइबर ऑप्टिक जायरो, माइक्रो-मेकैनिकल सिस्टम्स एक्सीलेरोमीटर, केयू-बैंड टीटीसी ट्रांसपोंडर और लीथियम आयन बैटरी से लैस है। इस पर करीब 300 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं

3) कम्युनिकेशन सैटेलाइट से क्या फायदा?

कुछ साल में देश में इंटरनेट स्पीड बढ़ेगी। सबसे तेज लाइव स्ट्रीमिंग मिलेगी। जहां फाइबर ऑप्टिकल नेटवर्क नहीं है, वहां फायदा होगा।- GSAT-19 और GSAT-11 कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स की लॉन्चिंग से डिजिटल इंडिया को मजबूती मिलेगी।

4) क्या है GSLV?

GSLV इसरो का सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल है। इसका पूरा नाम जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल है। इस रॉकेट को इसरो ने डेवलप किया है। इसके जरिए 2001 से अब तक 11 बार सैटेलाइट स्पेस में भेजे जा चुके हैं। आखिरी उड़ान 5 मई, 2017 को भरी थी, तब यह जीसैट-9 को अपने साथ लेकर रवाना हुआ था।

5) GSLV मार्क 3 की खासियत क्या है?

GSLV मार्क 3 की लॉन्चिंग को स्पेस टेक्नोलॉजी में बड़ा बदलाव लाने वाले मिशन के तौर पर देखा जा रहा है। अब भारत दूसरे देशों पर डिपेंड हुए बिना बड़े और भारी सैटेलाइट्स की लॉन्चिंग देश में ही कर सकेगा। यह स्पेस में 4 टन तक के वजन वाले सैटेलाइट्स को ले जा सकता है। इसकी क्षमता मौजूदा जीएसएलवी मार्क 2 की दो टन की क्षमता से दोगुनी है। - धरती की कम ऊंचाई वाली ऑर्बिट तक 8 टन वजन ले जाने की ताकत रखता है, जो भारत के क्रू को लेकर जाने के लिए लिहाज से काफी है। इसरो पहले ही स्पेस में 2 से 3 मेंबर भेजने का प्लान बना चुका है। इसके लिए करीब 4 अरब डॉलर के फंड मिलने का इंतजार है।

6) इसे क्यों कहा जा रहा है फैट ब्वॉय सैटेलाइट?

GSLV मार्क 3 का वजन 630 टन है, जो 200 हाथियों (एक हाथी-करीब 3 टन) के बराबर है। ऊंचाई करीब 42 मीटर है। इसका वजन 5 पूरी तरह से भरे बोइंग जम्बो विमान या 200 हाथियों के बराबर है। इसीलिए इसे फैट ब्वॉय सैटेलाइट कहा जा रहा है। इसको बनाने में 160 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।

7) रॉकेट लॉन्चिंग में इसरो का क्या रिकॉर्ड?

इसरो के लिए यह मिशन आसान काम नहीं होगा। पहले रॉकेट लॉन्च में भारत का रिकॉर्ड कुछ खास अच्छा नहीं रहा है। 1993 में इसरो का PSLV पहले लॉन्च में फेल हो गया था। तब से अब तक इसके 39 लॉन्च कामयाब रहे हैं। - GSLV Mk-1 भी 2001 में अपने पहले लॉन्च में असफल हो गया था। तब से लेकर अब तक उससे 11 लॉन्च हुए हैं, जिसमें से आधे कामयाब रहे हैं।

8) इससे भारत को क्या फायदा मिलेगा?

GSLV मार्क 3 की पहली उड़ान कामयाबी होने से स्पेस में इंसान को भेजने का भारत का सपना जल्द पूरा हो सकता है। इसरो का यह जम्बो रॉकेट इंसानों को स्पेस में लेकर जाने की कैपिसिटी रखता है। इसरो के चेयमैन एएस. किरण कुमार ने कहा था कि अगर 10 साल या कम से कम 6 कामयाब लॉन्चिंग में सब कुछ ठीक रहा तो इस रॉकेट को 'धरती से भारतीयों को स्पेस में पहुंचाने वाले’ सबसे अच्छे ऑप्शन के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं।

9) भारत से पहला अंतरिक्ष यात्री कौन था?

स्पेस में जाने वाले भारत के पहले शख्स का नाम राकेश शर्मा है, जिन्होंने 2 अप्रैल 1984 को सोवियत यूनियन के मिशन के दौरान उड़ान भरी थी। शर्मा इंडियन एयरफोर्स के पायलट थे।

10) कितने देशों के पास यह कैपिसिटी?

GSLV मार्क 3 की कामयाबी के साथ भारत, रूस, अमेरिका और चीन के बाद ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोग्राम वाला दुनिया का चौथा देश बनने के और करीब पहुंच जाएगा।

11) स्पेस इंडस्ट्री में भारत कैसे आगे निकला?

रिकॉर्ड सैटैलाइट छोड़े। इसरो जो सैटेलाइट तैयार करता है, उसकी लागत कम होती है। इस वजह से वह ग्लोबल स्पेस इंडस्ट्री में आगे निकल रहा है। किसी हॉलीवुड मूवी की लागत से कम खर्च में भारत ने मंगल पर अपना मिशन भेज दिया था। इसरो कई करोड़ डॉलर के स्पेस लॉन्चिंग मार्केट में पकड़ मजबूत कर चुका है।

GSAT-11 को भी इसी साल छोड़ा जाएगा

इसरो के चेयरमैन किरण कुमार ने बताया कि GSAT-19 के बाद GSAT-11 को भी छोड़ा जाएगा। ये दो सैटेलाइट गेम चेंजर माने जा रहे हैं। कम्युनिकेशन में ये क्रांतिकारी बदलाव होगा। इनकी लॉन्चिंग डिजिटल इंडिया की दिशा में बेहद अहम कदम होगा। ये हाई स्पीड इंटरनेट सर्विस मुहैया कराने के साथ ही कम्युनिकेशन को असरदार बनाने में अहम रोल निभाएंगे। - स्पेस एप्लिकेशन सेंटर, अहमदाबाद के डायरेक्टर तपन मिश्रा ने बताया कि अगर यह लॉन्चिंग सफल रही तो अकेला GSAT-19 सैटेलाइट स्पेस में पहले से मौजूद पुराने किस्म के 6-7 कम्युनिकेश सैटेलाइट के ग्रुप के बराबर होगा। आज स्पेस में मौजूद 41 भारतीय सैटेलाइट्स में से 13 कम्युनिकेशन सैटेलाइट हैं। - मिश्रा के मुताबिक, इसे साल के आखिर में GSAT-11 छोड़ा जाएगा। इन दोनों सैटेलाइट के काम शुरू करते ही हाई क्वालिटी इंटरनेट, फोन और वीडियो सर्विस मिलनी शुरू हो जाएगी। स्पेस में पहले से मौजूद GSAT सैटेलाइट्स का प्रभावी डाटा रेट एक गीगाबाइट प्रति सेकंड है, जबकि GSAT-19 प्रति सेकंड 4 गीगाबाइट डाटा और GSAT-11 तेरह गीगाबाइट प्रति सेकंड की दर से डाटा ट्रांसफर करने के काबिल है।

दुनिया में कई ऐसे इलाके हैं जहां नये देश बनाने की मांग उठ रही है. आइए नजर डालते हैं दुनिया के सबसे नये नवेले देशों पर :

दक्षिणी सूडान

दक्षिणी सूडान दुनिया का सबसे नया देश है, जिसने 9 जुलाई 2011 को सूडान से आजादी का एलान किया. लेकिन आजादी के बाद से इस देश का सफर अच्छा नहीं रहा. तेल के संसाधनों से मालामाल साउथ सूडान गरीबी और सूखे का शिकार है. इसके अलावा राजनीतिक अस्थिरता और गृह युद्ध ने भी इस देश को उबरने नहीं दिया है.

कोसोवो

कोसोवो ने एकतरफा तौर पर 17 फरवरी 2008 को सर्बिया से आजादी की घोषणा की. सर्बिया के साथ साथ रूस ने भी इस कदम का विरोध किया. कोसोवो को अमेरिका और यूरोपीय संघ के बड़े देशों ने मान्यता दे दी है लेकिन अभी तक वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं है.

मोंटेनेग्रो और सर्बिया

1991 में यूगोस्लाविया के विघटन के बाद सर्बिया और मोंटेनेग्रो के नाम से एक देश की स्थापना हुई. लेकिन 2006 में उसका बंटवारा हो गया. मोंटेनेग्रो और सर्बिया दो अलग अलग देश बन गए. अलग होने की शुरुआत मोंटेनेग्रो ने की और 21 मई 2006 को एक जनमत संग्रह कराया. इसमें 55 प्रतिशत लोगों ने सर्बिया से अलग होने के हक में फैसला दिया.

पूर्वी तिमोर

पूर्वी तिमोर को अब तिमोर लेस्ते के नाम से जाना जाता है. उसे 20 मई 2002 को इंडोनेशिया से आजादी मिली. हालांकि इंडोनेशिया से अलग होने का फैसला पूर्वी तिमोर के लोग एक जनमत संग्रह में कई साल पहले ही कर चुके थे. जनमत संग्रह के बाद इलाके में हिंसा भड़क उठी. इंडोनेशिया समर्थक चरमपंथियों ने लोगों पर हमले किए, जिसके बाद वहां संयुक्त राष्ट्र बलों को तैनात करना पड़ा था.

पालाऊ

पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित पालाऊ 250 द्वीपों में फैला हुआ है, जिसकी आबादी 21 हजार से भी कम है. इसे एक अक्टूबर 1994 को आजादी मिली. हालांकि सांस्कृतिक और भाषाई अंतरों को देखते हुए पालाऊ ने इससे 15 साल पहले ही माइक्रोनेशिया से अलग होने का फैसला कर लिया था. संपन्न पर्यटन उद्योग के कारण उसे प्रशांत क्षेत्र के अमीर देशों में गिना जाता है.

एरिट्रिया

संयुक्त राष्ट्र ने 1952 में एरिट्रिया को इथियोपिया में एक स्वायत्त क्षेत्र के तौर पर स्थापित किया. लेकिन सम्राट हेले सेलासी ने 1962 में इसे पूरी तरह अपने राज्य का हिस्सा बना लिया. इससे वहां गृह युद्ध छिड़ गया जो 30 साल चला. लेकिन 1991 में इरीट्रियन पीपल्स लिबरेशन फ्रंट ने इथियोपिया की सेना को वहां से भगा दिया और दो साल बाद 1993 में आजादी की घोषणा की.

चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया

एक जनवरी 1993 को चेकोस्लोवाकिया को संसद ने भंग कर दिया और नतीजतन में दो अलग अलग देश अस्तित्व में आये. चेक गणराज्य और स्लोवाकिया. एक पार्टी वाले कम्युनिस्ट शासन को खत्म करने वाली "वेलवेट क्रांति" के बाद यह "वेलवेट डायवोर्स" था. दोनों ही देश अब यूरोपीय संघ का हिस्सा है जबकि स्लोवाकिया ने तो यूरो को भी अपना लिया है.

नामीबिया

अफ्रीकी देश नामीबिया 1990 तक दक्षिण अफ्रीका का हिस्सा था. कभी जर्मनी का उपनिवेश रहे नामीबिया पर पहले विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण अफ्रीका ने कब्जा कर लिया था. लेकिन 21 मार्च 1990 को यह दक्षिण अफ्रीका से आजाद हो गया. इसकी आजादी के लिए 20 साल तक साउथ वेस्ट अफ्रीका पीपल्स ऑर्गेनाइजेशन नाम के गुट ने छापामार अभियान चलाया था.

जल्द ही वैज्ञानिक पृथ्वी की सबसे बड़ी दूरबीन की मदद से ब्रह्मांड की गहराई में झांक सकेंगे. लंबी और मुश्किल प्लानिंग के बाद यूरोपियन सदर्न ऑब्जरवेट्री ने दूरबीन निर्माण का काम शुरू किया है. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चला तो ईएलटी (एक्सट्रीमली लार्ज टेलिस्कोप) 2024 से काम करने लगेगा.

ईएलटी में 39 मीटर व्यास के पांच विशाल दर्पण लगे हैं. फिलहाल जो सबसे बड़ी दूरबीन है, उसके लेंस का व्यास मात्र 10 मीटर है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नई दूरबीन कितनी ताकतवर होगी.

ईएलटी में दो आधुनिक स्पेक्ट्रोग्राफ लगे हैं. एडेप्टिव ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी से लैस दूरबीन वायुमंडल की हलचल को नजरअंदाज करते हुए ब्रह्मांड का नजारा दिखाएगी. इसके दर्पण एक सेकेंड में सैकड़ों बार पोजिशन बदल सकते हैं.

ईएलटी से मिलने वाली तस्वीरें हब्बल टेलिस्कोप के मुकाबले 15 गुना ज्यादा शार्प होंगी. इंसान की आंख के मुकाबले यह 1,000 गुना ज्यादा रोशनी को खीचेंगी. वैज्ञानिकों का दावा है कि ईएलटी की मदद से 400 साल बाद ब्रह्मांड के क्षेत्र में इंसान को क्रांतिकारी जानकारियां मिलेंगी.

यूरोपियन सदर्न ऑब्जरवेटरी की इस विशाल दूरबीन को बनाने के लिए 16 देश साथ आए हैं. पहले चरण में ही एक अरब यूरो का खर्च आएगा. दूरबीन की क्षमता को बढ़ाने के लिए इन्हें अटाकामा रेगिस्तान के सेरो आर्माजोनास पहाड़ पर बनाया जा रहा है. दूरबीन समुद्र तल से 3,048 मीटर ऊपर होगी.

धरती के अलावा क्या कहीं और जीवन मौजूद है? सदियों से इंसान इस सवाल का जवाब खोजना चाहता है. सुपर टेलिकोस्प इसका जबाव खोजने में मदद करेगा. यह सौर मंडल के बाहर मौजूद ग्रहों के बारे में भी बारीक जानकारी मुहैया कराएगी.

ब्रह्मांड में मौजूद आकाशगंगाएं और उन्हें निगलते ब्लैक होल. ईएलटी के जरिये यह भी पता चलेगा कि आकाशगंगाएं कैसे बनती हैं. ईएलटी की मदद से मिले डाटा को सुपर कंप्यूटर्स पर प्रोसेस करने से ब्लैकहोल और आकाशगंगाओं के भविष्य की गणना भी मुमकिन हो सकेगी.

सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम किसानों के लिए शुरू की गयी एक क्रांतिकारी योजना है जिससे किसानों की खेती और उपज पर काफी फर्क पड़ रहा है। इससे फसल की  उत्पादकता में वृद्धि हो रही है और खेती की लागत कम हो रही है। इस स्कीम का शुभारंभ माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़, राजस्थान में किया गया था। सॉयल हेल्थ कार्ड मिट्टी के पोषक तत्वों की स्थिति एवं और मिट्टी की उर्वरकता में सुधार के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले पोषक तत्वों की उचित मात्रा की सिफारिश की जानकारी किसानों को प्रदान करता है। इससे किसानों को खेत की मिट्टी की प्रकृति की जानकारी भी मिलती  है।

इसके बाद किसान उसी अनुसार खेत में उर्वरक और अन्य रसायन डालता है। इससे लागत में कमी आती है और उत्पादन में वृद्धि होती है।  सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम के पहले 2 वर्षीय चक्र (2015-17) में अभी तक 2.53 करोड़ लक्षित नमून एकत्र किए जा चुके  हैं एवं 93% नमूने परीक्षित किए जा चुके हैं। राज्य सरकारों द्वारा लगभग 14 करोड़ सॉयल हेल्थ कार्ड बनाए जा रहे हैं जिसमें 31 मई तक 8 करोड़ किसानों को कार्ड वितरित किए जा चुके हैं। अगले तीन माह में शेष सभी किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड उपलब्ध करा दिए जाएंगे। देश में अब तक सॉयल हेल्थ कार्ड के इस्तेमाल से काफी अच्छे परिणाम आए हैं।

16 राज्यों के 136 जिलों के किसानों से आई प्रतिक्रिया निम्नलिखित तथ्य दर्शाती है:-

1) नाइट्रोजन उर्वरकों के उपयोग में कमी आयी है और फॉस्फोरस पोटाश और सूक्ष्मपोषक तत्वों के उपयोग में बढ़ोतरी हुई  है।

2) धान में 16% से 25%,  दालों और तिलहनों में 10% से 15% खेती की लागत में कमी की सूचना मिली है।

3) धान में 10% से 22%, गेहूं और ज्वार में 10% से 15%, दालों में 10% से 30% और तिलहन में 35% से 66% की उत्पादन वृद्धि दर्ज की गयी है।

चीन की महत्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट वन रोड' (ओबीओआर) योजना ने विश्व का ध्यान तो अपनी ओर खींच ही रखा है, खासकर चीन के पड़ोसी देश इसकी ओर बहुत ललचाई नजरों से देख रहे हैं. उन्हें लगता है कि जब 900 अरब डॉलर की इतनी बड़ी धनराशि खर्च की जाएगी तो उसका कुछ न कुछ हिस्सा तो सभी को मिलेगा.

बीजिंग में सम्पन्न हुए दो-दिवसीय बेल्ट एंड रोड फोरम (बीआरएफ) में भूटान को छोड़ कर भारत के सभी पड़ोसी देश इकट्ठा हुए, लेकिन भारत इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अनुपस्थित रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के आलोचक इसे विदेशनीति के मोर्चे पर सरकार की एक और विफलता बता रहे हैं क्योंकि भारत इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ गया है, लेकिन वहीं कुछ अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अभी भी इस योजना से लाभ उठा सकता है, बशर्ते वह अपने पत्ते सोच-समझकर खेले.

इस परियोजना का एक हिस्सा चीन और यूरेशिया के बीच सड़क एवं रेल संपर्क स्थापित करना है और दूसरा हिस्सा चीन को सामुद्रिक रास्तों के जरिये दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया एवं अफ्रीका के पूर्वी तट पर स्थित बंदरगाहों से जोड़ना है. यदि वह इस प्रयास में सफल हो जाता है, तो इस परियोजना के अंतर्गत स्थापित व्यापारिक संपर्कों के तहत दुनिया की 65 प्रतिशत आबादी, एक-तिहाई वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और विश्व अर्थव्यवस्था की समस्त वस्तु एवं सेवाओं का एक-चौथाई हिस्सा आ जाएगा.

दिलचस्प बात यह है कि जहां अमेरिका, विकसित यूरोपीय देश और रूस इस परियोजना में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं, वहीं चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के मुद्दे पर विरोध जता कर भारत ने इससे किनारा कर लिया है. यह कॉरिडोर जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्र में से होकर गुजरता है जिस पर भारत का दावा है.

लेकिन सी. राजामोहन जैसे विदेशनीति के जानकार इसमें भी सकारात्मक तत्व देख रहे हैं. उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर विवाद में असल में भारत और पाकिस्तान---ये दो पक्ष ही नहीं हैं. इसमें चीन शुरू से ही एक पक्ष रहा है लेकिन भारत इस तथ्य की अनदेखी करता रहा है. चीन ने आर्थिक कॉरिडोर में भागीदारी के लिए भारत को भी आमंत्रित किया है. भारत को इस पेशकश को स्वीकार करके देखना चाहिए कि चीन और पाकिस्तान इस मामले में कितने ईमानदार हैं. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के सामरिक महत्व को पूरी तरह से इस्तेमाल करके भारत चीन की सामुद्रिक महत्वाकांक्षाओं का सामना कर सकता है. भारत ने हमेशा अपने सीमांत प्रदेशों के महत्व को नजरंदाज किया है और इसका खामियाजा भी भुगता है. चीन की ओबीओआर परियोजना इन सीमांत प्रदेशों में उसकी स्थिति को और भी अधिक कमजोर कर सकती है यदि उसने अभी से वहां के ढांचागत विकास पर ध्यान नहीं दिया.

इस परियोजना ने भारत को नींद से जगाने का काम किया है वरना अचानक मोदी सरकार की ओर से उन परियोजनाओं की शिनाख्त न की जाती जो बरसों से उपमहाद्वीप का पड़ोसी देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया और खाड़ी के देशों के साथ कनेक्टिविटी यानी सड़क, रेल, जलमार्ग और वायुमार्ग द्वारा संपर्क बढ़ाने के लिए चल रही हैं. लगता है अब उन्हें समाप्त करने पर सरकार विशेष ध्यान देने वाली है.

मोदी सरकार के आलोचकों का कहना है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडॉर पर उसका आपत्ति करना बिलकुल उचित था लेकिन इस आधार पर उसे दो-दिवसीय सम्मेलन का बहिष्कार नहीं करना चाहिए था और उसमें भाग लेकर वहां अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने अपनी बात रखनी चाहिए थी. चीन पाकिस्तान के ग्वादर बन्दरगाह और श्रीलंका के हमबंटोटा बन्दरगाह के साथ सीधे जुड़कर अपनी सामुद्रिक शक्ति में कई गुना वृद्धि करने वाला है. ऐसे में भारत को अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी. अलग-थलग पड़ जाना उसके हित में नहीं है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमरीका पेरिस समझौते से बाहर निकल जाएगा. उन्होंने कहा कि वो नए सिरे से एक नया समझौता करेंगे जिसमें अमरीकी हितों की रक्षा उनका मकसद होगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि वो एक ऐसा समझौता करना चाहेंगे जो अमरीका के औद्योगिक हितों की रक्षा करता हो और लोगों की नौकरियां बचाता हो. पिछले साल राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने मतदाताओं से चुनाव जीतने पर अमरीका को जलवायु परिवर्तन समझौते से बाहर करने का वादा किया था. मैं एक ऐसा समझौता करना चाहूंगा जो अमरीका के औद्योगिक हितों की रक्षा करे और लोगों की नौकरियां बचाता हो.

पेरिस समझौता ऐसा उदाहरण है जब वॉशिंगटन ने दूसरे देशों के फ़ायदे के लिए अमरीका के हितों को नुकसान पहुंचाया. अमरीका आज से ही गैर बाध्यकारी पेरिस समझौते को लागू करना बंद कर देगा. हम नहीं चाहते कि दुनिया के नेता और देश हम पर हंसे. वो अब हम पर नहीं हंसेगे. मैं पीट्सबर्ग के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया हूं न कि पेरिस का प्रतिनिधित्व करने के लिए. मैंने वादा किया था कि मैं हर उस समझौते को तोड़ दूंगा या फिर से बातचीत करूंगा जो अमरीका के हितों का ध्यान नहीं रखता है.

क्या है पेरिस समझौता?

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग का मतलब है उद्योगों और कृषि कार्यों से उत्सर्जित होने वाली गैसों से पर्यावरण पर होने वाले नकारात्मक और नुक़सानदेह असर. पेरिस समझौते का मक़सद गैसों का उत्सर्जन कम कर दुनियाभर में बढ़ रहे तापमान को रोकना था. वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना और कोशिश करना कि वो 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न बढ़े. मानवीय कार्यों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को इस स्तर पर लाना की पेड़, मिट्टी और समुद्र उसे प्राकृतिक रूप से सोख लें. इसकी शुरुआत 2050 से 2100 के बीच करना.हर पांच साल में गैस उत्सर्जन में कटौती में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करना. विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्तीय सहायता के लिए 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष देना और भविष्य में इसे बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता.

अमरीकी भूल चीन के लिए मौक़ा

पेरिस जलवायु समझौते के दौरान अमरीका और चीन के बीच अहम सहमति बनी थी. अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसमें बड़ी भूमिका अदा की थी. चीन इस बात को दोहरा रहा है वह पेरिस जलवायु करार के साथ खड़ा है. अमरीका के पीछे हटने और पेरिस जलवायु करार पर प्रतिबद्धता जताने के लिए चीन के साथ यूरोपियन यूनियन शनिवार को बयान जारी करने वाला है. ईयू के क्लाइमेट कमिश्नर मिगल अरिआस ने कहा, ''पेरिस जलवायु करार से किसी को भी पीछे नहीं हटना चाहिए. हमने और चीन ने इसके साथ चलने का संकल्प लिया है. ''बढ़ते तापमान की चुनौती का सामना करने के लिए कनाडा और मेक्सिको भी अहम भूमिका अदा कर सकते हैं.

कोल ईंधन की होगी वापसी

दूसरे विकसित देशों की तरह अमरीका भी कोयले के ईंधन से दूर हट चुका है. ब्रिटेन साल 2025 तक कोयले से बिजली पैदा करना पूरी तरह से बंद कर देगा. अमरीका के कोयला उद्योग में अब नौकरी सौर ऊर्जा के मुकाबले आधी बची है. दूसरी तरफ़ विकासशील देश अब भी बिजली के मामले में कोयले पर निर्भर हैं. यहां बिजली का प्राथमिक स्रोत कोयला है. ऊर्जा के दूसरे स्रोतों की कीमतों में कमी के कारण उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश उस तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं. भारत में हाल की एक नीलामी में सौर ऊर्जा की कीमत कोयले से उत्पादित होने वाली बिजली के मुकाबले 18 फ़ीसदी कम रही.

अमेरिका का यह रुख मोदी सरकार की नाकामी को जाहिर करता

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से हटते हुए भारत को भी आड़े हाथ लिया और उस पर अरबों खरबों डॉलर मांगने का आरोप लगाया. कुलदीप कुमार का कहना है कि अमेरिका का यह रुख मोदी सरकार की नाकामी को जाहिर करता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का आधे से अधिक कार्यकाल पूरा हो चुका है और अब उसके पास योजनाओं को पूरा करने के लिए केवल दो साल बचे हैं. विदेश नीति को विदेश मंत्री और उनके मंत्रालय के हाथ से लेकर स्वयं प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय द्वारा चलाये जाने के नतीजे सुखद और सकारात्मक नहीं रहे हैं. अभी तक शायद किसी भी प्रधानमंत्री ने इतने विदेश दौरे नहीं किए, जितने मोदी कर चुके हैं लेकिन केवल वहां रहने वाले भारतीयों या भारतीय मूल के लोगों को प्रभावित करने के अलावा इन दौरों की अन्य कोई विशेष उपलब्धि सामने नहीं आ पायी है.

अब विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजातरीन बयान ने भारतीय विदेश नीति की विफलता को सरेआम उजागर कर दिया है. ट्रंप ने आरोप लगाया है कि पर्यावरण की रक्षा और कार्बन डाइऑक्साइड गैस के उत्सर्जन को कम करने के नाम पर भारत अरबों-खरबों डॉलर की मांग करता है और पेरिस समझौता भारत और चीन के पक्ष में झुका हुआ है. इसलिए अमेरिका इस समझौते से बाहर हो जाएगा.

भारत के लिए यह एक बहुत बड़ा झटका है. हालांकि अब चीन ने कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है, लेकिन अब भी वह 28 यूरोपीय देशों द्वारा कुल मिलाकर किए जाने वाले उत्सर्जन से अधिक गैस छोड़ रहा है. भारत का उत्सर्जन अमेरिका के उत्सर्जन के आधे से भी अधिक कम है जबकि उसकी जनसंख्या अमेरिका के मुकाबले चार गुना अधिक है. लेकिन ट्रंप और उनके सलाहकारों का मानना है कि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का स्तर कम करने से अमेरिका के औद्योगिक विकास पर असर पड़ेगा और उसके यहां रोजगार में कमी आएगी.

चेनानी-नाशरी सुरंग जिसे पत्नीटॉप सुरंग के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 (राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या पुनः निर्धारण से पूर्व नाम राष्ट्रीय राजमार्ग 1ए ) पर स्थित एक सड़क सुरंग है। इसका कार्य वर्ष 2011 में आरम्भ हुआ तथा उद्धघाटन 2 अप्रैल 2017 को किया गया।

यह भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग है जिसकी लंबाई 9.28 कि.मी. (5.8 मील) है। सुरंग बनाने पर मूल अनुमानित लागत ₹ 2,520 करोड़ (यूएस $ 367.92 मिलियन) थी लेकिन परिवर्धित करने में कुल ₹ 3,720 करोड़ (यूएस $ 543.12 मिलियन) खर्च हुये। मुख्य सुरंग का व्यास 13 मीटर है, जबकि समानांतर निकासी सुरंग का व्यास 6 मीटर है। मुख्य और निकासी सुरंगों में 29 स्थानों पर पार मार्ग बनाये गये हैं जो हर 300 मीटर की दूरी पर स्थिति हैं। यह देश की पहली पूर्ण रूप से एकीकृत सुरंग प्रणाली वाली सुरंग है।

सुरंग की सहायता से जम्मू और श्रीनगर के मध्य दूरी 30.11 कि.मी. (18.7 मील) रह गयी और यात्रा समय में दो घण्टे की कटौती हो गयी। पत्नीटॉप पर सर्दियों में बर्फबारी और हिमस्खलन के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर बाधा उत्पन्न होती थी तथा प्रत्येक शीतकाल में कई बार वाहनों की लम्बी कतार के कारण भी बाधा उत्पन्न होती थी - कई बार कई दिनों तक कतार में रहना पड़ता था। सुरंग पत्नीटॉप, कुद और बटोत को उपमार्गों से जोड़ती है जिससे राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर सर्दियों में ट्रैफ़िक जाम की समस्या को कम किया है।

1. सुरंग निचले हिमालय परास में स्थिति है जिसकी ऊँचाई 1200 मीटर है।

2. चेनानी-नाशरी सुरंग को आस्ट्रिया की नई सुरंग प्रौद्योगिकी से बनाया गया है। इसमें सुरक्षा के कई प्रावधान हैं। सभी का संचालन एक सॉफ्टवेयर से होता है।

3. इस परियोजना को बनाने का टेंडर एनएचआई के साथ आईएल एंड एफएस को मिला था।

4. यह सुरंग जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग को चार लेन का करने की परियोजना का हिस्सा है। जम्मू-श्रीनगर के बीच यात्रा की अवधि घटाने के लिए बारह ऐसी ही और सुरंग परियोजनाओं का निर्माण हो रहा है।

5. यह सुरंग ऊधमपुर जिले के चेनानी और रामबन जिले के नाशरी के बीच की 41 किलोमीटर की दूरी को घटाकर 10.89 किलोमीटर कर देगी और यह फासला महज दस मिनट में पार कर लिया जाएगा। अभी इसमें ढाई घंटे लगते हैं।

6. जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग को राज्य की जीवन रेखा माना जाता है।

7. सभी 12 सुरंगों का निर्माण पूरा होने के बाद जम्मू एवं श्रीनगर के बीच की 293 किलोमीटर की दूरी में से 62 किलोमीटर घट जाएंगे। यह 231 किलोमीटर की दूरी चार-साढ़े चार घंटे में तय कर ली जाएगी।

8. इस सुरंग की बेहद खास बात हर 150 मीटर पर एक आपातकालीन एसओएस कॉल बॉक्स और बाहर निकलने के लिए बचाव के रास्ते का होना है। इस रास्ते से होकर मुसाफिर सुरक्षा सुरंग तक जा सकेंगे जो इस मुख्य सुरंग के समानांतर बनाई गई है।

9. राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) ने फैसला किया है कि जम्मू एवं कश्मीर में लेह और श्रीनगर के बीच बनने वाली 14 किलोमीटर लंबी जोजी ला सुरंग को इसी तकनीक से बनाया जाएगा।

केंद्र की नरेंद्र मोदी कैबिनेट ने बुधवार19.04.2017 को वीवीआईपी कल्चर के खिलाफ एक बड़ा फैसले लिया है. आने वाली 1 मई से अब सिर्फ 5 लोग ही लाल बत्ती का इस्तेमाल कर पाएंगे. अब सिर्फ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और लोकसभा स्पीकर ही लाल बत्ती का इस्तेमाल कर सकेंगे. केंद्र की नरेंद्र मोदी कैबिनेट ने बुधवार को वीवीआईपी कल्चर के खिलाफ एक बड़ा फैसले लिया है. आने वाली 1 मई से अब सिर्फ 5 लोग ही लाल बत्ती का इस्तेमाल कर पाएंगे. अब सिर्फ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और लोकसभा स्पीकर ही लाल बत्ती का इस्तेमाल कर सकेंगे.

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में वीवीआईपी कल्चर को दरकिनार कर सामान्य ट्रैफिक में लोककल्याण मार्ग से लेकर दिल्ली एयरपोर्ट कर का सफर तय किया था. भारत दौरे पर आई बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शुक्रवार (7 अप्रैल) को भारत पहुंची, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ही उनकी अगुवानी करने पहुंच गये थे.

पीएम मोदी बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के स्वागत के लिये प्रोटोकॉल के विपरीत आईजीआई हवाईअड्डा पर खुद पहुंचे थे. इस दौरान उनके साथ सिर्फ ड्राइवर और एक एसपीजी कमांडो ही साथ थे.

आजादी के करीब 70 साल बाद भारत की पहली मेड इन इंडिया ट्रेन 18.03.2017 से चलनी शुरू. रेलमंत्री सुरेश प्रभु मुंबई में ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे. भारत की स्वदेशी ट्रेन का नाम 'मेधा' रखा गया है. अपनी पहली यात्रा में मेधा ट्रेन ने मुंबई के चर्चगेट से लोकमान्य तिलक टर्मिनस (एलटीटी) तक की यात्रा की.

इससे पहले 'मेधा' ट्रेन का कई चरण में सफल ट्रायल किया जा चुका है. इस ट्रेन को कमिश्नर ऑफ रेल सेफ्टी (सीआरएस) की स्वीकृति मिल चुकी है. 

भारत की स्वदेशी ट्रेन में कई ऐसी खूबियां हैं जो उसे दुनिया के कई ट्रेनों से उसे अगल बनाती है. इस ट्रेन में एक साथ 6,050 यात्री यात्रा कर सकते हैं. इसमें 1,168 सीटे हैं. इस ट्रेन की स्पीड 110 किमी प्रति घंटा है.

इस ट्रेन में फ्रेश एयर कूलिंग क्षमता 16,000 प्रति घंटा मीटर क्यूबिक है. रिजेनरेटड ब्रेकिंग सिस्टम युक्त यह रेक 30 से 35 प्रतिशत बिजली परिचालन के दौरान बचा सकती है. रेलवे अधिकारी के मुताबिक मेड-इन-इंडिया ट्रेन 'मेधा' को बनाने में लगभग 43.23 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं. जबकि विदेश से खरीदी जाने वाली बॉम्बार्डियर ट्रेन की कीमत 44.36 करोड़ रुपए है.

मेक इन इंडिया के तहत देश की पहली स्वदेशी लोकल 'मेधा' हैदराबाद मेधा सर्वो ड्राइव्स फर्म की ओर से प्रायोजित है और चेन्नई कोच फैक्ट्री में तैयार किया गया है. वर्तमान में मध्य और पश्चिम रेल पर परिचालित होने वाली लोकल चैन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ) में तैयार होती है. इन लोकल ट्रेनों में इलेक्ट्रिक तकनीकी समेत अन्य तकनीकी संबंधी काम सीमेंस और बॉम्बार्डियर कंपनियों की देख रेख में होता है. ये कंपनियां विदेशी है.

संसद के बजट सत्र के दूसरा चरण चल रहा है. 14.03.2017 को लोकसभा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह शत्रु संपत्ति संशोधन बिल को पेश करेंगे. इसको लेकर बीजेपी ने अपने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर सदन में मौजूद रहने को कहा है.

राज्यसभा करीब 50 साल पुराने शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन संबंधित बिल को पास कर चुका है. इस बिल में युद्ध के बाद पाकिस्तान और चीन पलायन कर गए लोगों की तरफ से छोड़ी गई संपत्ति पर उत्तराधिकार के दावों को रोकने के प्रावधान किए गए हैं. विभाजन या युद्ध के बाद गए लोगों की छूटी प्रॉपर्टी के दावों से निपटने के प्रावधान हैं. इसके मुताबिक पलायन करके वहां की नागरिकता लेने वाले लोगों की संपत्ति जब्त कर ली जाएगी.

भारत में रह रहे उत्तराधिकारियों का भी उनकी छूटी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहेगा. संशोधनों से ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोगों के प्रभावित होने से ये मामला विवाद में भी है. संसद से पारित होने के बाद यह बिल इस संबंध में सरकार की तरफ से जारी किए गए ऑर्डिनेंस का स्थान लेगा.

48 साल पुराने इस एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट बिल को को राज्यसभा से पास कर दिया गया. हालांकि राज्यसभा में विपक्ष की गैरमौजूदगी में ये बिल पास किया गया था. राज्यसभा में लंबित रहने की वजह से सरकार को इसके लिए पांच बार ऑर्डिनेंस लाना पड़ा था.

विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने यह बिल राज्यसभा में धोखे से पास कराया है. विपक्ष की मांग थी कि इस विधेयक पर आज चर्चा नहीं की जाए और अगले सप्ताह इस पर व्यापक चर्चा की जाए जब सदन में ज्यादातर सदस्य मौजूद हो.

सरकार ने कैसे पास किया बिल : उस समय सदन में मौजूद सदस्यों की संख्या कम थी और कांग्रेस के एक सदस्य ने कोरम का मुद्दा भी उठाया. हालांकि उपसभापति कुरियन ने गणना प्रकिया पूरी किए जाने के बाद कहा कि सदन में कोरम मौजूद है. बाद में सरकार के इस विधेयक के पारित कराने पर जोर दिए जाने पर कांग्रेस, वाम, तृणमूल सहित विभिन्न विपक्षी दलों के सदस्यों ने सदन से वाकआउट किया था.

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 भारत सरकार द्वारा अधिसूचित एक कानून है जिसके माध्यम से भारत सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश में जनसाधारण को खाद्यान्न उपलब्ध हो सके।

भारतीय संसद द्वारा पारित होने के उपरांत सरकार द्वारा 10 सितम्‍बर, 2013 को इसे अधिसूचित कर दिया गया।

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उद्देश्‍य लोगों को सस्‍ती दर पर पर्याप्‍त मात्रा में उत्‍तम खाद्यान्‍न उपलब्ध कराना है ताकि उन्हें खाद्य एवं पोषण सुरक्षा मिले और वे सम्‍मान के साथ जीवन जी सकें।

मुख्य प्रावधान

इस कानून के तहत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 75 प्रतिशत तक तथा शहरी क्षेत्रों की 50 प्रतिशत तक की आबादी को रियायती दरों पर खाद्यान्‍न उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इस प्रकार देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्‍या को इसका लाभ मिलने का अनुमान है। पात्र परिवारों को प्रतिमाह पांच कि. ग्रा. चावल, गेहूं व मोटा अनाज क्रमशः 3, 2 व 1 रुपये प्रति कि. ग्रा. की रियायती दर पर मिल सकेगा। अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) मे शामिल परिवारों को प्रति परिवार 35 कि. ग्रा. अनाज का मिलना पूर्ववत जारी रहेगा। इसके लागू होने के 365 दिन के अवधि के लिए, लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएम) के अंतर्गत‍ सब्सिडीयुक्‍त खाद्यान्‍न प्राप्‍त करने हेतु, पात्र परिवारों का चयन किया जाएगा। गर्भव‍ती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं को गर्भावस्‍था के दौरान तथा प्रसव के छ: माह के उपरांत भोजन के अलावा कम से कम 6000 रुपये का मातृत्‍व लाभ भी मिलेगा।

14 वर्ष तक की आयु के बच्‍चे पौष्टिक आहार अथवा निर्धारित पौष्टिक मानदण्‍डानुसार घर राशन ले जा सकें।खाद्यान्‍न अथवा भोजन की आपूर्ति न हो पाने की स्थिति में, लाभार्थी को खाद्य सुरक्षा भत्‍ता दिया जाएगा। इस अधिनियम के जिला एवं राज्‍यस्‍तर पर शिकायत निवारण तंत्र स्‍थापित करने का भी प्रावधान है।

पारदर्शिता एवं उत्‍तरदायित्‍व सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्‍यक प्रावधान किए गए हैं।

नेशनल स्किल्स क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) अर्थात् राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क ज्ञान, कौशल और अभिरुचि के अनेक स्तरों के अनुसार योग्यताएं निर्धारित करता है. इन स्तरों को सीखने के परिणामों के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है, जो प्रशिक्षार्थी को अवश्य हासिल करने होते हैं, भले ही ये कौशल उसने औपचारिक या अनौपचारिक प्रशिक्षण के जरिए हासिल न किए हों. इस अर्थ में एनएसक्यूएफ एक गुणवत्ता आश्वासन फ्रेमवर्क है. अत: यह एक राष्ट्रीय एकीकृत शिक्षा और योग्यता आधारित कौशल फ्रेमवर्क है, जो व्यावसायिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, सामान्य शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के रूप में समानांतर और शीर्षवत दोनों ही दिशाओं में अधिसंख्य मार्ग प्रदान करेगा. इस तरह यह फ्रेमवर्क सीखने के एक स्तर को अन्य उच्चतर स्तर के साथ भी जोड़ेगा. इससे कोई व्यक्ति वांछित सक्षमता स्तर हासिल कर सकेगा, व्यवसाय बाजार में प्रवेश कर सकेगा और अवसर पाकर अपनी सक्षमताओं को उन्नत बनाने के लिए अतिरिक्त कौशल हासिल कर सकेगा.

एनएसक्यूएफ के मुख्य तत्व इस प्रकार हैं:-

क)विभिन्न स्तरों पर कौशल प्रवीणता और सक्षमताओं की पहचान के लिए राष्ट्रीय सिद्धांत निर्धारित करना ताकि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के समकक्ष बनाया जा सके.

ख)व्यावसायिक शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, सामान्य शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और व्यवसाय बाजार में प्रवेश करने और बाहर आने के अधिसंख्य अवसर प्रदान करना.

ग)कौशल योग्यता फ्रेमवर्क के भीतर प्रगति मार्ग निर्धारित करना.

घ)जीवन पर्यंत प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसरों को बढ़ावा देना.

ङ)उद्योग/नियोक्ताओं के साथ साझेदारी.

च) विभिन्न क्षेत्रों के बीच कौशल विकास के लिए एक पारदर्शी, जवाबदेह और भरोसेमंद व्यवस्था कायम करना.

छ)पहले सीखी गई चीजों को मान्यता देने की अधिक क्षमता कायम करना.

योग्यता फ्रेमवर्क स्कूलों, व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदाताओं, उच्चतर शिक्षा संस्थानों, प्राधिकरणों और उद्योग एवं उसके प्रतिनिधिक निकायों, संघों, व्यावसायिक असोसिएशनों और लाइसेंसिंग प्राधिकरणों के प्रत्यायन के लिए लाभदायक है. इस फ्रेमवर्क के सबसे बड़े लाभार्थियों में वे प्रशिक्षक शामिल हैं, जो फ्रेमवर्क में किसी विशेष स्तर पर किसी योग्यता के सापेक्षिक मूल्य का परीक्षण कर सकते हैं और उनकी व्यावसायिक प्रगति के मार्गों के बारे में विवेकपूर्ण निर्णय कर सकते हैं.

योग्यता फ्रेमवर्क संबंधी अंतर्राष्ट्रीय अनुभव

जानकारी पर आधारित शिक्षा से प्रशिक्षण परिणामों पर आधारित शिक्षा की दिशा में एक आदर्श परिवर्तन हो रहा है. परिणाम आधारित प्रशिक्षण का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जा रहा है. परिणाम आधारित प्रशिक्षण की दिशा में बदलाव कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं:-

क) यह पद्धति शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदाताओं की बजाय उसके इस्तेमालकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित करती है.

ख) किसी प्रशिक्षण प्र्रिक्रया के अंत में किसी प्रशिक्षार्थी से क्या जानने, समझने अथवा क्या करने की अपेक्षा की जाती है, यह स्पष्टीकरण प्रशिक्षार्थियों को इस बात को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है कि किसी पाठ्यक्रम विशेष में क्या प्रस्तावित किया गया है और इसका संबंध अन्य पाठ्यक्रमों और कार्र्यक्रमों के साथ कैसे जुड़ता है.

ग) यह योग्यताओं में पारदर्शिता बढ़ाता है और जवाबदेही सुदृढ़ करता है, जो अलग-अलग प्रशिक्षार्थियों और नियोक्ताओं के लिए लाभदायक है.

विश्व के औद्योगिक और विकासशील देशों में से अधिकतर अपनी योग्यताओं के फ्रेमवर्क में सुधार कर रहे हैं और साथ ही ऐसा फ्रेमवर्क तैयार कर रहे हैं, जिससे इन योग्यताओं को एक-दूसरे के साथ जोड़ा जा सके और समाज तथा श्रम बाजार में नई मांगें आमतौर पर पूरी की जा सकें. इन प्रणालियों के विकास को अक्सर उच्चतर शिक्षा, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण (टीवीईटी) और जीवन पर्यंत शिक्षा में हो रहे परिवर्तनों के साथ जोड़ा जाता है.

विश्वभर में अनेक देश योग्यता फ्रेमवर्क शुरू करने की प्रक्रिया में हैं. हालांकि सभी फ्रेमवर्कों के सैद्धांतिक मानदंड अधिकतर समान हैं, परंतु फ्रेमवर्क शुरू करने के लक्ष्य भिन्न हैं. चाहे शिक्षा और प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता और उनका लचीलापन बढ़ाने, पहले से प्राप्त किए गए प्रशिक्षण को आसानी से मान्यता प्रदान करने, जीवन पर्यंत प्रशिक्षण को बढ़ावा देने, योग्यता प्रणालियों की पारदर्शिता में सुधार लाने, उनकी साख बढ़ाने और उनके हस्तांतरण के लिए संभावनाएं पैदा करने या गुणवत्ता आश्वासन प्रणालियों का विकास करने, जैसे विषयों के लिए सरकारें निरंतर योग्यता फ्रेमवर्कों को सुधार के लिए एक नीतिगत साधन के रूप में अपना रही हैं.

भारत में योग्यता फ्रेमवर्क की आवश्यकता

भारत में सामान्य शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण पृथक दायरों में प्रचालित किए जा रहे हैं और दोनों के बीच परस्पर संबंध बहुत कम हैं. इससे व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण को अपनाने में युवाओं को संकोच होता है, क्योंकि यह समझा जाता है कि यह क्षेत्र सम्बद्ध व्यक्ति को उच्चतर डिग्रियां और योग्यताएं हासिल करने से रोकता है. व्यावसायिक शिक्षा से सामान्य शिक्षा और इसके विपरीत दिशा में गतिशीलता बढ़ाने के लिए, भारत के लिए एक योग्यता फ्रेमवर्क अर्थात् राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) आवश्यक है, जो योग्यताओं को अधिक समझने योग्य और पारदर्शी बनाने में मदद करेगा. एनएसक्यूएफ की आवश्यकता निम्नांकित अतिरिक्त कारणों से भी है:-

क) अभी तक शिक्षा और प्रशिक्षण का फोकस लगभग पूरी तरह जानकारी पर आधारित रहा है. एनएसक्यूएफ परिणाम आधारित दृष्टिकोण पर आधारित है और एनएसक्यूएफ में प्रत्येक स्तर सक्षमता के संदर्भ में निर्धारित और वर्णित किया जाता है, जो हासिल किया जाना अपेक्षित होता है. इनमें से प्रत्येक सक्षमता स्तर के समरूप व्यावसायिक भूमिकाओं का निर्धारण उद्योग की भागीदारी से, सम्बद्ध क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़) के जरिए किया जाता है.

ख) सीखने और आगे बढऩे के मार्ग, विशेषकर व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में, सामान्यत: अस्पष्ट या नदारद होते हैं. समानांतर गतिशीलता का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. एनएसक्यूएफ प्रगति के मार्गों को पारदर्शी बनाएगा ताकि संस्थान, विद्यार्थी और कर्मचारी स्पष्ट रूप से यह समझ सकें कि किसी विशेष पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते तथा योग्यताओं में असमानता और भेदभाव के मुद्दों का समाधान कैसे किया जा सकता है.

ग) संस्थानों के बीच विभिन्न योग्यताओं से सम्बद्ध परिणामों में एकरूपता का अभाव है. प्रत्येक संस्थान के पाठ्यक्रमों के बारे में पृथक अवधि, पृथक सिलेबस, भर्ती और पाठ्यक्रम के नाम के बारे में अलग-अलग जरूरतें हैं. इससे अक्सर देश के विभिन्न हिस्सों में प्रमाणपत्रों/डिप्लोमा/ डिग्रियों की समकक्षता कायम करने में समस्याएं आती हैं. इसका दुष्प्रभाव विद्यार्थियों की रोजगार सक्षमता और गतिशीलता पर पड़ता है.

घ)योग्यताओं की गुणवत्ता के विकास से व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण से सम्बद्ध नकारात्मक धारणा महत्वपूर्ण ढंग से दूर की जा सकती है, इससे डिग्रियों और डॉक्टोरेट उपाधियों सहित उच्चतर शिक्षा ग्रहण करने की भी अनुमति मिलती है.

ङ) लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है, जिन्होंने अनौपचारिक क्षेत्र में कौशल हासिल किया है, परंतु उनके पास अपने कौशल को दर्शाने के लिए आवश्यक औपचारिक प्रमाणपत्र नहीं हैं. सक्षमता आधारित और परिणाम आधारित योग्यता फ्रेमवर्क के रूप में एनएसक्यूएफ पूर्व प्रशिक्षण को मान्यता (आरपीएल) प्रदान करेगा, जिसका वर्तमान शिक्षा और प्रशिक्षण के परिप्रेक्ष्य में व्यापक अभाव है.

च) अधिसंख्य भारतीय योग्यताएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय योग्यताएं राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं हैं. इससे विद्यार्थियों और कार्मिकों के समक्ष समस्या पैदा होती है, क्योंकि उनकी अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता पर दुष्प्रभाव पड़ता है और उन्हें फिर से वह योग्यता प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम करना होता है, जो मेजबान देश में मान्यताप्राप्त हो. एनएसक्यूएफ सम्बद्ध द्विपक्षीय और बहुराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से भारतीय योग्यताओं को अंतर्राष्ट्रीय योग्यताओं के अनुरूप बनाने में मदद करेगा. अनेक देश पहले से ही योग्यता फ्रेमवर्कों के जरिए अपनी योग्यताओं को अंतर्राष्ट्रीय योग्यताओं के अनुरूप बनाने की प्र्रिक्रया में हैं.

छ)एनएसक्यूएफ में एकीकृत साख संचय और अंतरण प्रणाली, लोगों को उनके जीवन में विभिन्न स्तरों पर उनकी जरूरतों और सुविधा के अनुसार शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार के बीच गतिशील होने की अनुमति प्रदान करेगी. किसी भी विद्यार्थी के लिए यह संभव हो सकेगा कि वह शिक्षा क्षेत्र को छोड़ सके, उद्योग में कुछ व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सके और अपने चुने हुए व्यवसाय में उच्चतर प्रगति करने के लिए वापस आकर योग्यताएं प्राप्त करने के लिए अध्ययन कर सके.

एनएसक्यूएफ के लक्ष्य

एनएसक्यूएफ के उद्देश्यों में एक ऐसा फ्रेमवर्क उपलब्ध कराना शामिल है, जो:-

क)भारतीय शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली की विविधता को समायोजित कर सके.

ख)देशभर में स्वीकृत परिणामों के आधार पर योग्यताओं के प्रत्येक स्तर के लिए एक सेट का विकास कर सके.

ग)प्रगति के मार्गों के विकास और रखरखाव के लिए एक ऐसा ढांचा उपलब्ध करा सके, जो योग्यताओं तक पहुंच प्रदान करे और लोगों को इन क्षेत्रों और श्रम बाजार के बीच  विभिन्न शैक्षिक और प्रशिक्षण क्षेत्रों में शीघ्र एवं सुगम प्रवेश एवं वापसी की सुविधा प्राप्त करने में सहायता कर सके. 

घ)लोगों को यह विकल्प प्रदान कर सके कि वे अपने पूर्व प्रशिक्षण और अनुभवों के लिए मान्यताप्राप्त करते हुए शिक्षा और प्रशिक्षण के जरिए तरक्की कर सके.

ङ)शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय नियामक और गुणवत्ता आश्वासन प्रबंधों को नया आधार प्रदान कर सकें.

च)भारतीय योग्यताओं के महत्व और समतुल्यता को अधिक मान्यता देने के जरिए एनएफक्यूएस-अनुवर्ती योग्यताएं रखने वाले व्यक्तियों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता का समर्थन और संवर्धन करें.

एनएसक्यूएफ एक गुणवत्ता आश्वासन फ्रेमवर्क है

- यह भारतीय शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली के भीतर साख प्रदान करने और उसके स्थानांतरण और संवर्धन मार्गों को प्रोत्साहित करता है. यह शिक्षा और प्रशिक्षण में शामिल प्रत्येक पक्ष को देश में प्रस्तावित योग्यताओं के बीच तुलना करने में शामिल होने में मदद करता है और यह समझाता है कि इनमें प्रत्येक के बीच क्या संबंध है.

यह कैसे काम करता है?

नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क में 10 स्तर शामिल हैं. प्रत्येक स्तर अपने समनुरूप सक्षमता प्रदर्शित करने के लिए जटिलता, ज्ञान और स्वायत्तता का भिन्न स्तर प्रस्तुत करता है. फ्रेमवर्क का स्तर-1 निम्नतम जटिलता प्रस्तुत करता है, जबकि स्तर-10 सर्वाधिक जटिलता प्रस्तुत करता है. स्तरों को प्रशिक्षण के परिणामों के रूप में व्यक्त मानदंड द्वारा परिभाषित किया जाता है. योग्यताएं अर्जित करने के लिए धारणात्मक समय व्यक्त करते हुए प्रशिक्षण की मात्रा कुछ स्तरों और कुछ क्षेत्रों के लिए निर्धारित की जा सकती है, परंतु यह जानना महत्वपूर्ण है कि एनएसक्यूएफ के स्तर अध्ययन के वर्षों के साथ सीधे संबंधित नहीं हैं.उनका निर्धारण प्रशिक्षार्थी द्वारा सक्षमता की व्यापक श्रेणियों में की गई मांगों की सीमा द्वारा किया जाता है, जैसे व्यावसायिक जानकारी, व्यावसायिक कौशल, बुनियादी कौशल और उत्तरदायित्व. जीवन पर्यंत प्रशिक्षण के दौरान व्यक्ति निचले स्तरों से उच्चतर स्तर की ओर अथवा योग्यताओं के विभिन्न स्तरों के बीच आगे बढ़ते हैं, क्योंकि वे नया प्रशिक्षण और नए कौशल प्राप्त करते हैं. प्रत्येक एनएसक्यूएफ स्तर प्रशिक्षण परिणामों के रूप में व्यक्त वर्णनकर्ताओं के एक समूह द्वारा निर्धारित किया जाता है. प्रशिक्षण के परिणामों के बीच व्यापक तुलनाओं के लिए स्तर वर्णनकर्ताओं की परिकल्पना की गई है. परंतुऐसा नहीं है कि प्रत्येक योग्यता में स्तर निरूपकों द्वारा निर्धारित सभी विशेषताएं होंगी या होनी चाहिए.

एनएसक्यूएफ स्तर पर प्रत्येक योग्यता पाठ्यचर्या, धारणात्मक संपर्क घंटों, विषयों, अध्ययन की अवधि, कार्यभार, प्रशिक्षक गुणवत्ता और प्रशिक्षण संस्थान के प्रकार के संदर्भ में और भी परिभाषित की जा सकती है, ताकि यह कहा जा सके कि प्रशिक्षण प्र्रिक्रया के अंत में प्रशिक्षार्थी की कितनी योग्यता अपेक्षित अथवा प्रयोज्य है. समान स्तर पर दो या अधिक योग्यताओं को रखना केवल यह दर्शाता है कि वे परिणाम के सामान्य स्तर के संदर्भ में मोटेतौर पर समान हैं. इससे यह पता नहीं चलता कि उनका प्रयोजन और विषयवस्तु अनिवार्यत: एक समान है. एनएसक्यूएफ से संबंधित कुछ अन्य मुद्दे नीचे दिए गए हैं:-

क)कैरिकुलम पैकेज: सक्षमता आधारित पाठ्यचर्या पैकेज के अंतर्गत सिलेबस, विद्यार्थी नियमावली, प्रशिक्षक गाइड, प्रशिक्षण नियमावली, प्रशिक्षक योग्यताएं, दिशा-निर्देशों का मूल्यांकन और परीक्षण तथा मल्टी-मीडिया पैकेज और ई-सामग्री शामिल है. इन सब चीजों का विकास प्रत्येक एनएसक्यूएफ स्तर के लिए किया जाएगा, और जहां अपेक्षित होगा, क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़) द्वारा पहचान किए गए विशेष योग्यता समूहों के लिए किया जाएगा. यह कार्य मंत्रालयों/विभागों, क्षेत्रगत कौशल परिषदों जैसी एजेंसियों और निर्दिष्ट नियामक निकायों या एनएसक्यूएफ के अनुसार किन्हीं अन्य निकायों द्वारा किया जाएगा. एनएसक्यूएफ पाठ्यचर्या प्रमापीय होनी चाहिए, जिसमें कौशल अर्जित करने और उसमें प्रवेश या बहिर्गमन की सुविधा होनी चाहिए. पाठ्यचर्या का डिजाइन एक साख फ्रेमवर्क के भी अनुरूप होना चाहिए, जो अर्जित साख और अर्जित सक्षमताओं को प्रदर्शित कर सके. प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण भी एनएसक्यूएफ के अनुरूप होना चाहिए.

)उद्योग सम्बद्धता: क्योंकि एनएसक्यूएफ एक परिणाम आधारित दृष्टिकोण पर आधारित है, उद्योग जगत और नियोक्ताओं की भागीदारी एनएसक्यूएफ की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण शर्त है. इसमें व्यावसायिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, सामान्य शिक्षा और कौशल विकास पाठ्यक्रम एनएसक्यूएफ के अनुसार और क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़), उद्योग और नियोक्ताओं के परामर्श से परिकल्पित, विकसित और वितरित किए जाएंगे. इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण संस्थान प्रदान करने में भी उद्योग सहायता कर सकते हैं.

ग)समानांतर और शीर्षवत गतिशीलता: समानांतर और शीर्षगत गतिशीलता को अंजाम देने के लिए निम्नांकित चीजें अनिवार्य हैं:-

-प्रत्येक स्तर ऊपर और नीचे के स्तरों से सम्बद्ध है. यदि ये कदम उद्योग क्षेत्र अथवा शैक्षिक क्षेत्र में गायब होंगे, तो एनएसक्यूएफ इन लापता स्तरों की पहचान करने और उन्हें प्रस्तुत करने में सहायता करेगा.

-इन अंतरालों को भरना होगा और इस प्र्रिक्रया में प्रमुख प्रशासनिक मंत्रालय, उस क्षेत्र में पहले से प्रचालित  नियामक निकायों, क्षेत्रगत कौशल परिषदों (एसएससीज़) और एनएसक्यूसी के हिस्सा होने के नाते अन्य सम्बद्ध पक्षों के साथ सलाह मशविरा करना होगा.

-एनएसक्यूएफ द्वारा वांछित समझी जाने वाली परवर्ती गतिशीलता की मात्रा की पहचान की जाएगी, और साख ग्रहण एवं अंतरण के जरिए उसमें मदद करनी होगी. तदनुरूप, एनएसक्यूएफ को ऐसे नियामक संस्थानों (जैसे यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीवीटी, तकनीकी और स्कूल बोर्ड आदि) की आवश्यकता पड़ेगी, जो एनएसक्यूएफ के प्रत्येक स्तर के लिए प्रवेश और बहिर्गमन के मानदंड हासिल की जाने वाली सक्षमताओं के संदर्भ में निर्धारित कर सकें, ताकि व्यावसायिक शिक्षा में शीर्षगत प्रगति को सुदृढ़ बनाया जा सके. यदि आवश्यक हो तो  इन स्तरों के जरिए प्रगति करने वाले व्यक्तियों की आपत्तियों पर विचार किया जा सकता है और उनका समाधान किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, यह व्यवस्था कक्षा 10-12, आईटीआई और पोलीटेक्निक संस्थानों के पासआउट विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अधिसूचित व्यावसायिक/तकनीकी/सामान्य शिक्षा के उच्चतर शिक्षा पाठ्यक्रमों और साथ ही बैचलर ऑफ वोकेशनल स्टडीज़ (बी.वीओसी) जैसे डिग्री स्तरीय पाठ्यक्रमों में प्रवेश करने में मदद करेगी. अर्जित सक्षमताओं और अर्जित साख पर विचार करते हुए, यदि वांछित हो तो पाठ्यक्रम में परिवर्तन भी संभव हो सकेगा. इसके अतिरिक्त कौशलयुक्त व्यक्तियों को विभिन्न स्तरों पर व्यावसायिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण से सामान्य शिक्षा और उच्चतर शिक्षा तथा इसके विपरीत परिवर्तन का विकल्प भी उपलब्ध होगा. इसके लिए स्कूल बोर्डों, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों द्वारा प्रदत्त मार्गों का इस्तेमाल किया जाएगा. यदि किसी उम्मीदवार में ‘‘सक्षमता संबंधी अंतरालों’’ की पहचान की जाएगी, तो संस्थानों द्वारा इन सक्षमताओं को अर्जित करने के लिए आदर्श पाठ्यचर्या पर आधारित ‘‘सेतु पाठ्यक्रम’’ का सहारा लिया जा सकता है.

घ) अंतर्राष्ट्रीय समकक्षता:- एनएसक्यूएफ भारतीय कौशल योग्यता स्तरों को अन्य देशों और क्षेत्रों के स्तरों से तुलना करने और उनके समरूप बनाने के माध्यम उपलब्ध कराएगा. इससे एनएसक्यूएफ-समनुरूप योग्यताधारकों को विश्व के विभिन्न भागों में काम करने और/या बसने में मदद मिलेगी. एनएसक्यूएफ विश्वभर में विकसित हो रहे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रीय फ्रेमवर्कों के साथ परस्पर संपर्क का माध्यम भी होगा.

ङ) स्तर वर्णनकर्ता:- एनएसक्यूएफ के अंतर्गत स्तर-1 से 10 तक 10 स्तर होंगे:-

(द्ब) एनएसक्यूएफ का प्रत्येक स्तर वर्णनकर्ताओं के एक समूह से सम्बद्ध होगा, जो 5 परिणाम वक्तव्यों से युक्त होंगे और यह तय करेंगे कि उक्त स्तर का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए किसी प्रशिक्षार्थी में सामान्यतौर पर न्यूनतम ज्ञान/कौशल और अभिलक्षण कितने अपेक्षित हैं.

(द्बद्ब) एनएसक्यूएफ के प्रत्येक स्तर का वर्णन 5 क्षेत्रों, जिन्हें वर्णनकर्ताओं का स्तर कहा जाएगा, पर आधारित होगा. ये पांच क्षेत्र इस प्रकार हैं:

 (क) प्रक्रिया,

 (ख) व्यावसायिक जानकारी

 (ग) व्यावसायिक कौशल

 (घ) बुनियादी कौशल और

 (ङ) उत्तरदायित्व.

पूर्व प्रशिक्षण की पहचान

पूर्व प्रशिक्षण की पहचान (आरपीएल), विशेषकर भारतीय संदर्भ में, जहां अधिसंख्य कार्मिकों को औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है, एनएसक्यूएफ से सम्बद्ध एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है.  एनएसक्यूएफ उन व्यक्तियों, जिन्होंने जीवन, कार्य और स्वैच्छिक गतिविधियों के जरिए, अनौपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है, के प्रशिक्षण को मान्यता प्रदान कराने में मदद करेगा. इसमें अर्जित ज्ञान और कौशल दोनों शामिल हैं:-

(क)औपचारिक प्रशिक्षण स्थितियों से बाहर प्राप्त ज्ञान.

(ख)कार्यस्थल, सामुदायिक स्तर और/या स्वयंसेवी क्षेत्र के जरिए अर्जित अनौपचारिक प्रशिक्षण.

(ग)सतत व्यवसाय विकास गतिविधियों से.

(घ)स्वतंत्र प्रशिक्षण से.

हितभागियों के कार्य/दायित्व:- एनएसक्यूएफ अनेक हितधारकों का संयुक्त दायित्व है और इसके विकास, कार्यान्वयन और रख-रखाव में प्रत्येक की अपनी-अपनी भूमिका है. प्रमुख हितधारकों की भूमिकाएं/दायित्व इस प्रकार हैं:-

(क) राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी (एनएसडीए)

एनएसडीए को एनएसक्यूएफ के संचालन और प्रचालन का दायित्व सौंपा गया है, ताकि गुणवत्ता और मानक विशेष क्षेत्रीय जरूरतों को पूरा कर सकें. एनएसडीए मौजूदा व्यावसायिक प्रमाणन निकायों के अतिरिक्त ऐसे अन्य निकायों की स्थापना में भी मदद करेगा. उपरोक्त कार्यों का निष्पादन करते हुए एनएसडीए यह सुनिश्चित करेगा कि एनएसक्यूएफ एक गुणवत्ता आश्वासन फ्रेमवर्क के रूप में काम करे और क्षमता निर्माण में मदद करे.

(ख) क्षेत्रगत कौशल परिषदें (एसएससीज़)

क्षेत्रगत परिषदें उद्योग के नेतृत्व में राष्ट्रीय भागीदारी संगठन हैं, जो सभी हितधारकों को अपने-अपने क्षेत्रों में एकजुट करेंगी. सम्बद्ध क्षेत्र में उद्योगों की जरूरतों के आधार पर, एसएससीज द्वारा एनओएस और क्यूपीज़ विकसित किए जा रहे हैं, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में विभिन्न कार्यभूमिकाएं निभा सकें और एनएसक्यूएफ के समुचित स्तरों को समनुरूप बना सकें. वे उद्योग क्षेत्र के लिए मौजूदा व्यावसायिक प्रशिक्षण और शिक्षा प्रणाली के पूरक के रूप में काम करेंगी ताकि मात्रा एवं गुणवत्ता की दृष्टि से सभी स्तरों पर सतत एवं विकासशील आधार पर प्रशिक्षित कार्मिकों की जरूरत समुचित मूल्य शृंखला के लिए पूरी की जा सके.

(ग) केंद्रीय मंत्रालय

शीर्ष मुद्दे प्रशासनिक नियंत्रण में होने को देखते हुए केंद्रीय मंत्रालयों को नेतृत्व प्रदान करना पड़ेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार्र्यक्रमों से सम्बद्ध सभी हितधारक एनएसक्यूएफ के तत्वावधान के अंतर्गत संस्थानों/निकायों द्वारा प्रस्तावित किए जा रहे कार्यक्रमों के अनुरूप काम करें.

(घ) राज्य सरकारें

सम्बद्ध राज्य सरकारें अपने नियंत्रण के अंतर्गत आने वाले संस्थानों/निकायों को प्रेरित करेंगी, कि वे अपने प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को एनएसक्यूएफ के अनुरूप बनाएं, क्योंकि इससे ऐसी योग्यताएं रखने वाले व्यक्तियों को अधिक गतिशीलता प्राप्त होगी. राज्य सरकारें ऐसे तौर-तरीके निर्धारित करने में भी मदद करेंगी, जो क्षेत्रीय अंतरों के लिए व्यवस्था करते हुए यह सुनिश्चित कर सकें कि एनएसक्यूएफ से सम्बद्ध गुणवत्ता आश्वासन की अनदेखी न हो.

(ङ) नियामक संस्थान

सभी वर्तमान नियामक संस्थान (जैसे यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीवीटी, तकनीकी और स्कूल बोर्ड आदि) एनएसक्यूएफ स्तरों के संदर्भ में सक्षमताओं और योग्यताओं के प्रवेश और बहिर्गमन को परिभाषित करेंगी, ताकि सामान्य और व्यावसायिक शिक्षा दोनों में ही शीर्षवत प्रगति सुदृढ़ की जा सके और व्यावसायिक पासआउट डिग्री स्तरीय पाठ्यक्रमों सहित व्यावसायिक/ तकनीकी/सामान्य शिक्षा में उच्चतर शिक्षा के सम्बद्ध पोर्टलों में प्रवेश पा सकें.

(च) प्रशिक्षण प्रदाता/संस्थाएं/संस्थान

सभी प्रशिक्षण प्रदाताओं को अपने पाठ्यक्रमों/कार्र्यक्रमों का संचालन करना होगा ताकि एनएफक्यूएस स्तरों के साथ समनुरूपता सुनिश्चित की जा सके.

22 फरवरी 2017 को उच्चतम न्यायालय ने यह साफ कर दिया कि सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के निर्माण की इजाजत देने वाले उसके फैसले को क्रियान्वित करना है। साथ ही, अंतरराज्यीय जल विवाद को लेकर 23 फरवरी को एक राजनीतिक पार्टी के प्रस्तावित प्रदर्शन के मद्देनजर हरियाणा और पंजाब से ‘किसी भी कीमत पर’ कानून व्यवस्था कायम रखने को कहा है। हरियाणा की मुख्य विपक्षी पार्टी इंडियन नेशनल लोक दल (इनेलो) ने अपने कार्यकर्ताओं को गुरुवार को अंबाला में जमा होने और एसवाईएल नहर की खुदाई शुरू करने के लिए पंजाब के अंदर मार्च करने को कहा है।

न्यायमूर्ति पीसी घोष और न्यायमूर्ति अमिताव रॉय की सदस्यता वाली एक पीठ ने कहा, ‘हरियाणा और पंजाब को किसी भी कीमत पर कानून व्यवस्था कायम रखनी चाहिए। पंजाब और हरियाणा कानून के तहत कार्रवाई करेंगे. कानून व्यवस्था का किसी भी तरीके से उल्लंघन नहीं होना चाहिए।’ हरियाणा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की दलील पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि नहर की इजाजत देने वाला शीर्ष न्यायालय का फैसला और आदेश को क्रियान्वित करना है और नहर का निर्माण करना है।

हालांकि, पीठ ने पंजाब का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी की दलीलों का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों ओर के अच्छे लोगों को साथ बैठना चाहिए और मुद्दे का एक सौहार्द्रपूर्ण हल निकालना चाहिए। साथ ही कहा कि यह मौजूदा संभावनाओं में एक है। इसने केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलीसीटर जनरल रंजीत कुमार से कहा कि यदि दोनों पक्ष मामला सुलझाने को इच्छुक हैं तो केंद्र सरकार एक मध्यस्थ के तौर पर काम कर सकती है। अदालत ने कहा कि अगले आदेश तक यथास्थिति बनाए रखने का इसके पहले का अंतरिम आदेश कायम रहेगा। बहरहाल, मामले की अगली सुनवाई की तारीख दो मार्च तय की है। साथ ही, पंजाब की यह दलील फिर से खारिज कर दी कि मामला चुनाव नतीजों के बाद के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ग्रामीण आवास योजना ‘ग्रामीण’ के क्रियान्वयन को अनुमति प्रदान कर दी है। इस योजना के तहत सभी बेघर और जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले लोगों को पक्का मकान बनाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु 2016-17 से 2018-19 तक तीन वर्षों में 81975 रुपये खर्च होंगे।

यह प्रस्तावित किया गया है कि परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2016-17 से 2018-19 के कालखंड में एक करोड़ घरों को पक्का बनाने के लिए मदद प्रदान की जाएगी। दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़ कर यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे भारत में क्रियान्वित की जाएगी। मकानों की क़ीमत केंद्र और राज्यों के बीच बांटी जाएगी।

क) प्रधानमंत्री आवास योजना की ग्रामीण आवास योजना- ग्रामीण का क्रियान्वयन। 

ख) ग्रामीण क्षेत्रों में एक करोड़ आवासों के निर्माण के लिए 2016-17 से 2018-19 तक तीन वर्षों में मदद प्रदान की जाएगी। 

ग) समतल क्षेत्रों में प्रति एकक 1,20,000 तक एवं पहाड़ी क्षेत्रों में 1,30,000 तक सहायता में बढ़ोतरी। 

घ) 21,975 करोड़ रुपए की अतिरिक्त वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) से की जाएगी।

ड.) लाभान्वितों की पहचान के लिए सामाजिक-आर्थिक-जातीय जनगणना- 2011 का उपयोग। 

च) परियोजना के तहत लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी सहायता हेतु नेशनल टेकनिकल सपोर्ट एजेंसी का गठन।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ को मंजूरी दी जो किसानों के कल्याण के लिए लीक से हटकर एक अहम योजना है। किसान हितैषी सरकार का नया तोहफा:- 

(1). लोहिड़ी, पोंगल एवं बीहू जैसे त्यौहारों के शुभ अवसर पर किसान हितैषी सरकार ने किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के रूप में एक बड़ा तोहफा दिया। यह योजना खरीफ 2016 से लागू  है।

(2). किसानों के लिए बीमा योजनाएं समय-समय पर बनती रहीं हैं, किंतु इसके बावजूद अब तक कुल कवरेज 23 प्रतिशत हो सका है। 

(3). सभी योजनाओं की समीक्षा कर अच्छे फीचर शामिल कर किसान हित में और नए फीचर्स जोड़कर फसल बीमा योजना बनाई गई है। इस प्रकार यह योजना पुरानी किसी भी योजना से किसान हित में बेहतर है। (4). प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत फसल के अनुसार किसान द्वारा देय प्रीमियम राशि बहुत कम कर दी गई है जो निम्नानुसार हैः-

क्र. सं.             फसल किसान द्वारा देय अधिकतम बीमा प्रभार                     (बीमित राशि का प्रतिशत) 

1.                खरीफ                                                                               2.0% 

2.                रबी                                                                                   1.5% 

3.                वार्षिक वाणिज्‍यिक एवं बागवानी फसलें                                      5%

(5). वर्ष 2010 से प्रभावी Modified NAIS में प्रीमियम अधिक हो जाने की दशा में एक कैप निर्धारित रहती थी जिससे कि सरकार के द्वारा वहन की जाने वाली प्रीमियम राशि कम हो जाती थी, परिणामतः किसान को मिलने वाली दावा राशि भी अनुपातिक रूप से कम हो जाती थी। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में धान की फसल के लिए 22 प्रतिशत Actuarial Premium था। किसान को 30 हजार रुपए के Sum Insured पर कैप के कारण मात्र 900 रुपए और सरकार को 2400 रुपए प्रीमियम देना पड़ता था। किंतु शतप्रतिशत नुकसान की दशा में भी किसान को मात्र 15 हजार रुपए की दावा राशि प्राप्त होती। 

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 30 हजार Sum Insured पर 22 प्रतिशत Actuarial Premium आने पर किसान मात्र 600 रुपए प्रीमियम देगा और सरकार 6000 हजार रुपए का प्रीमियम देगी। शतप्रतिशत नुकसान की दशा में किसान को 30 हजार रुपए की पूरी दावा राशि प्राप्त होगी अर्थात उदाहरण के प्रकरण में किसान के लिए प्रीमियम 900 रुपए से कम होकर 600 रुपए। दावा राशि 15000 रुपए के स्थान पर 30 हजार रुपए। 

(6). बीमित किसान यदि प्राकृतिक आपदा के कारण बोनी नहीं कर पाता तो यह जोखिम भी शामिल है उसे दावा राशि मिल सकेगी।

(7). ओला, जलभराव और लैण्ड स्लाइड जैसी आपदाओं को स्थानीय आपदा माना जाएगा। पुरानी योजनाओं के अंतर्गत यदि किसान के खेत में जल भराव (पानी में डूब) हो जाता तो किसान को मिलने वाली दावा राशि इस पर निर्भर करती कि यूनिट आफ इंश्योरेंस (गांव या गांवों के समूह) में कुल नुक्सानी कितनी है। इस कारण कई बार नदी नाले के किनारे या निचले स्थल में स्थित खेतों में नुकसान के बावजूद किसानों को दावा राशि प्राप्त नहीं होती थी। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में इसे स्थानीय हानि मानकर केवल प्रभावित किसानों का सर्वे कर उन्हें दावा राशि प्रदान की जाएगी।

(8). पोस्ट हार्वेस्ट नुकसान भी शामिल किया गया है। फसल कटने के 14 दिन तक यदि फसल ख्रेत में है और उस दौरान कोई आपदा आ जाती है तो किसानों को दावा राशि प्राप्त हो सकेगी। 

(9). योजना में टैक्नोलॉजी का उपयोग किया जाएगा जिससे की फसल कटाई/नुकसान का आकलन शीघ्र और सही हो सके और किसानों को दावा राशि त्वरित रूप से मिल सके। रिमोट सेंसिंग के माध्यम से फसल कटाई प्रयोगों की संख्या कम की जाएगी। फसल कटाई प्रयोग के आंकड़े तत्कल स्मार्टफोन के माध्यम से अप-लोड कराए जाएंगे।

आर्थिक स्वतंत्रता के एक वार्षिक सूचकांक में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है और यह 143 के स्थान पर रहा है। एक अमेरिकी शोध संस्थान ‘द हेरिटेज फाउंडेशन’ की ‘इंडेक्स ऑफ इकनॉमिक फ्रीडम’ में भारत की रैकिंग उसके पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान समेत कई दक्षिण एशियाई देशों से पीछे है। इसका प्रमु़ख कारण भारत में बाजार को ध्यान में रखकर किए गए आर्थिक सुधारों से होने वाली प्रगति का ‘असमान’ होना बताया गया है।

इस रपट में कहा गया है कि भारत में पिछले पांच साल में औसतन सात प्रतिशत की दर से सतत वृद्धि हुई है लेकिन यह वृद्धि नीतियों में गहरे तक नहीं समाई है जिससे कि आर्थिक स्वतंत्रता का संरक्षण किया जा सके। इस कंजरवेटिव राजनीतिक विचारधारा के शोध समूह की रपट में भारत को ‘अधिकांशतया गैर-खुली’ अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि भारत में बाजार आधारित सुधारों से हुई प्रगति ‘असमान’ रही है।इसमें कहा गया है कि राज्य ने लोक उपक्रमों के माध्यम से कई क्षेत्रों में ‘अपनी एक व्यापक उपस्थिति बनाए रखी है’। इसके अलावा प्रतिबंधात्मक और भारी-भरकम नियामकीय वातावरण से उद्यमिता हतोत्साहित होती है। यदि यह ना हो तो निजी क्षेत्र का व्यापक प्रसार किया जा सकता है। इस सूचकांक में भारत ने कुल 52.6 अंक हासिल किए जो पिछले साल के मुकाबले 3.6 अंक कम है।

पिछले साल इस सूचकांक में भारत की रैंकिंग 123 थी।इस सूचकांक में हांगकांग, सिंगापुर और न्यूजीलैंड शीर्ष पर रहे हैं। दक्षिण एशियाई देशों में भारत से नीचे अफगानिस्तान 163 और मालदीव 157वें स्थान पर हैं, जबकि इस सूचकांक में नेपाल का स्थान 125, श्रीलंका का 112, पाकिस्तान का 141, भूटान का 107 और बांग्लादेश का 128 है। चीन ने इस सूचकांक में 57.4 अंक हासिल किए जो पिछले साल के मुकाबले 5.4 अंक ज्यादा है। इस साल उसका स्थान 111 वां रहा है। अमेरिका 75.1 अंक हासिल कर 17वें स्थान पर रहा है। इस सूचकांक में वैश्विक औसत 60.9 अंक रहा जो पिछले 23 साल में रिकॉर्ड उच्चस्तर है।

15 Feb. 2017 को भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने एक ही रॉकेट के माध्यम से रिकॉर्ड 104 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण करके इतिहास रच दिया है। इन उपग्रहों में भारत का पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रह भी शामिल है। यह प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से किया गया है। किसी एकल मिशन के तहत प्रक्षेपित किए गए उपग्रहों की यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। ध्रुवीय अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी37 ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के पहले लॉन्च पैड से सुबह नौ बजकर 28 मिनट पर उड़ान भरी।

इसने सबसे पहले काटरेसैट-2 श्रेणी के उपग्रह को कक्षा में प्रवेश कराया और इसके बाद शेष 103 नैनो उपग्रहों को 30 मिनट में प्रवेश कराया गया। इनमें 96 उपग्रह अमेरिका के थे। अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम दिए जाने पर मिशन कंट्रोल सेंटर के वैज्ञानिकों में खुशी की लहर दौड़ गई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने घोषणा की, ‘‘सभी 104 उपग्रहों को सफलतापूर्वक कक्षा में प्रवेश कराया गया। इसरो के पूरे दल को उनके द्वारा किए गए इस अद्भुत काम के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।’’ एक बार में सबसे ज्यादा उपग्रह प्रक्षेपित करने का श्रेय अब तक रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के पास था। उसने एक बार में 37 उपग्रहों को प्रक्षेपित किया था। इसरो ने जून 2015 में एक मिशन में 23 उपग्रह प्रक्षेपित किए थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सफल प्रक्षेपण पर इसरो दल को बधाई दी। आज के इस जटिल मिशन में 28 घंटे की उल्टी गिनती पूरी होने के बाद पीएसएलवी-सी37 ने 714 किलोग्राम के काटरेसैट-2 श्रृंखला के उपग्रह को कक्षा में प्रवेश कराया। इसके बाद उसने इसरो के नैनो उपग्रहों- आईएनएस-1ए और आईएनएस-1बी को 505 किलोमीटर ऊंचाई पर स्थित ध्रुवीय सौर स्थतिक कक्षा में प्रवेश कराया।

आने वाले समय में भारत सैटेलाइट्स मेकिंग की एक बड़ी मार्केट बन सकता है। सैटेलाइट वेंचर वनवेब की इंडियन फर्म भारती के साथ साझेदारी है। यह लगभग 648 छोटे सैटेलाइट्स बनाएगा जिससे दुनियाभर में तेज इंटरनेट स्पीड पहुंचा सके। वहीं यह दूसरा मौका है जब प्लैनेट लैब्स ने पीएसएलवी रॉकेट का इस्तेमाल अपनी 88 छोटी सैटेलाइट्स स्पेस में भेजने के लिए इस्तेमाल की हो। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसरो का यह लॉन्च ऐसे समय में आया है जब छोटी सैटेलाइट्स लॉन्च करने वालों की दुनियाभर में कमी हो रही है और दूसरी तरफ यूरोप और अमेरिका में प्राइवेट सैटेलाइट इंडस्ट्री में तेजी है। दरअसल इन सैटेलाइट्स का इस्तेमाल मौसम की जानकारी, जीपीएस सिस्टम और इंटरनेट को तेज करने के लिए किया जाएगा। वहीं गौर करने वाली बात यह भी है कि पीएसएलवी रॉकेट का इस्तेमाल लगभग 225 सैटेलाइट लॉन्च में किया गया है जिनमें से 179 विदेशी ग्राहकों की सैटेलाइट हैं।

भारत का अंतरिक्ष का सफर

- इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च (इन्कोस्पार) ने भारत के स्पेस प्रोग्राम की शुरुआत 1962 में की थी।

- इन्कोस्पार टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के तहत काम करती थी। 

- यह बाद में इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) में बदल गई। इसरो की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी।

54 साल पहले लॉन्चिंग

- भारत ने अपना पहला रॉकेट 21 नवंबर 1963 को लॉन्च किया था। 

- यह एक नाइक अपाचे रॉकेट था, जिसे अमेरिका से लिया गया था।

- इसे सिर्फ लॉन्चिंग की ताकत परखने के लिए छोड़ा गया था।58 साल पहले पहला रॉकेट

- भारत में बना पहला रॉकेट रोहिणी

- 75 था, इसे 20 नवंबर 1967 को लॉन्च किया गया था। यह रॉकेट टेक्नोलॉजी बनाने की ताकत परखने के लिए था।

42 साल पहले पहला सैटेलाइट

- आर्यभट्ट भारत का पहला सैटेलाइट था। इसे 19 अप्रैल 1975 को लॉन्च किया गया था। 

- 360 किलोग्राम वजनी इस सैटेलाइट का नाम प्राचीन भारत के एस्ट्रोनॉमर आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था।

- आर्यभट्ट को मैसेज भेजने के लिए बहुत बड़े एंटेना का इस्तेमाल किया जाता था।

38 साल पहले पहला रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट

- 7 जून 1979 को इसरो ने अपना दूसरा सैटेलाइट भास्कर- 1 लॉन्च किया था।

- यह भारत का पहला रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट था।

- भास्कर-1 की भेजी फोटो का इस्तेमाल जंगल, पानी और समुद्र के बारे में जानकारी जुटाई जाती थी।

24 साल पहले लॉन्च हुआ PSLV

- पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) इसरो का पहला ऑपरेशनल लॉन्च व्हीकल है।

- इसने पहले उड़ान 20 सितंबर 1993 को भरी थी। हालांकि, यह लॉन्चिंग नाकाम रही थी।

- यह इसरो का अभी तक का सबसे कामयाब लॉन्च व्हीकल है। 

- PSLV ने अब तक 39 उड़ान भरी हैं, जिनमें से 37 पूरी तरह कामयाब रही हैं।

ये तीन कामयाबी जिन्होंने दुनिया को चौंकाया

चंद्रयान-1

- इसरो ने इसे 22 अक्टूबर 2008 को लॉन्च किया था। इसने 30 अगस्त 2009 तक काम किया।

- इसके साथ ही भारत चंद्रमा पर मौजूदगी दर्ज कराने वाला छठा देश बन गया।

- इससे पहले अमेरिका, रूस, जापान, चीन और यूरोप अपने स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा पर भेज चुके हैं।

मंगलयान-1

- 5 नवंबर 2013 को इसे लॉन्च किया गया।

- इस ग्रह पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाला अमेरिका और रूस के बाद भारत तीसरा देश बना।

- इस मिशन की सबसे खास बात ये रही कि इसरो ने यह कामयाबी पहली ही कोशिश में हासिल की।

- इसके अलावा अमेरिका और रूस के मिशन की तुलना में इसकी लागत बेहद कम थी। इसे सिर्फ 400 करोड़ रुपए में पूरा किया गया।

104 सैटेलाइट्स एकसाथ लॉन्च किए

- 15 फरवरी 2017 को भारत ने एकसाथ 104 सैटेलाइट्स स्पेस में भेजकर रूस का रिकॉर्ड तोड़ दिया।

- रूस के नाम एक बार में 37 सैटेलाइट्स भेजने का रिकॉर्ड था।

- इससे पहले भारत एक बार में 23 सैटेलाइट्स तक भेज चुका था।

आगे क्या है इसरो की प्लानिंग?

- इसरो आने वाले वक्त में सन, वीनस, जूपिटर पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में है।

- भारत मून और मार्स पर दोबारा अपना स्पेसक्राफ्ट भेजने वाला है।

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने 15 फरवरी 2017 को एक ही रॉकेट के माध्यम से रिकॉर्ड 104 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण करके इतिहास रच दिया है। इन उपग्रहों में भारत का पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रह भी शामिल है। यह प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से किया गया है।

किसी एकल मिशन के तहत प्रक्षेपित किए गए उपग्रहों की यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है।

ध्रुवीय अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी37 ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के पहले लॉन्च पैड से सुबह नौ बजकर 28 मिनट पर उड़ान भरी। इसने सबसे पहले कार्टोसैट-2 श्रेणी के उपग्रह को कक्षा में प्रवेश कराया यऔर इसके बाद शेष 103 नैनो उपग्रहों को 30 मिनट में प्रवेश कराया गया। इनमें 96 उपग्रह अमेरिका के थे।

1. बेल्जियम : फिलहाल बेल्जियम दुनिया का सबसे ज्यादा कैशलेस देश है जहां कुल कंज्यूमर पेमेंट का 93 फीसदी कैशलेस होता है. देश की 86 फीसदी आबादी के पास डेबिट कार्ड है. वहां अगर तीन हजार यूरो से ज्यादा कैश का लेन-देन किया तो सवा दो लाख यूरो तक का जुर्माना हो सकता है.

2. फ्रांस : फ्रांस में 69 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट कार्ड है, हालांकि कुल कंज्यूमर पेमेंट का 92 फीसदी हिस्सा कैशलेस होता है. फ्रांस में तीन हजार यूरो से ज्यादा कैश के लेन-देन की अनुमति नहीं है.

3. कनाडा : कनाडा में कुल कंज्यूमर पेमेंट का 90 फीसदी कैशलेस होता है जबकि देश के 88 फीसदी लोगों के पास डेबिट कार्ड है. वैसे, कनाडा ने 2013 से सेंट के सिक्के बनाना बंद कर दिया है. यानी वहां भी कैशलेस होने पर ज्यादा से ज्यादा जोर है.

4. ब्रिटेन : लंदन की मशहूर डबल डेकर बस में चढ़ने से पहले सुनिश्चित कर लें कि आपके पास या तो 'ओइस्टर कार्ड' हो या प्रिपेड टिकट, क्योंकि इसमें कैश नहीं चलता. वैसे पूरे ब्रिटेन में कैश का चलन घट रहा है. कुल कंज्यूमर पेमेंट का 89 कैशलेस ही होता है और 88 फीसदी लोगों के पास डेबिट कार्ड हैं.

5. स्वीडन : स्वीडन में 2008 में जहां 110 बैंक डकैतियां हुईं, वहीं 2011 में इतनी संख्या घटकर 16 रह गई. वजह है बैंकों में कम से कम कैश होना. कैशलेस देशों की सूची में स्वीडन पांचवें नंबर पर है जहां कंज्यूमर पेमेंट का 89 फीसदी हिस्सा कैशलेस है. देश के 96 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट कार्ड है.

6. ऑस्ट्रेलिया : ऑस्ट्रेलिया में 79 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट कार्ड है जबकि कंज्यूमर पेमेंट का 86 प्रतिशत कैशलेस होता है. वहां कैशलेस पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कई आयोजन होते हैं.

7. नीदरलैंड्स : नीदरलैंड्स ने कैशलेस होने के मामले में खासी प्रगति की है जहां कुल कंज्यूमर पेमेंट का 85 फीसदी पेमेंट कैशलेस हो रहा है. देश के 98 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट कार्ड है. राजधानी एम्सटरडैम में पार्किंग वाले तक कैश नहीं लेते, सिर्फ कार्ड से ही पेमेंट होता है.

8. अमेरिका : अमेरिका में 72 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट कार्ड है जबकि कुल कंज्यूमर पेमेंट का 80 फीसदी पेमेंट कैशलेस होता है. हालत यह है कि वहां एटीएम मशीनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं.

9. जर्मनी : सबसे कैशलेस देशों की फेहरिस्त में नौवें नंबर पर यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी है. यहां कुल कंज्यूमर पेमेंट का 76 प्रतिशत भुगतान कार्ड या अन्य कैशलेस तरीकों से होता है. 88 फीसदी आबादी के पास डेबिट कार्ड है.

10. दक्षिण कोरिया : मास्टर कार्ड कैशलेस जर्नी नाम की एक रिपोर्ट में दुनिया की सबसे ज्यादा कैशलेस अर्थव्यवस्थाओं का ब्यौरा दिया गया है. इस लिस्ट में 10वें पायदान पर दक्षिण कोरिया है जहां समूचे कंज्यूमर पेमेंट का 70 फीसदी पेमेंट कैशलेस होता है. देश की 58 फीसदी आबादी के पास डेबिट कार्ड है.

अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा सूचकांक में भारत लगातार पिछड़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स के वैश्विक बौद्धिक संपदा केंद्र जीआईपीसी की बौद्धिक संपदा वातावरण पर तैयार 45 देशों की सूची में भारत को 43वें स्थान पर रखा गया है। जीआईपीसी ने इस बात का भी जिक्र किया है कि सरकार को उल्लेखनीय विधायी सुधारों के जरिए अपनी आईपीआर नीति को सकारात्मक रख देना चाहिए। नवोन्मेषकों को इसकी जरूरत है। यह लगातार पांचवां साल है जबकि भारत इस सूची में निचले पायदान पर रहा है। हालांकि, 2017 की सूची इस लिहाज से कुछ सुधार दिखाती है कि पिछले चार साल के दौरान भारत आखिरी से एक पायदान ही उपर रहा था।

जीआईपीसी के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेविड हिरश्मैन ने कहा कि भारत में नवप्रवर्तन को लेकर पुरानी चुनौतियां कायम हैं। हालांकि इसने इस दिशा में थोड़ी प्रगति की है, लेकिन सरकार को विधायी सुधारों के जरिए आईपीआर नीति को सकारात्मक रख देना चाहिए।

प्रधानमंत्री स्वदेश दर्शन व प्रसाद योजना श्री नरेन्द्र मोदी सरकार की पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक बहुत ही विशेष पहल है, इसके अनुसार देश में जो पर्यटन स्थल है वहा की सार्वजानिक सुविधाओ एवं पर्यटन एवं पर्यटन से जुड़े पहलुओ पर ध्यान दिया जायेगा। इससे धार्मिक और पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थलों को विश्व स्तरीय सुविधाओं से युक्त बनाया जाएगा।

इन केंद्रों को बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से युक्त करने के साथ ही बेहतर पार्किंग, रहने के लिए अतिथिगृहों के निर्माण की योजना बनाई गई है।इसके तहत पर्यटन विभाग से जुडी सभी मूलभूत आवश्यकताओ की पूर्ती पर ध्यान दिया जायेगा ।

बुनियादी ढांचा के विस्‍तार, सड़क एवं परिवहन सुविधाओं, रेलवे, नागरिक उड्डयन और कौशल विकास प्रशिक्षण के जरिए उनके मंत्रालय देश में पर्यटन को बढ़ावा देने में कैसे मदद कर सकते हैं।

वाराणसी जैसे बौद्ध सर्किट के महत्‍वपूर्ण स्‍थलों को हेलिकॉप्‍टर सेवाओं से जोड़ना, महत्‍वपूर्ण पर्यटक स्‍थलों की रेलगाड़ियों में पर्यटकों के लिए विशेष डिब्‍बे, रोजगार बढ़ाने के लिए स्‍थानीय लोगों विशेष रूप से महिलाओं को पर्यटक गाइड के रूप में प्रशिक्षित करना, पर्यटन क्षेत्रों में परिवहन और ठहरने जैसी आधाभूत बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना शामिल है।

प्रदेश में पर्यटन विकास की दो परियोजनाओं के लिए वित्तीय वर्ष में केन्द्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय की ओर से राजस्थान सरकार को 104.40 करोड़ रूपए स्वीकृत किये गए एवं केंद्र के लिए इसका बजट 600 करोड़ रुपए रखा गयाइसके दौरान क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों (जेडसीसी) के साथ दोनों पहलों की शुरुआत साल 2016–17 तक अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की वर्तमान प्रतिशत 0.68 को बढ़ाकर 1 प्रतिशत प्राप्त करने के लिए की गई है।

इस योजना के अनुसार तीर्थ स्थलों पर ठहराव, पेयजल, स्नानागार, शौचालय, साफ-सफाई, बिजली, सुरक्षा आदि की बेहतर सुविधा उपलब्ध रहेगी। सभी कॉम्पलैक्स में सुविधाओं को बहाल रखने हेतु केयर-टेकर भी तैनात रहेंगे।

पर्यटन विभाग से हमारे देश में बहार से व्यापार आता है इससे देश में हर तरह से फायदा होता है पर्यटन से सभी को फायदा होता सरकार से लेकर एक वाहन चालक तक को इसी लिए सरकार ने सभी पर्यटन स्थलों के लिए इस योजना का आरम्भ किया ।

करप्‍शन एक ऐसा मुद्दा है, जिसपर देश में कई सालों से बहस हो रही है। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भारत इस मामल में अब भी दुनिया के डेवलप देशों से काफी पीछे नजर आता है। हालांकि हाल के दिनों में भारत में इसे लेकर जागरूकता बढ़ी है। देश में लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा इमानदार हों, इसके लिए सरकार ने राज्‍यों और शहरों के बीच कॉम्पिटीशन भी भावना पैदा करने का निर्णय लिया है। इसका सबसे बेहतरीन तरीका सबसे इमानदार शहरों की लिस्‍ट तैयार करना है। मोदी सरकार ने स्‍वच्‍छता के मोर्चे पर भी ऐसा ही किया है। हाल में संसद में पेश आर्थिक सर्वे 2016-17 में सरकार ने देश के टॉप 20 शहरों कल लिस्‍ट जारी की है। 

यह लिस्‍ट शहरों की लोकल बॉडीज (ULBs) में ट्रांसपैरेंसी के आधार पर तैयार की गई है।- इसके साथ ही इन ULBs की जवाबदेही और सहायोग को भी आधार बनाया गया है।- लिस्‍ट में देश की आर्थिक राजनधानी मुंबई पहले नंबर पर है। लिस्‍ट में कई शहर ऐसे हैं, जिन्‍हें एक समान नंबर दिए गए हैं, हालांंक‍ि कुछ अन्‍य मानकों के आधार पर उन्‍हें अलग-अलग रैंकिंग दी गई है। लिस्‍ट में इन शहरों को 8  से 2 के बीच नंबर मिले हैं। सबसे ज्‍यादा नंबर मुंबई-हैदराबाद को तो सबसे कम नंबर चंडीगढ़ और देहरादून हैं।

•  लिस्ट में हैदराबाद को भी 8 नंबर मिले हैं। ईमानदार शहरों में उसका नंबर मुंबई के बाद है।

 तीसरे नंबर पर पंजाब का आर्थिक शहर लुधियाना है। उसका स्कोेर 7.5 है।

 चौथे नंबर पर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल है। लिस्ट में उसका स्कोर भी 7.5 है।

 पांचवें नंबर पर केरल की राजधानी तिरुवनन्तपुरम है। लिस्ट में उसका स्कोर 7 है।

 यूपी की राजधानी लखनऊ का नंबर छठां है। लिस्‍ट में उसका स्कोर भी 7 है।

 लिस्ट में यूपी के कानपुर शहर को भी जगह मिली है। सातवीं पोजीशन के साथ लिस्ट में उसका स्कोर 7 है।

 बेंगलुरू को आठवीं पोजीशन मिली है। लिस्ट में उसका स्कोर 6.5 है।

 वहीं नौवें नंबर पर झारखंड का रांची शहर है। लिस्ट में उसका स्कोर 6 है।

 10वें नंबर पर महाराष्ट्र का पुणे शहर है। लिस्ट में उसका स्कोर भी 6 है।

 पटना शहर 11वें नंबर पर है। लिस्ट में उसका स्कोर भी 6 है।

 लिस्ट में चेन्न्ई को 12वीं पोजीशन मिली है। उसका स्कोर 5 बताया गया है।

 लिस्ट में भुवनेश्वर 13वें नंबर पर है। उसका स्कोर भी 5 है।

 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को 14वां नंबर मिला है। लिस्ट में उसका स्कोर 4 है।

 ईमानदारी के मामले में अन्‍य बड़े शहरों के मुकाबले कोलकाता काफी पीछे रह गया है। उसे 15वीं पोजीशन मिली है, जबकि उसका स्कोर भी 4 है।

 दिल्ली को 16वीं पोजीशन मिली है। उसका स्कोर भी 4 है।

 सूरत शहर को लिस्‍ट में 17वें नंबर पर रखा गया है। उसे सिर्फ 2.5 नंबर मिले हैं।

 सूरत के बाद गुजरात की राजधानी अहमदाबाद का नंबर है।

•  18वीं पोजीशन के साथ उसे भी 2.5 नंबर मिले हैं।

 19वें नंबर पर राजस्थान का जयपुर शहर है। उसका स्कोर 2 है।

 20वें नंबर पर उत्तराखंड की राजधानी देहरादून है। उसका स्कोर भी 2 है।

 21वें नंबर पर चंडीगढ़ शहर है। उसका स्कोर भी 2 है।

रायसीना डायलॉग 2017 के एक सत्र को संबोधित करते हुए विदेश सचिव जयशंकर ने जिस अंदाज में चीन व भारत के रिश्तों को परिभाषित किया है वह भारतीय कूटनीति के लिए नया है। जयशंकर ने कहा कि, ''भारत की प्रगति चीन के उदय के लिए कोई खतरा नहीं है लेकिन चीन को भारत की भौगोलिक संप्रभुता का सम्मान करना होगा।''

इसी सम्मेलन में पीएम नरेंद्र मोदी ने एक दिन पहले चीन को यह संकेत दिया था कि दूसरे देशों को जोड़ने की उसकी कोशिश में अन्य देशों की संवेदनाओं का सम्मान करना चाहिए। आज मोदी के बात को जयशंकर ने और स्पष्ट कर दिया। उन्होंने सीधे तौर पर कश्मीर होते हुए पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को जोड़ने वाली चीन की सड़क परियोजना सीपीईसी का जिक्र करते हुए कहा कि, ''चीन एक ऐसा देश है जो अपनी संप्रभुता को लेकर काफी संवेदनशील रहता है। ऐसे में उम्मीद की जाना चाहिए कि वे दूसरे देशों की संवेदनाओं का भी ख्याल रखेंगे। यह परियोजना भारत के एक संवदेनशील हिस्से से गुजरती है।''

हालांकि विदेश सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की संवेदनशीलता को लेकर चीन की तरफ से अभी तक कोई सकारात्मक रूख नहीं दिखाया गया है। भारतीय विदेश सचिव का बयान ऐसे आयोजन में आया है जिसमें पांच दर्जन से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। यहां से चीन को संदेश देने का अपना एक महत्व है।

कूटनीतिक सर्किल में माना जा रहा है कि भारत की नई सरकार ने जिस तरह से साहसिक कूटनीति को अख्तियार किया है यह उसी का नतीजा है। सनद रहे कि चीन व भारत के रिश्ते पिछले एक वर्ष से लगातार खराब हो रहे हैं। पहले एनएसजी के मुद्दे और उसके बाद पाक परस्त आतंकी मसूद अजहर के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी तनाव गहरा रहा है।

जयशंकर ने कहा कि हम चीन को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारी प्रगति उसके उदय के खिलाफ नहीं है। यह बात उसी तरह से है जिस तरह से हम यह समझते हैं कि चीन की प्रगति भी हमारे लिए कोई अवरोध नहीं है। वैसे आर्थिक व दोनों देशों के अवामों के बीच रिश्तों को सुधारने में काफी प्रगति हुई है लेकिन कुछ मूल मुद्दे हैं जहां रुकावटें हैं।

भारत की प्रति व्यक्ति आय 2016-17 में एक लाख रुपए को पार कर जाएगी। ऐसा पहली बार होगा। शुक्रवार को जारी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष प्रति व्यक्ति आय 1,03,007 रुपए रहने का अनुमान है। यह 2015-16 के 93,292 रुपए से 10.4% अधिक होगी। पिछले साल इसमें 7.4% वृद्धि हुई थी। 

सीएसओ ने जीडीपी के आंकड़े जारी करते वक्त कहा कि इसमें नोटबंदी के असर को शामिल नहीं किया गया है। प्रति व्यक्ति आय में इसे शामिल किया गया है या नहीं, यह साफ नहीं है। एक और गौर करने वाली बात यह है कि ये आंकड़े मौजूदा मूल्यों पर आधारित हैं। तुलना के लिए स्थिर मूल्यों पर आधारित आंकड़े अधिक वास्तविक होते हैं। इस हिसाब से देखें तो प्रति व्यक्ति आय 77,435 रु. से बढ़कर 81,805 रु. होने का अनुमान है। यानी इसमें 5.6% वृद्धि होगी। पिछले साल इसमें 6.2% वृद्धि हुई थी।

सीएसओ ने जीडीपी के भी आंकड़े जारी किए। 2011-12 के स्थिर मूल्यों के आधार पर इसके 7.6% से घटकर 7.1% रहने का अंदेशा व्यक्त किया गया है। लेकिन मौजूदा मूल्यों के आधार पर जीडीपी 135.76 लाख करोड़ से बढ़कर 151.93 लाख करोड़ रु. हो जाएगी। यानी यह 11.9% बढ़ जाएगी। 

विश्व औसत तक पहुंचने में लगेंगे 25 साल 

विश्वबैंक के अनुसार मौजूदा मूल्यों पर भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1,582 डॉलर है। इस लिहाज से हम गरीब देशों की श्रेणी में आते हैं। मध्य आय वाले देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी 6,000-7,000 डॉलर सालाना है। विश्व औसत 10,058 डॉलर का है। चीन का आंकड़ा 8,028 डॉलर है। अगर हम सालाना 8-9 फीसदी बढ़ें तो 9 साल में आमदनी दोगुनी होगी। यानी विश्व औसत तक पहुंचने में 25 साल लगेंगे।